गीत/नवगीत

श्रद्धा के फूल – शहीदों की स्मृति में….

लेखनी कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो। जो धरा की गोद में, सब कुछ लुटाकर सो गये हैं बीज आज़ादी के जो, अपने लहू से बो गये हैं, जिनके कारण गंगा के, साहिल सुनाते गीत हैं, और बरफ की वादियों में, गूँजता संगीत है, वंदना में झुक के तुम भी, शीश […]

गीत/नवगीत

गीत – संदेश बिना आ जाओगे

जब गीत बुलाएँगे मेरे, तुम खुद को रोक न पाओगे संदेश बिना आ जाओगे। प्रेमी मन का जब गठबंधन, इक -दूजे से हो जाता है उठती है उर में हूक कहीं, प्रियतम जब कोई बुलाता है ये तो वाणी है रुहों की, कानों से ना सुन पाओगे। संदेश बिना आ जाओगे। दुनिया कहती है गीत […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – ज़माना जानता है हम, वफ़ादारी निभाते हैं

अपने दुश्मनों को भी, गले हँसकर लगाते हैं, ज़माना जानता है हम, वफ़ादारी निभाते हैं। जो कायल हो तबस्सुम के, हमारे जान लो इतना, दहकती आग दिल में है, जिसे लब पर सजाते हैं। ज़माने को अंधेरों का ख़जाना, बाँटनेवालों वो दीपक हैं कि सूरज को, नयी राहें दिखाते हैं। खड़ी करते दिलों के बीच, […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – देशभक्ति का वायरस

हमारे देश में पहले देशभक्ति की लहर साल में दो बार अनिवार्य रूप से आती थी- स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर । अब यह लहर चुनाव होने पर चल पड़ती है। चुनाव के समय की देशभक्ति अपने साथ देशद्रोह की भी लहर लाती है। जिसका अभाव राष्ट्रीय पर्वों में दिखाई देता है। ये बात और […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – खामोश! संविधान खतरे में है।

प्रसिद्ध है कि हमारे देश का संविधान सबसे बड़ा है। कुछ समय से देखने में आ रहा है कि हमारा संविधान साल में दो-चार बार खतरे में पड़ता रहता है। समझ नहीं आता ‘संविधान’ ताकतवर है या ‘खतरा’। देवराज इंद्र का सिंहासन न जाने किस धातु का बना था। इधर धरती पर कोई बाबा जी […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – मैं और कीड़ा

कहते हैं मनुष्य के दिमाग में एक कीड़ा होता है, जो समय-बेसमय पर उसे काटता रहता है। उस दिन कीड़े ने मुझे काटा और पूछा-“क्यों रे मानव खोपड़ी, ये मिलावट क्या होती है? तू इस पर विश्वास करता है?” मैंने कहा-”भैया मेरे, मिलावट पर विश्वास न करना भगवान पर अविश्वास करने के समान है। बिना […]

गीत/नवगीत

भारत माँ की शान बढ़ी

हुई विजय ना आज पराजय, भारत माँ की शान बढ़ी दोनो आँखें चमक उठी हैं, अधरों पर मुसकान बढ़ी। नव भारत का सृजन पर्व है, आओ मिलकर गान करें वंदन-अभिनंदन की भूमि को, मिलकर सभी सलाम करें सत्य-शांति की विजय पताका, हर युग में परवान चढ़ी, हुई विजय ना आज पराजय, भारत माँ की शान […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – घर में नहीं दाने

चंद्रमा का लालच मनुष्य को तो क्या ईश्वर को भी आरंभ से ललचाता रहा है। महाअवढर दानी शिव जी विष को तो पचा गये लेकिन चंद्रमा के प्रति अपने लोभ का संवरण न कर सके। न जाने कब से भारतीय माताएँ चंदा को मामा बताकर अपने लल्लाओं को बहला रही हैं। यह बात दूसरी है […]

गीत/नवगीत

मलय-हिमालय-विंध्य-सतपुड़ा

मलय-हिमालय-विंध्य-सतपुड़ा अंबर धरा पे लाते हैं अरब-हिन्द-बंगाल के मोती, तेरे पग सहलाते हैं जय भारती! हे भारत माँ! हम तेरे ही गुन गाते हैं। आज शहीदों के सपनों को, सच करके दिखलाएँगे माता की चुनर सजाने को, बलि-वेदी पर मिट जाएँगे हो तेरी जय-जयकार सदा, हम ऐसा गीत सुनाते हैं हम तेरे ही गुन गाते […]

गीत/नवगीत

प्यार का गीत

नहीं कोई सुंदर है तुझ-सा ज़मी पर फलक पर,इधर पर,उधर पर,कहीं पर। कहाँ चाँद ने रूप तुझ-सा है पाया कभी घटता जाए कभी बढ़ता आया कहाँ मेघों में तेरी आँखों-सा काजल हवा भी ना झूमे तेरा जैसे आँचल नदियों की कलकल में संगीत तो है तेरे सुर-सा मादक कहाँ गीत वो है कहाँ रात में […]