कविता

हक़ीकत

आजकल हक़ीकत ख्वाबों से निकलकर, पूछती कहाँ है…? किस ओर जा रहे हो, और जाना कहाँ है…? हर शक्स परेशान है यहाँ जिये कहाँ थे, और जीना कहाँ है..? समय का आवरण नहीं देर करता है। उसे फर्क नहीं, आपने क्या खोया, और क्या पाया…? पल-पल घिसती उम्र सुख दुख से अलग नहीं एक ओर, […]

राजनीति सामाजिक

#ये_देश अब्दुल हमीद का है,

#ये_देश अब्दुल हमीद का है, अब्दुल कलाम का है, रसखान, वीर सावरकर, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह का है। ये देश हमारा है, हम सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों का है पर मट्ठीभर वोटप्रिय नेता इसे हिन्दू-मुस्लिम का देश घोषित कर रहे हैं। जानते है क्यों?????? क्योंकि हम अन्धे होकर उनका अनुशरण कर रहे है। वो अच्छे से […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

#भूमिका_रामावतार_की #भाग-1…..#मानस

#भूमिका_रामावतार_की #भाग-1…..#मानस भूमिका अर्थात आने वाली घटनाओं के लिए पृष्ठभूमि पूर्व से स्वतः ही बनने लगती है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जब-जब धरती पर अधर्म बढेगा तो किसी न किसी रूप में आकर मै धर्म की रक्षा करूँगा। भगवान विष्णु ने जब राम का अवतार लिया तो उसके लिए कितने ही […]

कविता

शंका के बादल

घिरा हूँ, शंका के बादलों के बीच मुझे निकालो ना! डर है, कहीं डूब न जाऊँ खामोशी में मुझे सम्भालो ना! छूटी उम्मीद, खुद से खुद के जीतने की मुझे बचा लो ना! हर वक्त ढकेला जाता हूँ पुरानी परछाइयों में मुझे छिपा लो ना! …….#मानस

उपन्यास

भूमिका, घाट-84 “रिश्तों का पोस्टमार्टम” .डाॅ शीतल बाजपेई

भूमिका कविता सिंह तथा सौरभ दीक्षित “मानस” की संयुक्त रूप की यह पहली कृति है पर ऐसा बिल्कुल भी नही लगा मुझे,, बल्कि ऐसा लग रहा था कि मैं मंझे हुए लेखकों को पढ़ रही हूँ। आप जब कहानी पढ़ना आरम्भ करेंगे तो विश्वास कीजिये आप स्वयं को पूरी कहानी पढ़ने से रोक नही सकेंगे, […]

उपन्यास

घाट-84 “रिश्तों का पोस्टमार्टम” भाग- (एक) 1

घाट-84, रिश्तों का पोस्टमार्टम भाग-(एक) 1 “चलो कपड़े पहनते हैं अब इश्क़ पूरा हुआ…“ छी….!!!. “बस यही रह गया है प्यार-मुहब्बत का पर्याय।” कहते हुए निशा ने किताबों को पास रखी मेज़ पर पटका। मैंने पीछे पलटकर देखा तो यो लगा मानो सुपरफास्ट ट्रेन का बेक़ाबू इन्जन मेरी ओर दौड़ा चला आ रहा है जिसे […]

कहानी

पराई औलाद कहानी

पराई औलाद कहानी “महेश को पता चलेगा तो रमेश को बहुत डांटेगा क्योंकि जब दोनो भाईयों ने गांव छुड़वाया था तो महेश अपनी माँ को अपने साथ ले गया और रमेश मुझे। अभी 3 महिने ही तो हुए हैं, महेश की माँ को गुजरे हुए। रमेश ने मुझे अपने घर से निकाल दिया। नहीं-नही दोनो […]

कविता

चल मुसाफिर! अकेला चलना अच्छा है।।

वक्त के साथ बदलना अच्छा है। चल मुसाफिर! अकेला चलना अच्छा है।। राह में और मौके भी मिलेंगें। मुहब्बत भी मिलेगी धोखे भी मिलेंगें।। पत्थरो की पीर सा पिघलना अच्छा है। चल मुसाफिर! अकेला चलना अच्छा है।। ये शहर अब खुदाओ का डेरा हुआ है। अँधेरा है, कहते सवेरा हुआ है।। खाली हैं सड़कें, तारे […]

सामाजिक

प्राइवेट जाॅब

प्राइवेट जाॅब चाय का कप उठाने ही वाला था कि हाथ लगा और कप के भीतर की चाय अपनी सारी मर्यादाओ को तोड़ते हुये फर्श पर जा गिरी। एक ओर प्लेट और दूसरी ओर कप के टुकड़े नजर आने लगे, कानों में कप टूटने की आवाज अभी भी साफ सुनाई दे रही थी फिर अचानक […]

गीतिका/ग़ज़ल

किसपे करे भरोसा होता ही अब नहीं।

किसपे करे भरोसा होता ही अब नहीं। ये दर्द बेतहासा सोता ही अब नहीं।। सोचा उगायें हम फसलों को प्यार की, वो बीज इश्क के भी बोता ही अब नहीं। रोकर निकालते थे पहले तो सारे ग़म, पत्थर हुआ मेरा दिल रोता ही अब नहीं। किसपे करे भरोसा होता ही अब नहीं। ये दर्द बेतहासा […]