कविता

कविता

आसमान से तारे तोड़ लाने की जिद पाले हुए सुनहरे भविष्य के गर्त में बैठा हूँ मैं कचरे के ढेर पर— कभी न कभी पूरे होंगे सपने मेरे जो मैं देखता हूँ इन खुली आंखो से किताबें गर बदल न सके हालात मेरे ख्यालात बदलेंगे जरूर और मैं देख पाउंगा दुनिया को अपनी ही नजरों […]

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मेरा सुहाग

मेरे सुहाग की लाली समर्पित है उन नौजवानों को जिनकी हर सुबह अपने सीने पर गोली खाने की कवायद के साथ शुरू होती है— मेरी सतरंगी चूड़ीयाँ लहराना चाहती है उन वीर नौजवानों के लिए संगीत बनकर जिनके कान बंदूक की खट-खट सुनने की आदी हो चुकी है— मैं अपनी यह चुनरिया बिछा देना चाहती […]

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कोरा कागज

मेरे दिल के कोरे कागज पर तुम्हारा ही सिग्नेचर है जिसे जब चाहो जैसे चाहो भुना लो क्रेडिट या डेबिट कार्ड की तरह. . . सुनो प्यार और पैसा दो अलग अलग चीजेँ हैँ कभी भी मेरे दिल को ब्लैँक्ड चेक मत समझना वर्ना खो दोगे एक दिन पूरी जमा राशि . . . हो […]

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मुनिया

भूख ने पकड़ा दिया असमय चूल्हा चौका , बर्तन वासन गुड्डे गुड़ियोँ को खेलने की उम्र मेँ काम पर जाने लगी मुनिया – – – स्कूल जाते बच्चोँ को ललचाती नजरोँ से देखते देखते वह पार कर जाती है अपनी गली एक फलांग की दूरी पर ही है उसका अपना संसार जूठे बर्तन का अंबार […]

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वह पागल लड़की

गर्दन झुका कर पीली रौशनी में नहाई वह लड़की गुमसुम सी बैठी है चुपचाप लैम्प पोस्ट के नीचे —— ख्वाब देखा था उसने कभी पढ़ेगी बहुत पढ़ेगी उसकी दोस्ती थी इसी पीली लैंप पोस्ट की रौशनी से जबकि उसे करनी थी यारी चूल्हे की जलती पीली लौ से— बौखला सी जाती है कभी कभी वह […]

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अंतिम गिरह

मेरा सौन्दर्य तुमसे अछूता रहा आज तक न जान पाई सूने माथे में मैं मासूम दिखती हूँ या सिंदूरी मांग मुझमे रक्तिम आभा भरता है—- सुहाग चिन्ह जरूरी थे सुहागन दिखने के लिए मैं कहती हूँ दिखने से ज्यादा होना जरूरी है—– एक एक कर उतारती गई तुम्हारे होने के सबूत सारे निशान बिंदी से […]

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एक अकेला आदमी

घुप्प अकेले अंधेरे कमरे मेँ वीरानगी छा जाती है जब कोई हो अकेला नितांत अकेला . . . यह दुनिया,ये रिश्ते नाते सब बेमानी लगते हैँ जब इंसान होता है अकेला . . . खुद से बातेँ करते करते टूट जाता है एक दिन ठुँठ पेड़ के टुटे शाख के मानिंद अपने इर्द गिर्द बुन […]

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पतझड़

पीले पत्तोँ की खरखराहट मेँ सुनती हूँ मैँ तुम्हारे कदमोँ की आहट उसकी चरमराहट मुझे सुकून देती है कि तुम आ गए हो काश कि वह चरमराहट तुम्हारी पदचाप ही हो . . . बीते बसंत जब तुम चले गए थे आने का वादा करके हर पतझड़ लेकर आता है सौगात तुम्हारी यादोँ का तुम्हारे […]

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बदलता हुआ समय

लौट आई है वही खुशबू सांसोँ की महक चाय के प्यालो की साथ मेँ लौट आई है वही कहकहे सूने आंगन की कुछ नहीँ बदला न तुम ,न हम असल मेँ बदलता तो समय है दिन के तारीख बदल जाते हैँ कैलेँडर के पन्नोँ पर परत दर परत . . . समय ने ही हमदोनो […]

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यादेँ

ढलता सूरज भी बेबस हैतमस फैलाने कोयह डूबना हीअंधकार को धकेलता है हमेँरात गहन होती जाती हैऔर हम लाचार होते जाते हैँयह अंधियाराहमेँ जकड़ती रहती रहती हैकुछ यादेँ ऐसी ही होती हैँजिसे हमेँ जीना होता हैअंधेरोँ के साथसिवाय इंतजार केकि वक्त बदलेगारात को बीत जाने देते हैँउन यादोँ के साथ हीआँखेँ मूंदे प्रार्थनाएँ करतेआखिरइस रात की […]