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  • कविता – ‘प्रभु की माया’

    कविता – ‘प्रभु की माया’

    हे! जगतगुरू जब –जब तुम्हें पुकारूं तब–तब तुम बहरे क्यों?हो जाते हो। क्या हवा लगी हैं इस दुनिया की जो तुम अंधे भी बन जाते हो।। आनाकानी जब–जब करते हो मेरा साहस क्षीण होता हैं। लाख...


  • कविता – स्मृतियां

    कविता – स्मृतियां

    दर्द का सा नशा हैं स्मृतियों में, जो अधरों पर अदा रूप में आता हैं। इन्द्रधनुष सा रंग दिखाता, औ वीणा सी झनकार दे जाता हैं।। जिसके आंसू कल तक घड़ियाले थे, अब वह गंगाजल सा...