कविता

मैं गरीब हूँ बस यही पहचान मेरा है

।ओ साहब मैं गरीब हूँ बस यही पहचान मेरा है।। हां गरीब मुझको सब कहते, मेरा कोई ईमान कहां है, सपना देखा था इक घर का पर मेरा वह घर कहां हैं। मां – बाप का बनूंगा सहारा, पर मेरा रोज़गार कहां है, मेहनतकश मुझ गरीब का, अपना खेत खलिहान कहां है। ओ साहब मैं […]

कविता

हे ईश्वर! मुझे नेता बनवा दो

हे ईश्वर! मुझे नेता बनवा दो हे! ईश्वर ऐसा वर दो मैं भी नेता बन जाऊं। घोटाले पर घोटाला कर संपत्ति अथाह जुटाऊं। अपना सारा कालधन विदेशों में जमा कराऊं। गाड़ी, बंगला लेकर मैं, परियों संग मस्ती उड़ाऊं। चुनावी वादों को मैं पांच साल के लिए भूल जाऊं। जनता मुझसे सवाल ना करें ऐसा मैं […]

सामाजिक

मजबूरी में जहर बेच रही है भारतीय माताएं

मैं अपने सपरिवार रविवार को रेलगाड़ी में बैठ हैदराबाद से वाराणसी जा रहा था। बहुत तरीके से मांगने वाले आ – जा रहे थे। जैसे कि कोई झाड़ू लगाकर, कभी छोटे छोटे बच्चें गाना गाकर, कभी नपुंसक लिंग वाले भी आकर मांग रहे थे। मैं भी अपने खुशीनुसार दे रहा था। मेरे पिताजी भी मेरे […]

कविता

कुर्सी का खेल

राम आपके देश में अब न जाने क्या क्या चल रहा है, सबका साथ सबका विकास जातिवादियों को खल रहा है। जाति वर्ग में बंटकर राम आपका जन्मभूमि जल रहा है, शिक्षित युवा स्वरोजगार का पकौड़ा तल रहा है। दलित शोषित के नाम पर दंगा भी करवाते हैं, सच बोलने वाले विशेष दल का भक्त […]

राजनीति

जागो दलितों जागो।

बुद्धू चमार का बेटा चेथरु आज घर को सर पर उठा लिया है। आज तक इतने गुस्से में उसे मैंने तो कभी नहीं देखा था। आम तौर पर वह बहुत सामान्य रहता है। उसे राजनीति से कोई दूर दूर तक का नाता नहीं रहा है। वह सिर्फ पढ़ने, थोड़ी देर दोस्तों के साथ खेलने और […]

कविता

ले लें बैंक से कर्ज उधार

मां – बाप ने बस यही सिखाया, ईमानदारी का पाठ पढ़ाया मेहनत की रोटी अच्छी है रात – दिन यही रटवाया पर मेहनत से क्या कर सकते यार अपनी जिंदगी बसर ना होगी लोगों पर कोई असर ना होगी चलो करें अब एक काज यार सत्ताधारी नेताओं के बने थोड़े दिनों के लिए चाटुकार उनके […]

सामाजिक

क्या हम राजनीतिक दलों के गुलाम हो गए हैं

श्रीभगवान के मन में यह सवाल बार बार आ रहा है कि क्या हम आजाद भारत के शिक्षित लोग सचमुच आजाद हैं। नहीं, मुझे तो नहीं लगता। आमतौर पर सभी को यह हर गांव समाज में देखने को मिलता है। जब भी कोई दो परिवारों में लड़ाई होती है, तब आम तौर पर कुछ सालों […]

कविता

वाह रे राजनीति

एक पुष्प अर्पित ना किये शहीद चंदन के अर्थी पर, रोते हैं ये नमाज़ी पार्टियां सिर्फ गद्दारों के बरसीं पर। राहुल, कजरी, सब के सब मातम मनाने दौड़ते हैं, दलित शोषित के मसीहा हम ढिंढोरा ऐसा पीटते हैं। जब चाहे गठजोड़ जिससे, अपने हित में करते हो, हाय यह कहा उसने बस, चुनाव में आहे […]

कविता

मत दो हमें झूठी बधाई

मत दो हमें झूठी बधाई, यह बधाई किस काम की, आज का यह सम्मान हमें दिख रहा है बस नाम की। साल के ३६४ दिन तुम छेड़ते हो समझ संपत्ति हराम की, हाय क्या चीज़ है कहते हो जब लगाते हो दो घूंट जाम की। कितने मुश्किलों का सामना करती हैं नारियां ज़हान की, झांसे […]

हास्य व्यंग्य

नानी का गांव

क्या हाल है भाई रमेश आज उदास लग रहे हो। घर में सब ठीक-ठाक है ना। हां भाई घर में तो सब ठीक ही है। फिर उदास क्यों हो घूरा ने पूछा, रमेश बहुत धीमी स्वर में बोला, क्या बताऊं यार। मेरी धर्मपत्नी हमेशा मेरे साथ रहने की कसमें खाती है। जिससे मर्ज़ी झगड़े मोल […]