सामाजिक

आखिर क्या है प्रेम ?

क्या प्रेम कोई आकर्षण है ,दैहिक आसक्ति है ,सम्भोग की इच्छा है ,पल दो पल का जुड़ाव है ,या बिना कुछ बोले या कहे भी एक दुसरे के लिए जीने-मरने की कवायद है या इन सब से इतर कुछ और ही है ? क्या प्रेम की परिभाषा गढ़ने के लिए पहले प्रेम क्या नहीं है […]

सामाजिक

“लेबल” लगाने से बचिए

अकस्मात हम घंटे दो घंटे में किसी से बातचीत कर के उसके प्रति एक ठोस राय तैयार कर लेते हैं और फिर उसी राय से हम उस व्यक्ति के चाल -चलन, पालन -पोषण , रहन -सहन ,पढाई-लिखाई ,राजनीतिक समझ ,सामाजिक सरोकर इत्यादि सब के विषय में जान लेते हैं। लेकिन यह न केवल गलत है […]

स्वास्थ्य

खुश होना और खुश रहना इतना कठिन तो नहीं।

“ख्वाहिश सचमुच कितने बेसिर-पैर के हैं होते कोई जूते को रोता है ,किसी के पैर नहीं होते। ” आज की पीढ़ी जब भी अपनी तुलना अपने पूर्वजों से करती है तो उनको ज्यादा खुश और दीर्घायु पाती है और स्वयं को अवसाद से ग्रस्त और जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा हुआ। हालाँकि ऐसा बिलकुल भी […]

कविता

वो सवाल से डरता बहुत है

वो सवाल से डरता बहुत है जो भी जुल्म करता बहुत है क्यों हुआ हादसा, क्यों लुटे रहजनें अगर पूछो तो फिर लड़ता बहुत है तालीमो-ओ – किताबों से ना कोई वास्ता हुई गर संजीदी बातें तो बिगड़ता बहुत है धर्म,जात,प्रान्त,संप्रदाय मिटाने की बातों पे घड़ी भर में आँखों में ख़ून उतरता बहुत है किसकी […]

गीतिका/ग़ज़ल

दवा करो तो फिर दुआ भी करो (नज़्म)

दवा करो तो फिर दुआ भी करो मन की आँखों से छुआ भी करो आग लगाने का जूनून है तो फिर अपने जाहिलपन को धुआँ भी करो कलेजे पे चढ़के बैठे हो इस ज़मीं के मोहब्बत में ये जिस्म रूआँ* भी करो अदबो-ओ-रिवाज़ का पुतला बना रखा है बच्चों के साथ बच्चे कभी हुआ भी […]

इतिहास

जन मानस के शायर दुष्यंत कुमार

दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें पढ़कर ऐसा लगता है कि वो हिन्दी से कहीं ज्यादा हिन्दुस्तान की ग़ज़लें है। जिनमें उस समय के आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष, एवं परिस्थितियों से जूझते रहने का चित्रण किया है। अपने अशआर में बारूद भरकर दुष्यन्त कुमार ने शायरी के एक ऐसे स्वरूप को दिखाया जिससे हिन्दी साहित्य में […]

गीतिका/ग़ज़ल

अभी आँखें बंद रहे तो ही सही

अभी आँखें बंद रहे तो ही सही है ख़्वाब नज़रबंद रहें तो ही सही है मसअला है तेरे और मेरे बीच का सलीका हुनरमंद रहे तो ही सही है जो भी लहजा है तेरे इख़्तियार में मुझे भी पसंद रहे तो ही सही है मैं दरिया हूँ तो अपनाना था मुझे तू कोई समंदर रहे […]

राजनीति

विरोध व्यक्ति का नहीं, शक्ति का कीजिए।

शक्ति की आशक्ति, एक सामान्य मनुष्य को भी आतातायी होने पर विवश कर देती है। जब शक्ति के पीछे,दण्ड का भय और जिम्मेदारी की जवाबदेही खत्म हो जाए,तो समाज आक्रान्त हो जाता है। शक्ति कभी भी स्वयं, दुरुपयोग नहीं करती जब तक कि शक्ति से समक्ष दबने वाले लोग हथियार डाल कर विरोध करना न […]

राजनीति

शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा (Education) शब्द की व्युत्पत्ति लेटिन शब्द “एडुकेयर ” से हुई है जिसका अर्थ है “पढ़ाना -लिखाना “,”आगे बढ़ाना ” और ” विकसित करना। ” शिक्षा का संधि विच्छेद है- शि = नेतृत्व करना /प्रवेश करना और क्ष = क्रिया/कार्य ,मतलब शिक्षा = योग्य बनाने वाला। इसलिए सरल भाषा में शिक्षा का आशय है पढ़ाने […]

राजनीति

स्वराज और सुराज

“स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे “-लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल के द्वारा उद्घोषित इस वाक्य ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा प्रदान की थी और आम मानस में इक नई ऊर्जा का प्रवाह किया था। प्रकृति का हर अव्यव स्वाधीनता से जीना चाहता है और मानव इस प्रकृति […]