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  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    हदों से यूँ सितम की पार जाकर याद रखना सुकूं मिलता नही है दिल दुखाकर याद रखना खड़ा है झूठ की बुनियाद पर ऊँचा मकां जो गिरेगा एक दिन ये भर भराकर याद रखना वो जिनके...


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    इक यही मंजर दिखाई दे रहा है हर तरफ़ बस ड़र दिखाई दे रहा है हो रहा है मजहबों के नाम पर जो सिर्फ आड़म्बर दिखाई दे रहा है कह रहे हैं आप आलीशान जिसको घर...

  • साहिबे दस्तार होने चल दिए

    साहिबे दस्तार होने चल दिए

    साहिबे दस्तार होने चल दिए फूल भी अब ख़ार होने चल दिए यूँ बने रिश्ते तिजारत, आपसी मस’अले अख़बार होने चल दिए भावनाएं इस कदर बिकने लगीं धर्म भी बाज़ार होने चल दिए वो जिन्हें औजार...

  • गीत

    गीत

    बरस दर बरस फूँक रहे हैं, सदियों से जिनके पुतले हम। बरस दर बरस उनका कुनबा, और अधिक बढ़ता जाता है।। आदर्शों की लीलाओं का, मंचन मंचों तक सीमित भर। धर्म साधना मंदिर मस्जिद, ढ़ोंग प्रपंचों...

  • सामने वो अगर नही आता

    सामने वो अगर नही आता

    सामने वो अगर नही आता चैन फिर रात भर नही आता कुछ किये बिन बुलंदियाँ पा लूँ मुझको ऐसा हुनर नही आता मुफ़लिसी का पता चला जबसे कोई अपना इधर नही आता जोहते बाट थक गयीं...