कविता

लौटना भर है…

हर आना समेटे हैं लौटकर चले जाना मुझ तक आया ,लौट गया तुम तक आकर भी लौट जाएगा दूर हवा हवा में बहती पानी पानी नदी में बहता कुछ तुम बहे कुछ मै बहता रहा साथ-साथ जो बहकर निकला रास्ते से किसी भी मोड़ मुड़ सकता हैं मुड़ा हुआ ना जाने फिर किस रास्ते से […]

कविता

चलो उठो….

कदमो के निशान उभरते हैं रास्तो पर रास्ते उभरते हैं मंजिल की सुरत बीते साल बीते दिन मौसम बीते बीत गया हर पहर उम्र का उम्र बीती साथ-साथ हर पहर एक दिन ख़ास का ख़ास दिन किसी एक का बाकी बचे दिनों का जिक्र ख़ाक हुआ अनगिनत किस्से अनगिनत हिस्से गिन-गिनकर बीते जिन्हें चुन-चुनकर रखा […]

कविता

कविता : कविता कभी मरती नहीं

तुमने स्वयं के भीतर स्वयं का जन्म होते देखा है कभी क्या तुमने तोड़े है कभी बगिया के आम माली की अनुपस्थिति में ऐसा भी तो हुआ होगा की तुम्हारे घर में खाने को कुछ ना हो, भूख से त्रस्त तोड़ने को बाध्य हुए एक आम…. तुमने विवश होकर कुछ किये हो गुनाह गुनाह की […]

कविता

कविता : ऐसे ही मार दिए गये

उसने जन्म के साथ ही आकाश की ओर देखा , देखती रही और नापती रही उसकी ऊचाई में छिपे गहराई का अनंत और शून्य तिलिस्म उसने उड़ते देखा अपने ही समूह के अन्य जीवों को और स्वयं को आकांक्षाओं से भर लिया कुछ दिनों के प्रयास के बाद उसने झटकाए अपने पर और उड़ान भरी […]

कविता

कविता : पहली और अंतिम इकाई

दो जिस्म जब बैठे थे नदी किनारे आँखे नदी की गहराई तलाश रही थी सवाल जवाब गूंजते रहे देर तक हर दिशा में नदी के उसपार सुखी रेत में चीटिया अपनी धीमी चाल से खोज रही थी धरती का आखरी कोना जहाँ जीवन शुन्यता में विलीन हो जाता है जहाँ न रात होती है न […]

कविता

कविता : सदियों से सदियों तक

सदियों पुराना प्रेम जब आज की गलियों में भटक रहा था मै सोचता रहा तुमसे इसका जिक्र फिर से करू पुछू तुमसे क्या तुमने देखा है कभी महसूस किया है चाँदनी रात की दुधिया उजास में मन का गीलापन जज्ब हो जाता है तन को उसदम किसी मरहम की जरूरत नहीं होती आँखे टकटकी लगाए […]

कविता

कविता : प्रेम खूँटी से

साँसे अटकी रही प्रेम हाफता रहा देर तलक खो गये रास्ते सभी जो रात में पहुँच ते थे बिस्तर तक सुबकता रहा स्वप्न पलको की देहलीज पर स्वप्न धुलता रहा आँखे सुखती गयी मौन को मौन ताकता रहा खुली बाहों का रिक्त रिक्त ही रहा न चाँद न तारे ही भर सके उसे जलाशयों की […]

कविता

कविता : तुमसे बड़ा धूर्त नहीं कोई

तुमसे बड़ा धूर्त नहीं कोई तुम रिश्तो के बीज बोने में अव्वल हो पर तुम्हारे भीतर पनप रहे अहं को रोक लो तुमने अबतक गिनवा दिए न जाने कितने स्वार्थी लोगो के नाम गिनवाते जाने की आतुरता तुम्हारे भीतर से भी छलका रही है स्वार्थ , तुम भी इससे परे नहीं आदतन ही तुमने न […]

कविता

कविता : भय मुक्त

रात जहाँ पहुचती है घुप्प अँधेरे के साथ मौत अपने वहशीपन से बाहर निकलकर विचरण करती है तलाश करती किसी की जिन्दा लाश जहाँ एक अंतहीन सन्नाटा पसरता जाता है झील करवट बदलती है चीटियाँ तक छिप जाती है बिलों में भला भय पर विजय पाना भय को जीत लेना नहीं भय की गहराई में […]

कविता

कविता : चुप्पी अतिआवश्यक है

संघर्ष सृजन के लिए किया जाता रहा सृजन से फिर आकांक्षाओं की पूर्ति पूर्ति के बाद बढ़ता उबासीपन उबासिया से पुरी देह में पसर गयी एक चुप्पी एक चुप्पी ही जीवन का भेद खोल देती है वो दरवाजे भी खोल देती है जो पडोस के मुहाने पर थे शंका बनी ही रही आवाज तो नही […]