Author :

  • अंगार सुनाता हूँ!!

    अंगार सुनाता हूँ!!

    मैंने भी श्यामल ज़ुल्फों में, अपनी शाम गुजारी है मैंने भी रस भरे लबों पर, अपनी ग़ज़लें वारी हैं मैं भी तो गोदी में रखकर, सिर को अपने सोया हूँ झीलों-से गहरे नैनों में, मीठी नींदें...

  • शब्द-दीप

    शब्द-दीप

    जग मुझसे अंधियारा पूछे, मैं शब्दों के दीप जलाऊँ भूल चुके जो राह के पत्थर, मैं उनका साथी बन जाऊँ। मेरे हर दीपक की आभा, अंतर का तम हर जाएगी हार खड़ी होगी जो सम्मुख, आशाओं...

  • व्यंग्य – झाड़ू की व्यथा

    व्यंग्य – झाड़ू की व्यथा

    हिन्दी दिवस पर एक प्रचलित कहावत दिमाग में उँगली कर रही है- घूरे के दिन फिरना, यानि “अच्छे दिन आना।” देखिए ना आजकल ‘उस’ मुहावरे का अर्थ भी ‘यह’ मुहावरा बन गया है। इसी को कहते...

  • व्यंग्य – मुक्ति-पर्व

    व्यंग्य – मुक्ति-पर्व

    देश इस समय मुक्ति-पर्व मना रहा है। “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” कहकर जो दिव्यात्मा संसार से कूच कर गई, एक तरफ उनकी अस्थियों को लोटों में कैद कर नदियों में प्रवाहित कर मुक्त किया जा...

  • थूकना-चाटना : थूककर चाटना

    थूकना-चाटना : थूककर चाटना

    थूकना और चाटना- दोनों क्रियाएँ अशोभनीय मानी जाती हैं और थूककर चाटना-अतिअशोभनीय। हमारा देश थूकने के मामले में स्वावलंबी है। थूक के रिकाॅर्ड उत्पादक! यदि थूक से कोई उत्पादन होता तो हम उत्कृष्ट दर्ज़े के उत्पादों...

  • व्यंग्य – हिंसा अमर रहे!

    व्यंग्य – हिंसा अमर रहे!

    मनुष्य हिंसक प्राणी है। हमारे मनीषी और महापुरुष न जाने कब से ज्ञान का कोलड्रिंक पिला-पिलाकर उसे ‘मानव’ बनाने के पीछे अमर हो गए। बुद्ध-महावीर-नानक-गाँधी और न जाने कौन-कौन? कितने आए और कितने चले उपदेश देकर!...

  • व्यंग्य – अंधायुग

    व्यंग्य – अंधायुग

    आँखें, भगवान का वरदान है। अंधापन, अभिशाप। अक्ल भी भगवान की देन मानी जाती है। जो किसी को कम तो किसी को ज़्यादा मिलती है। इसमें आरक्षण का फाॅर्मूला नहीं बैठता। जो इसका उपयोग करता है,...

  • महाठगबंधन

    महाठगबंधन

    एक गाँव था। ठगों का। ये अपने ही गाँव के लोगों को ठगते रहते।इनको देखकर और सुनकर लगता दुनिया में इनसे बड़ा आपसी शत्रु कोई नहीं होगा। हर पाँच साल में ऐसी जूतमपैजार होती कि लोग...

  • स्वप्न…अंतर्मन की एक ग़ज़ल!!

    स्वप्न…अंतर्मन की एक ग़ज़ल!!

    मन के उद्वेलित सरवर में स्वप्न भाव के नीलकमल हैं नैनों के पृष्ठों पर अंकित अन्तर्मन की एक ग़ज़ल हैं। स्वप्न निराशा के आॅगन में आशाओं की परिभाषा हैं स्वप्नों के सागर में हरदम रह कर...

  • गीतिका – लेखनी की धार की

    गीतिका – लेखनी की धार की

    कीजिए ना बात हमसे, तीर और तलवार की है बहुत ताक़त बड़ी, इस लेखनी की धार की। ज़ख़्म क्या नासूर भी, इससे बना सकता हूँ मैं पर बहाई मैंने नदियाँ, इससे अपने प्यार की। एक दोगे...