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  • लौटना भर है…

    लौटना भर है…

    हर आना समेटे हैं लौटकर चले जाना मुझ तक आया ,लौट गया तुम तक आकर भी लौट जाएगा दूर हवा हवा में बहती पानी पानी नदी में बहता कुछ तुम बहे कुछ मै बहता रहा साथ-साथ...

  • चलो उठो….

    चलो उठो….

    कदमो के निशान उभरते हैं रास्तो पर रास्ते उभरते हैं मंजिल की सुरत बीते साल बीते दिन मौसम बीते बीत गया हर पहर उम्र का उम्र बीती साथ-साथ हर पहर एक दिन ख़ास का ख़ास दिन...





  • कविता : प्रेम खूँटी से

    कविता : प्रेम खूँटी से

    साँसे अटकी रही प्रेम हाफता रहा देर तलक खो गये रास्ते सभी जो रात में पहुँच ते थे बिस्तर तक सुबकता रहा स्वप्न पलको की देहलीज पर स्वप्न धुलता रहा आँखे सुखती गयी मौन को मौन...


  • कविता : भय मुक्त

    कविता : भय मुक्त

    रात जहाँ पहुचती है घुप्प अँधेरे के साथ मौत अपने वहशीपन से बाहर निकलकर विचरण करती है तलाश करती किसी की जिन्दा लाश जहाँ एक अंतहीन सन्नाटा पसरता जाता है झील करवट बदलती है चीटियाँ तक...