गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

एक नगर में आबो दाना कब होता है बंजारों का ठौर ठिकाना कब होता है जाते हैं सब लोग गुलों वाले मौसम में बगिया में पतझर में जाना कब होता है खुशहाली में साथ निभाता है हर कोई कंगाली में साथ ज़माना कब होता है जिनके अपने छोड़ गये अपनों को तनहा उनके दिल का […]

गीतिका/ग़ज़ल

ज़्यादातर मतलब का है व्यवहार आज की दुनिया में

ज्यादा तर मतलब का है व्यवहार आज की दुनिया में है तो लेकिन कम है सच्चा प्यार आज की दुनिया में यूँ तो हर सू भीड़ लगी है, रोज और बढ़ती भी है पर गिनती के हैं तुम जैसे यार आज की दुनिया में सच्चाई गुमसुम गुमसुम गुमनाम और बेदम सी है सिर्फ़ फ़रेबों की […]

गीतिका/ग़ज़ल

हौसला है मंज़िलों का रास्ता मालूम है…

हौसला है मंजिलों का रास्ता मालूम है इसलिये तो ज़िन्दगी का फलसफ़ा मालूम है और कुछ मालूम चाहे हो नही हो पर हमें ज़िन्दगी का हर ज़रूरी कायदा मालूम है ये अलग हैं बात उसने होट खोले ही नही पर नज़र से जो कहा क्या क्या कहा मालूम है ये चढ़ा इक बार तो मुश्किल […]

गीतिका/ग़ज़ल

पूछ मत मेरे सफ़र का तज’रबा कैसा रहा…

पूछ मत मेरे सफ़र का तज’रबा कैसा रहा पाँव में छाले लिये अँगार पर चलता रहा ख़ूब कस मुझको कसौटी पर परीक्षा ले मेरी हर कसौटी पर ख़रा उतरूँगा ये वादा रहा शर्तिया बदलाव होगा ज़िन्दगी में एक दिन आप ही कहिये समय कब एक सा किसका रहा जानता है जो मिला तुझको उसी का […]

गीतिका/ग़ज़ल

शूल छालों और अनगिन ठोकरों के बाद भी..

शूल छाले और अनगिन ठोकरों के बाद भी मंजिलों पर हैं निगाहें मुश्किलों के बाद भी है करम मुझ पर ख़ुदा का ख़ास, शायद इसलिए जी रहा हूँ दुश्मनों की साजिशों के बाद भी बुझ गये हल्की हवा में दीप सारे झूठ के दीप सच का जल रहा है आँधियों के बाद भी चाहतों के […]

गीतिका/ग़ज़ल

रही उम्मीद जुस दर से वहीं रुसवा हुआ…

रही उम्मीद जिस दर से वहीं रुसवा हुआ हुआ जो भी हमेशा सोच से उलटा हुआ बताऊँगा अगर तो रो पड़ेंगे आप भी न पूछो साथ मेरे हादिसा क्या क्या हुआ सभी ने सिर्फ देखी होट पर खिलती हँसी कहाँ देखा किसी ने दिल मेरा टूटा हुआ तमन्ना हर तमन्ना को मचलती रह गयी कोई […]

गीतिका/ग़ज़ल

चाहते हैं आप ऊँचा पद अगर…

चाहते हैं आप ऊँचा पद अगर सीख लीजे चापलूसी का हुनर दूर कितनी चल सकोगे सोच लो मुश्किलों से है भरी सच की ड़गर मिल गया फिर से ठिकाना झूठ को देखिये सच फिर रहा है दर-ब-दर हो रही दीवार आँगन में खड़ी देख रोया फूट आँगन का शजर ग़र धरम अपना समझता आदमी क्यूँ […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

फिरकापरस्तियों की होगी हार एक दिन जीतेगा देखना जरूर प्यार एक दिन खुद को शिकारी मानते हैं जो बहुत बड़ा वे भी बनेगें देखना शिकार एक दिन तुमको यक़ीन हो न हो मुझे यक़ीन है फिर से बहेगी प्रेम की बयार एक दिन रिश्तों के बाग को वफ़ा से सींचते रहो हर हाल लौट आएगी […]

गीत/नवगीत

रोम रोम में राम बसे हैं, धड़कन-धड़कन गीत…

रोम रोम में राम बसे हैं, धड़कन-धड़कन गीत। हमको तो ये सारी दुनिया, लगती है मनमीत।। ज़िन्दगी प्रीत प्रीत बस प्रीत… तेर-मेर की सोच बनी है, सबके दुख का कारण। कर सकता हूँ सिद्ध इसे में, दे असंख्य उदाहरण।। निज उर झाँको दुख का कारण, होगा तुम्हें प्रतीत… अपने ही पापों के कारण, होते जन […]

गीतिका/ग़ज़ल

हाथ मिले मन में अनबन है, सच मानो…

हाथ मिले मन में अनबन है सच मानो भाई भाई का दुश्मन है सच मानो अपनो से तो ग़ैर भले हैं अपनो में बस कहने का अपनापन है सच मानो सोना तपता है भट्टी में तब जाकर सोने से बनता कुंदन है सच मानो जो मन में है वो चहरे पर दिखता है हर चहरा […]