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  • कविता: बदलते रंग

    कविता: बदलते रंग

    आज कुछ प्रज्ज्वाल लपटें उठ रही हैं मन के अंदर आज कुछ कंपित हुआ है जैसे भीतर का समंदर टूटते हुए तिलिस्मों का बयान लिख रहा हूँ मैं बदलते रंग धरती आसमान लिख रहा हूँ।। शब्द...



  • कविता: आत्मसमर्पण

    कविता: आत्मसमर्पण

    जगमग जगमग दीप जल उठे देवलोक से पुष्प बरसते अभिनन्दन की इस बेला में दर्शन को हैं प्राण तरसते वंदन कर मैं चरण पखारूँ दिव्य माल का अर्पण कर दूँ हे मोहन हे नटवर नागर आओ...

  • जयकार सुनाई नही देता

    जयकार सुनाई नही देता

    घनघोर घनन इस आंधी में तट पार दिखाई नहीं देता भारत माता की जय में जयकार सुनाई नही देता लूथड चीथड बिक जाते हैं अब सोने के दामों में लाखों की साज सजावट में श्रृंगार दिखाई...

  • जीवन पतंग

    जीवन पतंग

    जीवन की पतंग पतंग के मंजे से कटती ऊँगली से बहते रक्त की धार में बचपन की निकल आई यादों के साथ आज हो गए जैसे दो दो हाथ! बचपन कि जिसे बहुत पीछे छोड़ दिया...


  • आजकल की शादियाँ

    आजकल की शादियाँ

    आज कल शादियों का दौर चल रहा है, शादी…हम भारतीय सामाजिक मानवियों के लिए एक बड़ा कार्य है, दूर दूर के रिश्तेदार, दोस्त, चाचे भतीजे सब प्रकार के लोग शामिल होकर इसकी पूर्णाहुति देते हैं, शादी...