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  • माया महाठगिनी हम जानी

    माया महाठगिनी हम जानी

    सब कहते हैं-मंहगाई बढ़ गई। कितना सरासर झूठ कहते हैं। इन झूठों के मारे यदि कल शाम तक धरती रसातल में मिले तो आप अचरज न कीजिएगा। अब देखिए न कल तक जो सिगरेट का कश...

  • व्यंग्य – कहीं… नाक, न कट जाए?

    व्यंग्य – कहीं… नाक, न कट जाए?

    मानव शरीर में अत्यंत ‘अल्पसंख्यक’ होने के कारण नाक को आरक्षण की सुविधा मिली हुई है। वह कटती है और कभी ऊँची भी होती है। दिमाग और दिल भी नाक के समान अल्पसंख्यक वर्ग में ही...

  • व्यंग्य – ऋतुराज का राज!

    व्यंग्य – ऋतुराज का राज!

    पधारो वसंत! तुम हर साल की तरह इस बार भी बिन बुलाए आ गए? बड़े बेशरम हो भाई!! तुम ऋतुराज हो! कुछ तो अपने मान-सम्मान और स्वाभिमान का ख्याल रखा करो? तुमसे अच्छी तो तुम्हारी ‘रानी-बरखा’...


  • जड़ की कसक

    जड़ की कसक

    पूछा है शाखों से जड़ों ने, हम बिन चैन क्या पाओगे? सूख गए जो प्राण हमारे, क्या तुम फिर मुसकाओगे? हमने धरती में दबकर माटी का बोझ उठाया है, बरखा-धूप सही शीतलता तब तुमने सुख पाया...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    कितने बदल गए यहाँ, हालात इन दिनों बिकने लगे बाज़ार में, जज़्बात इन दिनों। मासूम की निग़ाह में, सैलाब देखकर होती नहीं ज़मीन पर, बरसात इन दिनों। फ़सले-अमन को बोने का है, क़ायदा नया वो बाँटते...

  • ग़ज़ल : जमाना जानता है हम…

    ग़ज़ल : जमाना जानता है हम…

    हम अपने दुश्मनों को भी, गले हँसकर लगाते हैं, हुनर दुनियाँ में जीने का, चलो तुमको सिखाते हैं। जो कायल हो तबस्सुम के, हमारे जान लो इतना दहकती आग दिल में है, जिसे लब पर सजाते...


  • दीपक का अहंकार

    दीपक का अहंकार

    अकड़ दीप की देख के मैंने, प्रश्न एक जब उससे पूछा- “किस कारण तू झूम रहा है, किए हुए सिर अपना ऊँचा?” मस्त पावन के झोंकों के संग, उसने अपना अंतस खोला कुछ मुसकाया, कुछ इठलाया,...

  • हास्य व्यंग्य : मैं विदेशी नहीं

    हास्य व्यंग्य : मैं विदेशी नहीं

    एक शिक्षक होने के नाते कहता हूँ कि मुझे अपने प्रजातांत्रिक देश की शिक्षाप्रणाली का वह अंग सबसे अधिक पसंद आता है जब विद्यार्थियों को हाईस्कूल की परीक्षा में निबंध लिखने दिया जाता था-‘यदि मैं प्रधानमंत्री...