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  • गुनाह यहाँ रोज़ होता है

    गुनाह यहाँ रोज़ होता है

    तुम्हें बस ख़बर ही नहीं है वर्ना गुनाह यहाँ रोज़ होता है इस हुश्न की चारागरी में तो इश्क़ तबाह यहाँ रोज़ होता है ज़ख़्म सहने की आदत है सो दुआ फ़ना यहाँ रोज़ होता है...



  • रोटियाँ

    “चाची,रोटी क्या इतनी भी गोल हो सकती है,मानो कि पूनम का चाँद हो जैसे और वो भी बिना किसी दाग के। अगर तुम ऐसी ही रोटियाँ मुझे खिलाती रही तो मैं तो पूरे महीने का राशन...


  • तुम चलोगी क्या

    तुम चलोगी क्या

    “तुम चलोगी क्या?” क्षितिज ने जूतों के फीते बाँधते हुए रसोई में व्यस्त रश्मि से पूछा। कुकर की सीटी में क्षितिज की आवाज़ कहीं दब गई और सवाल जस का तस वहीं खड़ा रहा। जब कुछ देर...


  • कविता

    कविता

    क्या सुनाना था तुम महफ़िल में ये क्या सुना आए अगले शायर का कद शायद तुम्हें मालूम नहीं है बस एक ही वस्ल की उम्र थी तुम्हारे इंतज़ार की इश्क़ करनेवालों की हद शायद तुम्हें मालूम...

  • कविता

    कविता

    मैं पीने को तो समंदर भी उठा लाता तेरी निगाहों से क्यों रिहाई नहीं मुझे महफ़िल झूम उठा है तेरी झलक से वो तस्वीर तेरी क्यों दिखाई नहीं मुझे वो नज़्म तेरे ही गाके मशहूर हो...