कविता

विचार कभी मर नहीं सकते

आज तुम मुझे नकार दोगे अपनी आत्म-संतुष्टि की भूख में गिरा दोगे मुझे मेरे शीर्ष से जो मुझे प्राप्त हुआ है मेरे अथक प्रयत्न से और तुम चोरी कर लोगे मेरे सारे पुरूस्कार जो मेरे हाथ की लकीरों ने नहीं न ही मेरे माथे की तासीर ने दी है बल्कि जो मैंने हासिल किए हैं […]

कविता

मेरी कविताएँ

मेरी कविताएँ नहीं होना चाहती शामिल निरर्थक आपाधापी में शेयर,लाइक,कमेंट्स की झूठी मक्कारी में जहाँ भाव,अर्थ सब नदारद हैं किसी शीर्ष स्थान की तैयारी में मेरी कविताऍं बात करना चाहती हैं उन सभी मुद्दों पर जिनको दुत्कारा गया है जिनको रास्ते से धकेल कर हटाया गया है जिनको उपेक्षित किया गया है मात्र इस बात […]

कविता

आखिर सत्ता का उनको भी शुमार नया नया है

वायदे बेचने का ये बाज़ार नया नया है कहते हैं साहेब का रोज़गार नया नया है दिल जीत लेते थे अपनी जुबानी कसरतों से उनको अपनी शोहरत का खुमार नया नया है कब तक बचे रह सकेंगे नफासत में वो भी आखिर सत्ता का उनको भी शुमार नया नया है एक चोट पर इतनी घबराहट […]

गीतिका/ग़ज़ल

मदभरी अदाओं से मुझे सताया कर

मुझे भर के अपनी निगाहों में सपने बनाया कर और मेरी नींदों को भी सतरंगी शमां दिखाया कर यकीं कर,तुम्हारे जिस्मों-जां पे बस मैं ही छा जाऊँगा कंदील की तरह मुझे कभी जलाया,कभी बुझाया कर हुश्न यूँ आएगा निखर के कि संभालना मुश्किल हो जाएगा कभी माँग में सिन्दूर,कभी माथे पे मुझे बिंदी सा सजाया […]

गीतिका/ग़ज़ल

मुझे मैकदों की खबर दे,अभी प्यालों को खबर न दे

मुझे मैकदों की खबर दे,अभी प्यालों को खबर न दे मैं खुद को खोना चाहता हूँ ,उजालों की खबर न दे उलझ के रह गया गया हूँ ज़माने की रहबरी में ही सुलझाने में कुछ वक़्त लगेगा,ख्यालों की खबर न दे सो गयी है सारी दुनियादारी,मैं भी सोना चाहता हूँ मेरी नींद,मेरे ख़्वाबों को तो […]

गीतिका/ग़ज़ल

मुझे उनका दीदार कई बार देना

मैं ग़मों से घिरा हुआ हूँ कई सदी से तुम आना कभी तो नज़र उतार देना माँ नहीं रही तो कमी बहुत खलती है तुम आना तो मेरा आँगन बुहार देना अँधेरों का शागिर्द ही हो गया हूँ जैसे रौशनी सा तुम मेरा जीवन सुधार देना वक़्त सारा उड़ गया काम-काजों में मुझे भी अब […]

गीतिका/ग़ज़ल

है बाज़ार बहुत गर्म दरिंदगी का

तुम लेके आओ भीड़,मैं मुँह मोड़ लेता हूँ इंसानियत से अब हर रिश्ता तोड़ लेता हूँ जानवरों के लिए इंसानों की अब बलि दो इतिहास के पन्नों में ये क़िस्सा जोड़ लेता हूँ आतंक का साया बढ़ा दो तुम रोज़ बेइन्तहां मैं आँखें बन्द करके अपनी राहें मोड़ लेता हूँ तुम अब और ज्यादा जहमत […]

गीतिका/ग़ज़ल

कभी चाँद बनके तू भी मेरी छत पे आ जाया कर

बस मुझे ही अपनी गलियों में यूँ ही न बुलाया कर कभी चाँद बनके तू भी मेरी छत पे आ जाया कर मैं जाता ही नहीं किसी भी मंदिर और मस्जिद में बस तू ही मुझे मेरे ईश्वर,खुदा सा नज़र आया कर मैं क्यों जाऊँ किसी भी काबा या काशी को कभी मेरी तासीर पर […]

गीतिका/ग़ज़ल

सदनों में कभी हंगामा,कभी जलसा होता रहा

क़त्ल हुआ और यह शहर सोता रहा अपनी बेबसी पर दिन-रात रोता रहा ।।1।। भाईचारे की मिठास इसे रास नहीं आई गलियों और मोहल्लों में दुश्मनी बोता रहा ।।2।। बेटियों की आबरू बाज़ार के हिस्से आ गई शहर अपना चेहरा खून से धोता रहा ।।3।। दूसरों की चाह में अपनों को भुला दिया इसी इज्तिराब […]

लघुकथा

महत्वाकांक्षा

“प्यार की मजार पे चढ़ाए गए फूल भी फूल ही होते हैं,जो बीतते वक़्त के साथ मुरझाने लगते हैं। जो फूल कभी अपनी खुशबू के लिए प्रेयसी के बालों में झूमा करते हैं, वो दिन बदलते ही किसी चौराहे पे अपरिचित की तरह दुत्कार दिए जाते हैं” दिव्या और संभव ने अपने प्यार की शुरुआत […]