गीतिका/ग़ज़ल

अभी आँखें बंद रहे तो ही सही

अभी आँखें बंद रहे तो ही सही है ख़्वाब नज़रबंद रहें तो ही सही है मसअला है तेरे और मेरे बीच का सलीका हुनरमंद रहे तो ही सही है जो भी लहजा है तेरे इख़्तियार में मुझे भी पसंद रहे तो ही सही है मैं दरिया हूँ तो अपनाना था मुझे तू कोई समंदर रहे […]

राजनीति

विरोध व्यक्ति का नहीं, शक्ति का कीजिए।

शक्ति की आशक्ति, एक सामान्य मनुष्य को भी आतातायी होने पर विवश कर देती है। जब शक्ति के पीछे,दण्ड का भय और जिम्मेदारी की जवाबदेही खत्म हो जाए,तो समाज आक्रान्त हो जाता है। शक्ति कभी भी स्वयं, दुरुपयोग नहीं करती जब तक कि शक्ति से समक्ष दबने वाले लोग हथियार डाल कर विरोध करना न […]

राजनीति

शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा (Education) शब्द की व्युत्पत्ति लेटिन शब्द “एडुकेयर ” से हुई है जिसका अर्थ है “पढ़ाना -लिखाना “,”आगे बढ़ाना ” और ” विकसित करना। ” शिक्षा का संधि विच्छेद है- शि = नेतृत्व करना /प्रवेश करना और क्ष = क्रिया/कार्य ,मतलब शिक्षा = योग्य बनाने वाला। इसलिए सरल भाषा में शिक्षा का आशय है पढ़ाने […]

राजनीति

स्वराज और सुराज

“स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे “-लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल के द्वारा उद्घोषित इस वाक्य ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा प्रदान की थी और आम मानस में इक नई ऊर्जा का प्रवाह किया था। प्रकृति का हर अव्यव स्वाधीनता से जीना चाहता है और मानव इस प्रकृति […]

कहानी

स्त्री-मन

सिद्धान्त और भावना कॉलेज की कैंटीन में घंटों से बैठे हुए थे लेकिन उनकी अभी तक एक कॉफ़ी खत्म नहीं हुई थी । दोनों घंटों से एक दूसरे की आँखों में डूब कर उस रस का आनन्द ले रहे थे जो किसी कॉलेज की किसी भी कैंटीन में नहीं मिलती । भावना और सिद्धान्त सामजशास्त्र […]

सामाजिक

क्या हम अपनी अपेक्षाओं से आहत हैं !!!

” ये मेरी सारी उम्मीदें मुझे कहाँ ले कर जाती हैं , मुझ से मिलाने को मुझ ही से जुदा कर जाती हैं। ” मनुष्य को अवश्य प्रगतिशील होना चाहिए ,यह मनुष्य होने की सर्वप्रथम अवधारणा भी है और मनुष्यता का धर्म भी। अगर पुरा-पाषाणिक युग में मनुष्य आग,पहिए और पत्थर के औज़ारों से खुश […]

सामाजिक

अखबार पढ़ने की कला

किस भी कार्य को सम्पादित करने में जो तथ्य सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है,वह है-रुचि। यदि आपकी रुचि संगीत सुनने में है तो आप स्वयं ही अपने व्यस्त दिनचर्या में भी उसके लिए समय निकाल ही लेंगे। बस में, ट्रेन में, मेट्रो में या फिर रोड पर चलते हुए भी आप हेडफोन लगाकर ऑफिस […]

सामाजिक

सेक्स और जेंडर

अमूमन सेक्स और जेंडर को हमारे समाज में एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखा जाता है ,कित्नु यह अवधारणा सत्य से उतनी ही दूर है जितना कि धरती से चन्द्रमा। समस्या हमारे समाज की सोच की भी है कि इन विषयों पर परिचर्चा करना आज भी दुष्कर्म ही माना जाता है। विद्यालयों में […]

संस्मरण

खेल क्या-क्या सिखा जाता है

प्यारे भैया , जो बात बर्षों से मेरे दिल में दबी पड़ी थी ,आज मैं उसे इस खत के जरिए आपके पास पहुँचाना चाहता हूँ। मोबाइल और टेलीफोन पर बात करते समय हम आधी बातें भूल जाते हैं या बातों का सही अभिप्राय ,भावनाओं के साथ व्यक्त नहीं कर पाते। खत लिखना मेरे लिए इसलिए […]

भाषा-साहित्य

साहित्य ही समाज को गढ़ता है

समाज का ऐसा कोई वर्ग नहीं है जो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में साहित्य के किसी न किसी विधा के संपर्क में न आया हो। इतिहास से लेकर अब तक की बात करें तो भित्तिचित्र ,शिलालेख ,मिट्टी और काँसे के बर्तनों पर उकेरे चित्र, पत्तों पर लिखे शब्द ,लोक संगीत ,देववाणी ,सत्संग […]