बाल कविता

बाल कविता : गिलहरी

एक गिलहरी पेड़ पे बैठी टुकुर टुकुर कुछ देखे पूँछ उठाकर गिल्लो रानी धीरे धीरे उतरे इधर देखे,उधर देखे उतरे और रूक जाए फिर कुछ उतरे,देखे और थम जाए उखड़ी सांस और लगे थकी सी संभल संभल कर कदम उठाए खिड़की मे बैठी मुन्नी देखे और ये सोचे अम्मा की तरह इस गिल्लो के दुखते […]

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लफ्ज

मुझे नही आता हुनर सीपीयों से मोती ढूढने का मजहबों से लहू और लहू से महक ढूढने का मै तो मन की गुफा से मुहब्बतों के रंग ढूढती हूँ ज़जबातों से लिपटा दर्द और उम्मींदो के फटे पुराने कफन टटोलती अंदर से ढूढती हूँ उनकी आत्मा के लिए उसी के नाप के लफ्ज़ फिर वही […]

कविता

नन्हा कान्हा

जब तू खिलखिला कर हँसता है सोचती हूँ….. तेरी किलकारियों मे ही विद्यमान होते हैं सातों स्वर ! मासूमियत,चंचलता,कोमलता तेरी भोली भाली बातों से अठखेलियाँ करतीं तेरी तोतली बातों संग नाचती हैं तो घर का आँगन बन जाता है मधुबन! तेरी नटखट आँखों की करामात देखना तेरे कोमल हाथों की जादुई छुअन काट देती है […]

कविता

कविता

वो हर पूर्णिमा को तोड़ घर का चुल्हा गूँथ मिट्टी बना देती फिर से नया लीप चौके को बना देती मोर चिड़ियाँ छिपा लेती नैनो से सिम रहे अश्रुओं को करती पुत्र पति के सुख की कामना पुकार लेती काँपते होंठों से एक छुपा सा नाम वो चाहत ना पा सकती ना भुला सकती आने […]

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तजुर्बा

मेरी कविता नही करती सामाजिक सरोकार की बात ये नही ढूँढती आर्थिक समस्याएँ बढ़ रहे चोर काले सफेद या और मेरी कविता ने नही देखा ढ़ाबे पर बर्तन धोता नन्हा बच्चा ना तजुर्बेकार है मेरी कविता वो अभी भी करती है उस निगाह की बात जो मनचली तितली के पीछे उडती फिरती है ..!! — रितु […]

कविता

कविता

  मैने तो सोचा था वो खत्म हो गए हैं अब मैने तो मार दिया था उनको उनके ही घर मे सरेआम ललकारा था उनकें ही लोगों के सामने खुले शेर की तरह परन्तु ….. मेरा दिल तो आज भी सहम गया उस छोटे से बच्चे की तरह जब मैने देखा अपने ही जिगर के […]

कविता

कविता

ये कैसा मंजर है सृजन का कि कविता की भूमि तलाशते कलमकार को चौंका गयी नीरवता में एक चीख, बरबस बढ़ गये कदम किन्तु ! हो गये नयन विस्मित देख एक अबला की लुटती लाज निर्लज्जता से, वो देखता रहा पाषाण सा अपलक सतत खोजता रहा एक नयी कविता अबला की पुष्ट देह में कविता […]

कविता

कविता

मुद्दत बाद …… उम्रें ठहर गईं उनकी नजरें मिलीं ……. एक दूसरे को देखा , जैसे तपती गर्मी में ठन्डे पानी के घूंट भर लिए हों । पर ये क्या , उनकी प्यास तो वैसे ही धरी हुई थी । वो दिन , वो घडी , वो पल ऐसे गुजरा जैसे वो मेले में हो […]

कविता

कविता

जानते हो मैं इतना क्यों लिखती हूँ? कि कभी तुम्हें मेरी याद आये तो मुझे ढूँढने में ज्यादा परेशानी ना हो… गूगल करो और बस तुम हमेशा मुझे खो देते हो ना इसलिए…. देखो ना जमाने की भीड़ में कैसी खो गयी हूँ, ढूँढने को इतने तरीके हैं पर .. अभी तक ऐसा सर्च इंजन […]

कविता

कविता

कुछ धधक रहा हैं मेरे अंदर तलाश में हूँ मैं उस अाग की राख कर सके जो मुझे जला कर होती हैं कुछ लोगों की इच्छा कि बाद मरने के उनकी अस्थियाँ बहा दी जाए गंगा में ताकि जाने के बाद भी उनका कुछ कण कण में रहे. सुनो सुन सुन रहे हो न ऐसे […]