कविता

एकांत और अकेलेपन

एक समय था, जब मैं चाहता था, एकान्त। तब कुछ पढ़ने की, कुछ बनने की, किसी को पढ़ाकर, कुछ बनाने की, तीव्र इच्छा, मुझे एकान्त के लिए, मजबूर करती थी। एक समय था, जब साथी को चाह थी, मेरे साथ की, बेटे को चाह थी, हर पल, हर क्षण, हर दिन, हर राह, मेरे साथ […]

कविता

कर्म जीवन का मर्म

कर्म, कर्म, कर्म! कर्म जीवन का मर्म। सक्रियता ही, जीवन की निशानी है। इच्छाएँ, कामनाएँ, बाधाएँ, पीड़ाएँ, आस्थाएँ और भावनाएँ, चुनौतियों का बीड़ा, तर्क-वितर्क के होते हुए भी, कर्म के बिना, व्यक्ति है बस एक कीड़ा। जीना ही है, सबसे प्राचीन धर्म! कर्म, कर्म, कर्म! कर्म जीवन का मर्म। छोटा हो या बड़ा, अमीर हो […]

गीत/नवगीत

सबके विकास की बातें करते

ईर्ष्या, द्वेष,  नफरत है दिल में,  किंतु, प्रेम के गाने गाते। सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।। करते रहे औरों की समीक्षा। कैसे पूरी हो?  फिर इच्छा। सबको सीख देत हो क्षण-क्षण, खुद ही, खुद की, ले लो परीक्षा। भ्रष्ट आचरण, कर्महीन धन,  उससे, कराते हो जगराते। सबके विकास की बातें […]

गीत/नवगीत

नारी ने भरमाया है

प्रकृति सृष्टि का गूढ़ तत्व है, समझ न कोई पाया है। नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।। नर, सागर की, गहराई नापे। मौसम की कठिनाई भी भाँपे। आसमान में उड़ता है नर, इससे देखो, पर्वत काँपे। नारी की मुस्कान ने जीता, प्रकृति की कैसी माया है। नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

संग-साथ की इच्छा सबकी

पुष्प की चाह, सभी को होती, कुछ ही पल को वह खिलता है। संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।। चाहने से यहाँ, कुछ नहीं होता। काटता है वही, जो व्यक्ति बोता। कर्तव्य रहित अधिकार जो चाहे, कदम-कदम वह, निश्चित रोता। साथ उसी को, मिलता जग में, प्रेम सूत्र रिश्ते सिलता है। […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

 प्रकृति न हमसे न्यारी है

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है। महासागर,  पर्वतमालाएँ, प्रकृति ही,  नर और नारी है।। प्रकृति का सूक्ष्म रूप है नारी। ललित लालिमा कितनी प्यारी! पर्वत हरीतिमा, ललचाती है, गोलाइयों में, भटकाती नारी। जीवन रस देती हैं नदियाँ,  पयस्वनी  माता नारी है। प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

नहीं माँगता बस देता है

अकेलेपन से जूझ रहे सब, साधक एकान्त का रस लेता है। समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।। इक-दूजे से सब हैं जूझें। मित्र कौन है?  कैसे बूझें? प्रेम-प्रेम कह, लूट रहे नित, भीड़ में अपना, ना कोई सूझे। परिवार में ही महाभारत होता, अपना वही जो नाव खेता है। समय […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

समाधान बनकर दिखलाओ

समस्याओं से,  तुम कभी न भागो, सोचो, समझो और गले लगाओ। किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।। रोते हुए को, कोई न देखे। सबके अपने-अपने  लेखे। समय की शिकायत करते हैं जो, करते रहते, वही  परेखे। बातों से,  कभी,  काम न होते,  चलो,  चलो और  चलते जाओ। किसी से, किसी की, […]

गीत/नवगीत

अपने आपको मित्र बनाओ

जब भी आपको साथ चाहिए, अपने साथी खुद बन जाओ। अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।। खुद को अच्छी तरह से जानो। क्षमताओं  को,  खुद पहचानो। करो कभी ना, आत्म प्रशंसा, सहयोग मिला, उसको भी मानो। समय है सीमित, काम करो, काम के केवल गाने न गाओ। अपने आपको मित्र बनाओ, साथी […]

कविता पद्य साहित्य

कहीं, कोई है क्या जगदीश्वर?

नारी है देवी, नर परमेश्वर। सबका अपना-अपना ईश्वर। पैदल चलकर भूख से मरते, कहीं, कोई है क्या जगदीश्वर? सच क्या है? और झूठ है क्या? जग जीवन का आधार है क्या? जन्म हुआ है तो मृत्यु भी होगी, मृत्यु के बाद, होता है क्या? कुछ हैं सनातन प्रश्न यहाँ पर। भारी पड़ते हैं, प्रश्न जहाँ […]