मुक्तक/दोहा

दोहा मुक्तक : चितचोर

1- तोड़ नेह के बाँध तुम, चले गये चितचोर । धधक रही अति वेदना,मचा हृदय में शोर ।। दावे सारे खोखले, वादे झूठे यार बेबस बेचारा हुआ, अटूट प्रेम की डोर ।। 2- चितचोर तुम्हारी बांसुरी, मन को लेती मोह। ब्रज की सारी गोपियाँ, लगी दिखाने छोह ।। जल जल मन में सोचती, हुई बांसुरी […]

कविता

मैं धरा अधीर हूँ

मैं धरा अधीर हूँ पीड़ित मन की पीर हूँ। सोखती हूँ हर व्यथा और जमा गई जो नीर हूँ । आत्मग्लानि से भर उतरे आत्मा में तीर हूँ । रोकूँ मैं भावों के बाढ़ नहीं लक्ष्मण लकीर हूँ । …. मैं धरा अधीर हूँ।। — साधना सिंह

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

अजीब सी दोराहे पर खड़ी है ज़िदगी। थकी है ..आगे जाने को अड़ी है ज़िंदगी।। है राह में न रौशनी, न हाथ में मशाल है पर हर अधेंरी मोड़ पर लड़ी है ज़िंदगी ।। जितना दिया है हमनें  इस जहान में कभी मिलेगा वहीं हाथ .. ये कड़ी है ज़िंदगी।। दुआ में माँग ली थी […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

चलते चलते किस युग तक आये हम है, जिधर देखो नफरत का माहौल गरम है।। हर बात दुसरे को यहां नागवार गुजरती है, कैसा पड़ा है परदा न जाने कैसी भरम है।। लड़ लेना विचारों से कल जो ज़िदगी रही, अहम है जान छोड़ दो जो मन का अहम है।। अच्छा न कह सको तो […]

कहानी

कहानी – जीना ही पडेगा

ज़िन्दगी गुजर ही जाती है पर अभी रश्मि को समझ नहीं आ रहा था कि जीवन का ये अंधेरा कैसे कटेगा?…कैसी सुबह -शाम होगी?  सब कुछ अचानक ही घटित हुआ था। कभी उसने सपने मे भी नहीं सोचा था कि सुमित उसे बीच मझधार दो मासूम बच्चियों के साथ छोड़कर दुनिया से चला जायेगा। अभी […]

कविता

कविता – वो लेखिका नहीं थी

वो लेखिका नहीं थी… वो कवियत्री भी नहीं थी न जाने कब अपने भावो को सरल सहज आकार देने लगी कागजों पर । वो नहीं जानती थी कि क्या लिखती है पर जो जीती थी लिखती थी अपने लिए न कोई भय न संकोच न मात्रा देखती थी न व्याकरण समझती थी गिनती तो दुर […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

टपकते आंसुओं को खारा पानी न समझो, हो गई बात यूँ ही , आनी जानी न समझो। आहत मन के आह से बरसेगा तेजाब , इसी मोड़ पर खत्म ये कहानी न समझो । दुष्कर्म तुम्हारा, मर्यादा नारी की कुचली? इतनी तो बेमोल ज़िंदगानी न समझो । नहीं खत्म इसी बात पर ये बात होगी […]

कविता

कविता

चुप्पी चुभती हैं मन मूक है ऐसे वार किया है विवशता ने चौंक कर चीख उठी है अंतरात्मा । बिंध गए हैं सारे सवाल संग्राम हृदय और मस्तिष्क में है । भावो भरी प्रत्यंचा खालीपन लिए तरकश में सहमा सहमा शिथिल कांधे पर झूल रहा है। व्यथित विडंबना कि मौन से ही घायल मौन औंधा […]

लघुकथा

लघुकथा – विदा का वक्त

   शाम गहरा रही थी। दोनों का एक दुसरे से विदा लेने का वक्त आ चुका था। राजीव अमेरिका जाने के निर्णय पर अडिग था जब कि विभा अपनी माँ को छोड़कर जाने को तैयार नहीं हो रही थी । हो भी कैसे ? माँ का उसके अलावा दुनिया में था कौन।       […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

क्यों करें ‌कोई शिकायत दोस्तों है बुरी रोने की आदत दोस्तों जो कभी कहते थे खुद को बावफा सामने है अब हक़ीक़त दोस्तों बेसबब ही खुद को उनपर वार के सह रहा है दिल मलामत दोस्तों जाओ अब मुझको अकेला छोड़ दो मत करो कोई सियासत दोस्तों हौसला है अब भी गिरकर मैं उठूं फिर […]