गीतिका/ग़ज़ल

सवाल किया है तो जवाब भी सुनिए

सवाल किया है तो जवाब भी सुनिए दबी आवाज़ों का इंक़लाब भी सुनिए सिर्फ सिखाते ही मत रहिए बच्चों को उन की निगाहों का ख्वाब भी सुनिए कितना रोक सकेंगे नदी को बाँधों में बलखाती पानी का रूबाब भी सुनिए सब कुछ लिख डाला अमीरों के नाम एक दिन गरीब का अभाव भी सुनिए मर्द […]

गीतिका/ग़ज़ल

तेरे शहर में फिर से आना चाहता हूँ मैं

तेरे शहर में फिर से आना चाहता हूँ मैं मेरा दिल फिर से जलाना चाहता हूँ मैं जो आग लगी लेकिन फिर बुझी नहीं उसी राख से धुआँ उठाना चाहता हूँ मैं इक दरख्त पे अब भी तेरा मेरा नाम है उसे अब शाख से मिटाना चाहता हूँ मैं तेरे नाम के किताबों में जो […]

गीतिका/ग़ज़ल

कुछ किस्से और कुछ कहानी छोड़ आए

कुछ किस्से और कुछ कहानी छोड़ आए हम गाँव की गलियों में जवानी छोड़ आए शहर ने बुला लिया नौकरी का लालच देकर हम शहद से भी मीठी दादी-नानी छोड़ आए खूबसूरत बोतलों की पानी से प्यास नहीं मिटती उस पे हम कुएँ का मीठा पानी छोड़ आए क्यों बना दिया वक़्त से पहले ही […]

कविता

रंग गोरा ही देते

थोड़ा ही देते लेकिन रंग गोरा ही देते इस लाचार बदन पे न स्याह रातों का बसेरा देते कैसा खिलेगा यौवन मेरा कब मैं खुद पे इतराऊँगी उच्छ्वास की बारिश करा के न कोहरों का घना पहरा देते ढिबरी की कालिख सी कलंकिनी मैं घर में जब मुझे जन्म ही देना था तो ऐसे समाज […]

गीतिका/ग़ज़ल

कितने वक़्त से जुबां से कोई बात निकाली ही नहीं

कितने वक़्त से जुबां से कोई बात निकाली ही नहीं और निकाले भी तो कैसे, कोई शख़्स खाली ही नहीं अब अफ़सोस होता है अपनी तमाम दुनियादारी पर खुद से ही बातें कर सकें, ऐसी कला पाली ही नहीं हर लम्हा, हर अहसास तक खर्च कर दिया दूजों पर अपनी जरूरत की चीज़ें तक मैंने […]

कविता

क्या होता है

अमूमन क्या होता है जब एक स्त्री और एक पुरुष साथ रहने लगते हैं एक पुरुष उतना ही पाने लगता है जितना एक स्त्री खोने लगती है और इसका हिसाब कोई गणित, विज्ञान या शास्त्र नहीं दे सकता और ना ही एक पुरुष इसका जवाब दे सकती है केवल और मात्र पूर्ण से अपूर्ण हुई […]

इतिहास

सुशांत ,आखिर क्यों ,सुशांत !

आत्महत्या निस्संदेह में एक जघन्य पाप है। एक आदमी जो खुद को मारता है, उसे इस दुनिया में बार-बार लौटना होगा और उसकी पीड़ा भुगतनी होगी। — श्री रामकृष्ण परमहंस दुर्खीम द्वारा प्रतिपादित पुस्तक Le suicide (The suicide) सन् 1897 में प्रकाशित हुई जिसमें आत्महत्या के सिद्धांत के बारे में उल्लेख है। इस पुस्तक में […]

सामाजिक

अलग से दिखने वाले लोग

“कभी-कभी आपके आस-पास के लोग आपकी यात्रा को समझ नहीं पाएँगे । उन्हें इसकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि यह उनके लिए है ही नहीं ।” – जौबर्ट बोथा “शायद ही कभी, हमारे समाज को ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों के दर्द,आघात और पीड़ा का एहसास होता है या ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों, विशेष रूप से […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

काश कि बुद्ध आज भी होते……

प्रतीक्षा में बैठी यशोधरा के लिए सिद्वार्थ नहीं आया करते हैं,केवल बुद्ध आते हैं लेकिन केवल यशोधरा के लिए नहीं बल्कि जन्म और मृत्यु के कालखंड पर व्याकुल होते हर प्राणी के लिए। बुद्ध के पूर्वाध में जो सिद्धार्थ थे उन्हें अपनी यशोधरा का प्रेम अवश्य नज़र आता था लेकिन उत्तरार्ध में ज्ञान चक्षु खुलने […]

सामाजिक

क्षमा का दान देना सीखिए

क्रोध एक प्राकृतिक भावना है। ईसा पूर्व 200 वर्षों से 200 ईसवी तक के काल के बीच लिखे गए नाट्य शास्त्र में क्रोध को एक ‘रस’ या नैसर्गिक भाव कहा गया है। अमेरिकन फिजियोलॉजिकल एसोसिएशसन ने ‘गुस्से को विपरीत परिस्थितियों के प्रति एक सहज अभिव्यक्ति कहा गया है। इस उग्र प्रदर्शन वाले भाव से हम […]