गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

रात को रात बोलता हूँ मैं लोग कहते हैं सिरफ़िरा हूँ मैं इम्तिहां ख़ूब लीजिये मेरा मुश्किलों में पला बढ़ा हूँ मैं मंज़िलों के करीब जाने को टीस ख़ारों की सह चला हूँ मैं एकला मुझको मानने वाले गौर से देख काफ़िला हूँ मैं दौरे नफ़रत की धुँध में गुम हूँ चाह का लापता पता […]

गीत/नवगीत

सो जाती है न्याय व्यवस्था

पीड़ित को दे तारीखें जब, सो जाती है न्याय व्यवस्था। तब कानून कबीलों वाले, जनता को भाने लगते हैं।। कुछ सत्ता की उदासीनता, कुछ शाशन का नाकारापन। नही सुनिश्चित कर पाता जब, तय कानूनो का अनुपालन।। राजनीति रक्षित अपराधी, जब आश्रय पाने लगते हैं… तब कानून कबीलों वाले, जनता को भाने लगते हैं… बरसों बरस […]

कुण्डली/छंद

मधुशाला

केवल श्रम की चाबी से ही, खुलता किस्मत का ताला कर्तव्यों से ही मिलती है, अधिकारों वाली हाला। जो साहस के साथ मथेगा, कठिनाई के सागर को उसके जीवन में छलकेगी, सुख सपनों की मधुशाला।। चलने का साहस करते जो, पावों में सहकर छाला मंजिल पर जाकर भरते हैं, कामयाबियों की हाला। जो सच्चाई से […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

दर्द के तन्हाईयों के उलझनों के दौर में कौन किसका साथ देता है ग़मों के दौर में है यही बेहतर जबां खामोश रक्खे आदमी बोलना अपराध सा है बंदिशों के दौर में टूट जाएगा किसी दिन किरचियों में देखना आईना बन जी रहा है पत्थरों के दौर में मै उसे पागल कहूँ या हिम्मतों की […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

फ़िरका परस्तियों की साज़िशों के बावज़ूद ज़िन्दा है प्यार बढ़ती नफ़रतों के बावज़ूद रख हौसला मिलेंगी मंज़िलें भी एक दिन मुश्किल सफ़र तमाम गर्दिशों के बावज़ू्द सच हारता नही है जानता हूँ मैं, तभी टूटा नही हूँ इतनी मुश्किलों के बावज़ू्द हैं साथ आपकी दुआ तभी तो ये चराग रोशन है गर्दिशों की आँधियों के […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

एक नगर में आबो दाना कब होता है बंजारों का ठौर ठिकाना कब होता है जाते हैं सब लोग गुलों वाले मौसम में बगिया में पतझर में जाना कब होता है खुशहाली में साथ निभाता है हर कोई कंगाली में साथ ज़माना कब होता है जिनके अपने छोड़ गये अपनों को तनहा उनके दिल का […]

गीतिका/ग़ज़ल

ज़्यादातर मतलब का है व्यवहार आज की दुनिया में

ज्यादा तर मतलब का है व्यवहार आज की दुनिया में है तो लेकिन कम है सच्चा प्यार आज की दुनिया में यूँ तो हर सू भीड़ लगी है, रोज और बढ़ती भी है पर गिनती के हैं तुम जैसे यार आज की दुनिया में सच्चाई गुमसुम गुमसुम गुमनाम और बेदम सी है सिर्फ़ फ़रेबों की […]

गीतिका/ग़ज़ल

हौसला है मंज़िलों का रास्ता मालूम है…

हौसला है मंजिलों का रास्ता मालूम है इसलिये तो ज़िन्दगी का फलसफ़ा मालूम है और कुछ मालूम चाहे हो नही हो पर हमें ज़िन्दगी का हर ज़रूरी कायदा मालूम है ये अलग हैं बात उसने होट खोले ही नही पर नज़र से जो कहा क्या क्या कहा मालूम है ये चढ़ा इक बार तो मुश्किल […]

गीतिका/ग़ज़ल

पूछ मत मेरे सफ़र का तज’रबा कैसा रहा…

पूछ मत मेरे सफ़र का तज’रबा कैसा रहा पाँव में छाले लिये अँगार पर चलता रहा ख़ूब कस मुझको कसौटी पर परीक्षा ले मेरी हर कसौटी पर ख़रा उतरूँगा ये वादा रहा शर्तिया बदलाव होगा ज़िन्दगी में एक दिन आप ही कहिये समय कब एक सा किसका रहा जानता है जो मिला तुझको उसी का […]

गीतिका/ग़ज़ल

शूल छालों और अनगिन ठोकरों के बाद भी..

शूल छाले और अनगिन ठोकरों के बाद भी मंजिलों पर हैं निगाहें मुश्किलों के बाद भी है करम मुझ पर ख़ुदा का ख़ास, शायद इसलिए जी रहा हूँ दुश्मनों की साजिशों के बाद भी बुझ गये हल्की हवा में दीप सारे झूठ के दीप सच का जल रहा है आँधियों के बाद भी चाहतों के […]