हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – मैं और कीड़ा

कहते हैं मनुष्य के दिमाग में एक कीड़ा होता है, जो समय-बेसमय पर उसे काटता रहता है। उस दिन कीड़े ने मुझे काटा और पूछा-“क्यों रे मानव खोपड़ी, ये मिलावट क्या होती है? तू इस पर विश्वास करता है?” मैंने कहा-”भैया मेरे, मिलावट पर विश्वास न करना भगवान पर अविश्वास करने के समान है। बिना […]

गीत/नवगीत

भारत माँ की शान बढ़ी

हुई विजय ना आज पराजय, भारत माँ की शान बढ़ी दोनो आँखें चमक उठी हैं, अधरों पर मुसकान बढ़ी। नव भारत का सृजन पर्व है, आओ मिलकर गान करें वंदन-अभिनंदन की भूमि को, मिलकर सभी सलाम करें सत्य-शांति की विजय पताका, हर युग में परवान चढ़ी, हुई विजय ना आज पराजय, भारत माँ की शान […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – घर में नहीं दाने

चंद्रमा का लालच मनुष्य को तो क्या ईश्वर को भी आरंभ से ललचाता रहा है। महाअवढर दानी शिव जी विष को तो पचा गये लेकिन चंद्रमा के प्रति अपने लोभ का संवरण न कर सके। न जाने कब से भारतीय माताएँ चंदा को मामा बताकर अपने लल्लाओं को बहला रही हैं। यह बात दूसरी है […]

गीत/नवगीत

मलय-हिमालय-विंध्य-सतपुड़ा

मलय-हिमालय-विंध्य-सतपुड़ा अंबर धरा पे लाते हैं अरब-हिन्द-बंगाल के मोती, तेरे पग सहलाते हैं जय भारती! हे भारत माँ! हम तेरे ही गुन गाते हैं। आज शहीदों के सपनों को, सच करके दिखलाएँगे माता की चुनर सजाने को, बलि-वेदी पर मिट जाएँगे हो तेरी जय-जयकार सदा, हम ऐसा गीत सुनाते हैं हम तेरे ही गुन गाते […]

गीत/नवगीत

प्यार का गीत

नहीं कोई सुंदर है तुझ-सा ज़मी पर फलक पर,इधर पर,उधर पर,कहीं पर। कहाँ चाँद ने रूप तुझ-सा है पाया कभी घटता जाए कभी बढ़ता आया कहाँ मेघों में तेरी आँखों-सा काजल हवा भी ना झूमे तेरा जैसे आँचल नदियों की कलकल में संगीत तो है तेरे सुर-सा मादक कहाँ गीत वो है कहाँ रात में […]

सामाजिक

छोड़िए लकीर पीटना

कल आसिफा थी। आज ट्विंकल है। आनेवाले दिनों में सिमरन, जूली ….ऐसी कोई भी दूधमुँही हो सकती है। इन पीड़िताओं को किसी धर्म के साँचे में कैद नहीं किया जा सकता। और न ही उन पर धर्म के लेबल लगाए जा सकते हैं जो इन मासूमों पर बलात्कार करते हैं क्योंकि दरिंदों का कोई मजहब […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – पुण्य कमाने का सुख

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को मानव जीवन के चार लक्ष्य माना गया है। मोक्ष प्राप्ति की कामना एक भारतीय के मन में तब जागती है जब वह सत्तर पार कर लेता है और औलादें उसका ध्यान नहीं रखतीं। वरना बाबाजी को फैशन चैनल से ‘काम-सुख’और दादी जी को आस्था चैनल से ‘वैराग्य-सुख’ की जीवनोपयोगी ऊर्जा प्राप्त होती रहती […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – गाली : एक सांस्कृतिक संपति

गालियाँ हमारी सांस्कृतिक विरासत है। यह ऐसी देव विद्या है जिसे जिज्ञासु, बिना किसी गुरुकुल, विद्यालय-विश्वविद्यालय में गए आत्म-प्रेरणा से सीख लेता है, और लेनेवाला ‘खाता’है। हमारे देश में तो कहावत भी है-‘तोरी गारी, मोरे कान की बाली।’ गाली हमेशा दी जाती है, जिसे बोलचाल की भाषा में “बकना’ कहते हैं। इसे देनेवाला देता है। […]

हास्य व्यंग्य

लक्ष्मण रेखा तुमने लाँघी…(व्यंग्य)

होश संभाला है तब से यही उपदेश और शिक्षा मिलती रही कि शरीफ बनो। पिता जी के अनुसार गाली देनेवाले शरीफ नहीं होते। पिछले दो महीनों से देश में शरीफ लोगों द्वारा लगातार अबाध गति से गालियाँ दी गईं। ये शरीफ गालियाँ थीं। आप पूछेंगे भाई! गालियाँ भी शरीफ होती हैं?जी। जो गालियाँ शरीफों को […]

गीतिका/ग़ज़ल

चुनाव की आँधी

लोकतंत्र की धज्जी उड़ गयी, इस चुनाव की आँधी में शोर ‘चोर का’ चोर मचाए, इस चुनाव की आँधी में। नेताओं ने इतना थूका, इक-दूजे के दामन पर देश धँसा दलदल में अब तो, इस चुनाव की आँधी में। वादों के गुबार का, अब तो इतना गहरा आलम है आँखोंवाले अंधे हो गए, इस चुनाव […]