गीत/नवगीत

मौत का जश्न

अब तो जागो! आँखें खोलो, मौतें जश्न मनाती हैं चिता सजाती है दीवाली, कब्रें ईद मनाती हैं। मरघट और कब्रस्तानों में, लगा शवों का मेला हैमेरे बाद है तेरी बारी, तू ना यहाँ अकेला हैलचक-लचक कर आग की लपटें, नंगा नाच दिखाती हैं अब तो जागो! आँखें खोलो, मौतें जश्न मनाती हैं।1। सहमे-सहमे माटी के […]

गीत/नवगीत

मन से रंग लगाओ

विकट घड़ी है यारो लेकिन होली खूब मनाओमन के रंग लगाओ साथी! मन से रंग लगाओ। नहीं प्यार से बड़े है दूजे, रंग जगत में प्यारेहरे-लाल, नीले या पीले, सभी इसी से हारेभावों की पिचकारी से, सतरंगी जहाँ बनाओमन के रंग लगाओ साथी! मन से रंग लगाओ ।1। दिल ना दुखे किसी भाई, ऐसी होली […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – ठीक नहीं

अमरबेल की फसल उगाना ठीक नहीं अब साँपों को दूध पिलाना ठीक नहीं । जिनको ज्ञान नहीं है सुर और तालों काआँगन में उनको नचवाना ठीक नहीं । माना कि ये दौर है फैशन का भाईइसकी टोपी उसे लगाना ठीक नहीं । ये जूतों की भाषा ही पहचानेंगेभैंस के आगे बीन बजाना ठीक नहीं । […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल- आँख मारकर गला दबाया जाता

खूंखारों का धर्म बताया जाता हैगद्दारों को फ़र्ज़ जताया जाता है। धूल भरी है जिनकी क़ातिल आँखों में दर्पण अंधों को दिखलाया जाता है। कर दें ना बरबाद सियासत की चालें चोरों को कोतवाल दिखाया जाता है। सजे मिलेंगे कई भयानक से चेहरेजब भी इन परदों को हटाया जाता है। हम समझे थे वो पलकों […]

कविता

कहाँ भगतसिंह सोता होगा

उम्र अभी तेईस से थी कम,मगर बाँह में शेरों-सा दममिट जायेंगे ना था ये ग़मअंग्रेज़ों की साँस गयीं थमइंकलाब का सिंहनाद थागूँज उठा सारा अकाश थामगर न दो जन घबराते थेपरचे – परचे बिखराते थेजब संसद में आग लगी थीऔर हुकूमत जाग उठी थीआज सदन की चाल है बदलीमुर्गी बदली दाल भी बदलीअपनी बीन बजाते […]

गीत/नवगीत

कोरोना भी फ़ेल हो गया

अजब तमाशा खेल हो गयाकोरोना भी फ़ेल हो गया। जहाँ चुनावों के मेले हैं लाख-करोड़ों के रेलें हैं और मदारी के डमरू परबंदर बन जनता खेले हैवहाँ देख नेता की ताकतयमदादा का तेल हो गया कोरोना भी फ़ेल हो गया ।1। सात अजूबों से है बढ़कर इस भारत की धरती भाई हो विपदा कैसी भी […]

कविता

अंतर्मन

अंतर्मन जब मौन हो गयापीड़ा का पल गौण हो गया। आँख मूँदकर पलकों ने सबभाव हृदय के छिपा लिए हैं रुद्ध कंठ ने दर्द रोक करगान स्वरों के दबा लिये हैं पूछ रहा है बैरागी मन आज पराया कौन हो गया? आँखों से बहकर के आँसूमुसकानों को सींच रहे हैंशोणित में डूबे आखर येचित्र हृदय […]

लघुकथा

पोस्टमार्टम

बड़ी विचित्र शवयात्रा थी। अरथी हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख ईसाई चारों के काँधे पर थी। पीछे-पीछे चलनेवाले बौद्ध, जैन और धर्म संप्रदाय के लोग रह-रहकर कंधा देते चलते थे। तभी किसी को खोजती हुई पुलिस की लॉरी ने शव को उतारकर बीच चौराहे पर उसका पोस्टमार्टम करने का आदेश दिया- रोको। किसकी लाश है? चौराहे पर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ज़ख़्म पीठ के बता रहे, ये सारे हैं आप जहाँ से नहीं, खून से हारे हैं। जो खंजर लेकर हाथों में घूम रहे हटा मुखौटा तो सब अपने प्यारे हैं । जो समझा करते थे, वक़्त हमारा है उन्हें देखकर लगा, वक़्त के मारे हैं। धरा पे बिखरी धूल उठाकर देखा तो समझ ये आया […]

हास्य व्यंग्य

बेचारा आम नागरिक-रामलाल

आवश्यकता, आविष्कार की जननी है, और विलासिता उसकी रखैल। विज्ञान का इतिहास गवाह है साहब कि सारे आविष्कार अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए चाचाओं ने किये लेकिन भतीजों ने उन्हें मनोरंजन के बाज़ार में नचवा दिया। टेलिविज़न का स्क्रीन सनी लियोनी की धार्मिक फिल्मों के काम के लिए किया जा रहा है। आजकल मैट्रिक […]