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  • छोड़िए लकीर पीटना

    छोड़िए लकीर पीटना

    कल आसिफा थी। आज ट्विंकल है। आनेवाले दिनों में सिमरन, जूली ….ऐसी कोई भी दूधमुँही हो सकती है। इन पीड़िताओं को किसी धर्म के साँचे में कैद नहीं किया जा सकता। और न ही उन पर...

  • व्यंग्य – पुण्य कमाने का सुख

    व्यंग्य – पुण्य कमाने का सुख

    धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को मानव जीवन के चार लक्ष्य माना गया है। मोक्ष प्राप्ति की कामना एक भारतीय के मन में तब जागती है जब वह सत्तर पार कर लेता है और औलादें उसका ध्यान नहीं रखतीं। वरना...

  • व्यंग्य – गाली : एक सांस्कृतिक संपति

    व्यंग्य – गाली : एक सांस्कृतिक संपति

    गालियाँ हमारी सांस्कृतिक विरासत है। यह ऐसी देव विद्या है जिसे जिज्ञासु, बिना किसी गुरुकुल, विद्यालय-विश्वविद्यालय में गए आत्म-प्रेरणा से सीख लेता है, और लेनेवाला ‘खाता’है। हमारे देश में तो कहावत भी है-‘तोरी गारी, मोरे कान...


  • चुनाव की आँधी

    चुनाव की आँधी

    लोकतंत्र की धज्जी उड़ गयी, इस चुनाव की आँधी में शोर ‘चोर का’ चोर मचाए, इस चुनाव की आँधी में। नेताओं ने इतना थूका, इक-दूजे के दामन पर देश धँसा दलदल में अब तो, इस चुनाव...

  • व्यंग्य – थूक का दलदल

    व्यंग्य – थूक का दलदल

    भयंकर गरमी के बाद भी देश में कीचड़ हो गया है जिसके उन्नीस मई तक दलदल बन जाने की पूरी संभावना है क्योंकि हर दल का नेता दूसरे दल के नेता पर थूक रहा है। देश...

  • गीत – नीली खाल

    गीत – नीली खाल

    रंग बदलते चेहरे देखे, और बदलती देखी चाल नाखूनों में लहू लगा है, पर सबकी नीली है खाल। कहीं गरीबी की बिसात पर, प्यादे दौड़ लगाते हैं राष्ट्रवाद की बलिवेदी पर, शेर कहीं कट जाते हैं...

  • गीत – शर्वरी! धीरे चलो!

    गीत – शर्वरी! धीरे चलो!

    कल्पना कुछ ऐसी है- देर रात थक कर लौटे पति को पत्नी नहीं चाहती कि वह जल्दी उठे ऐसे में वह ‘तारों भरी रात(शर्वरी)’से जल्दी ना ढलने का निवेदन कर रही है- शर्वरी! धीरे चलो कि...

  • व्यंग्य – शुरुवात मुझसे

    व्यंग्य – शुरुवात मुझसे

    मैंने हाईस्कूल में पढ़ा था कि भारत मानसूनी जलवायु का देश है। गलत है। मैं सुधारता हूँ- भारत चुनावी जलवायु का देश है। मानसून कभी-कभी रूठ जाता है। भटक जाता है। चुनाव कभी नहीं रूठते। हर...

  • नया महाभारत

    नया महाभारत

    अर्जुन और शिखंडी में मन, भेद नहीं कर पाता है राजनीति के हाट में बगुला, भगत बना मुसकाता है शब्द बाण के आघातों से, भीष्म तड़पते शैय्या पर चक्रव्यूह के द्वार के बाहर, अभिमन्यु मर जाता...