बाल कविता

बालगीत “पढ़ने में भी ध्यान लगाओ”

मौसम कितना हुआ सुहाना। रंग-बिरंगे सुमन सुहाते। सरसों ने पहना पीताम्बर, गेहूँ के बिरुए लहराते।। — दिवस बढ़े हैं शीत घटा है, नभ से कुहरा-धुंध छटा है, पक्षी कलरव राग सुनाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। — काँधों पर काँवड़ें सजी हैं, बम भोले की धूम मची है, शिवशंकर को सभी रिझाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। […]

गीतिका/ग़ज़ल

“फूल हैं पलाश में”

कितने हसीन फूल, खिले हैं पलाश में फिर भी भटक रहे हैं, चमन की तलाश में — पश्चिम की गर्म आँधियाँ, पूरब में आ गयी ग़ाफ़िल हुए हैं लोग, क्षणिक सुख-विलास में — जब मिल गया सुराज तो, किरदार मर गया शैतान सन्त सा सजा, उजले लिबास में — क़श्ती को डूबने से, बचायेगा कौन […]

गीत/नवगीत

गीत “जालजगत की शाला है”

जीवन में अँधियारा, लेकिन सपनों में उजियाला है। आभासी दुनिया में होता, मन कितना मतवाला है।। — चहक-महक होती बसन्त सी, नहीं दिखाई देती है, आहट नहीं मगर फिर भी, पदचाप सुनाई देती है, वीरानी बगिया को जो, पल-पल अमराई देती है, शिथिल अंग में यौवन की, आभा अँगड़ाई लेती है, कभी नहीं मुरझाती, सुमनों […]

बाल कविता

बालकविता “सूरज कितना घबराया है”

फागुन में कुहरा छाया है। सूरज कितना घबराया है।। — अलसाये पक्षी लगते हैं। राह उजाले की तकते हैं।। — सूरज जब धरती पर आये। तब हम दाना चुगने जायें।। — भुवन भास्कर हरो कुहासा। समझो खग के मन की भाषा।। — बिल्ली सुस्ताने को आई। लेकिन यहाँ धूप नही पाई।। — नीचे जाने की […]

गीत/नवगीत

गीत “हो रहा विहान है”

हो रहा विहान है, रश्मियाँ जवान हैं, पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।। — मतकरो कुतर्क कुछ, सत्य स्वयं सिद्ध है, हौसले से काम लो, पथ नहीं विरुद्ध है, यत्न से सँवार लो, उजड़ रहा वितान है। पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।। — मनुजता की नीड़ में, विषाद ही विषाद […]

बाल कविता

बाल गीत “जीत गया कुहरा”

कुहरे और सूरज दोनों में,जमकर हुई लड़ाई। जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।। — ज्यों ही सूरज अपनी कुछ किरणें चमकाता, लेकिन कुहरा इन किरणों को ढकता जाता, बासन्ती मौसम में सर्दी ने ली अँगड़ाई। जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।। — साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो रहा, कभी सूर्य और कभी […]

मुक्तक/दोहा

दोहे “जिजीविषा”

रहती है आकांक्षा, जब तक घट में प्राण। जिजीविषा के मर्म को, कहते वेद-पुराण।। — जीने की इच्छा सदा, रखता मन में जीव। करता है जो कर्म को, वो होता सुग्रीव।। — आशायें जीवित रहे, जब तक रहे शरीर। जिजीविषा के साथ में, सब करते तदवीर।। — धन-दौलत की चाह में, पागल हैं सब लोग। […]

गीत/नवगीत

“हो रहा विहान है”

हो रहा विहान है, रश्मियाँ जवान हैं, पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।। — मतकरो कुतर्क कुछ, सत्य स्वयं सिद्ध है, हौसले से काम लो, पथ नहीं विरुद्ध है, यत्न से सँवार लो, उजड़ रहा वितान है। पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।। — मनुजता की नीड़ में, विषाद ही विषाद […]

गीत/नवगीत

“गौरय्या का गाँव”

सन्नाटा पसरा है अब तो, गौरय्या के गाँव में। दम घुटता है आज चमन की, ठण्डी-ठण्डी छाँव में।। — नहीं रहा अब समय सलोना, बिखर गया ताना-बाना, आगत का स्वागत-अभिनन्दन, आज हो गया बेगाना, कंकड़-काँटे चुभते अब तो, पनिहारी के पाँव में। दम घुटता है आज चमन की, ठण्डी-ठण्डी छाँव में।। — परम्परा के गीत […]

मुक्तक/दोहा

दोहे “परिवेश”

परिवेश पर विविध दोहे — उच्चारण सुधरा नहीं, बना नहीं परिवेश। अँगरेजी के जाल में, जकड़ा सारा देश।१। — अपना भारतवर्ष है, गाँधी जी का देश। सत्य-अहिंसा के यहाँ, मिलते हैं सन्देश।२। — लड़की लड़का सी दिखें, लड़के रखते केश। पौरुष पुरुषों में नहीं, दूषित है परिवेश।३। — भौतिकता की बाढ़ में, घिरा हुआ है […]