कविता

रात चाँदनी गहरी-गहरी

रात  चाँदनी  गहरी-गहरी प्रेम-प्रीत क्यू ठहरी-ठहरी ॥ चलो आज चाँदनी छू लें हम कुछ मन की चाही कर लें हम i जीवन नैया कब रुकी-रुकी ग़म की नदियाँ गहरी-गहरी ॥ हम-तुम जाने फ़िर हों  ना हों ये मधुर-मिलने फ़िर हो ना हो ! दुनियाँ क्यों है ठहरी-ठहरी क्यों नज़रें हैं प्रहरी-प्रहरी ॥ चलो आज बाँध […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

प्यार के मोड़ पर ,तुम मिलों तो सही। प्रेम की बारिशों में तुम भीगो तो सही।। नैनों में प्रेम मदिरा भरके तो देखो। मैकदे के जरा से दूर हों तो सही।। आचमन अधरों का तुम करों तो सही। प्रीत की मिश्री मन मे भरो तो सही।। हमने देखा नही,कुछ भी जाना नहीं।। प्रीत के गीत […]

कविता

रिवाज़

रात भर… जलता रहा अलाव.. और खुलती रही बोतलों पर बोतलें… और वो हँस रहे थे .. बेहूदा और फूहड़ हँसी….. अजीब अट्टहास के साथ…ही वो मशगूल थे …. खाने मॆं चिकन ,मटन और….और जाने क्या-क्या अनाप-शनाप और ले रहे थे चटकारे….. यहीं तक होता तो ठीक था….. हालाँकि अखर रहा था , ये सब […]