हाइकु/सेदोका

हाइकु

हाइकु 01ः- एक-दो-तीन ताड़ना है सहती मौन न तोड़े। 02ः- आरोप लगे अवैध व्यापार के हंसा गुलाब। 03ः- चरित्र हीन कांच सा विखरता हंसते सब। 04ः- शहर हंसा कांच टूटता देख रोया बुधुआ। 05ः- दानवता है विजय श्री पा रही मूल्य गिरते।   06ः- भड़क जाते उठती उंगली देख चार किधर। 07ः- विश्वास घात इतिहास […]

लघुकथा

निश्चय

मां ! ओ मां!! मुझे बताओ आखिर हम लोग वहां से क्यों चले आये नहीं बेटा जिद नहीं करते। भूल जाओ हमारे साथ जो कुछ हुआ। मन्जू अपने दिनेश को समझाते हुए बोली। नहीं मां आज शान्त नहीं होऊँगा ये तो रोज का चक्कर है। आखिर हम लोगों में क्या कमी है। क्या हम लोग […]

लघुकथा

दो लोग

दो लोग एक शहर के दो लोग निकलकर दूसरे शहर में गए।एक के पास त्रिशूल था दूसरे के पास तलवार।    दोनों एक जगह से अलग-अलग रास्तों से गुजरकर एक ही स्थान पर मिलने का वायदा कर अपना कार्य करने लग गये।    तलवार वाले ने जाकर तलवार वालों को त्रिशूल वालों के विरुद्ध भड़काया […]

लघुकथा

छाया

खजूर के पेड़ में छाया नहीं होती, ऐसा सुना था। यह कोई नई बात भी नहीं थी। पर जब एक इंजीनियर, एक डाक्टर व एक दानी उद्योगपति के मां-बाप कहीं आश्रय न पा सके तो समझ में आया-अब आधुनिक षिक्षा और संस्कारों के वृक्ष में भी छाया नहीं होती। — शशांक मिश्र भारती

हाइकु/सेदोका

कुछ हाइकु

01ः- रात ठण्ड की कंप-कंपी बधाये, सही न जाये। 02ः- सर्द महीना मुश्किल करे जीना, दाँत बजाये। 03ः- चादर तानी अपनी पहाड़ों पे, फिर सर्दी ने। 04:- जन कल्याणी प्रश्न हैं उलझते, अपने नहीं। 05:- स्ंासद में भी आम सहमति है, अपने हित। 06:- लगाना नारे चिल्लाना, तोड़-फोड़ हाथी के दांत। 07:- कहते सब सुनते […]

भाषा-साहित्य

कविसम्मेलनों का गिरता स्तरः दोषी कौन ?

  वर्तमान समय के कवि सम्मेलनों में जो हो रहा है।जिस प्रकार की कविता पढ़ी जा रही है। अच्छा नहीं कहा जा सकता। पिछले एक दशक से कवि सम्मेलन की कविता का स्तर गिरा है। कवि सम्मेलनों में चुहलबाजी, चुटकुलेबाजी, बेढंगी कविताओं का बोलबाला बढ़ा है।दर्शक भी हल्के मनोरंजन वाली, टाइमपास कविता चाहने लगा है।कईबार […]

मुक्तक/दोहा

सर्जिकल के बाद के घटनाक्रम पर दो मुक्तक

एक कल भगत सिंह का जन्म दिन हमारी सरकार ने कुछ यूं मनाया पार कर सरहद कहा गांधी ही नहीं शहीदे आजम भी आदर्श समझाया दिखाया मात्र नमूना अब भी समय है नापाक बने पाक तेरे लिए कल मत कहना हमने कृष्ण चाणक्य सुभाष के सूत्रों को अपनाया दो कुछ अपनी आत्मा को पिछले दिनों […]

हाइकु/सेदोका

हाइकु

01 – मन का जले अगर रावण तो हो दशहरा। 02- पुतले जले हैं हंसते रावण घर हमारे। 03- गुण वृद्धि हम कर सकें तो विजय पर्व। 04- दीप से दीप सा जल सकें हम सच्ची दीवाली। 05- नेह के दीप चमकें घर-घर इस दीवाली। 06- मन का दीप क्या जगमग होगा इस दीवाली। 07- […]

कविता

बालमन का प्रश्न…?

आज हमने अपने रास्ते में जाते हुए देखा कि – बच्चे, बिल्कुल छोटे बच्चे ले जा रहे हैं सिर पर लकड़ी के गट्ठर अपने कद से कई गुना बड़े वजन में भी हों किंचित अधिक जाड़े की कड़क से बचने या गरम करने को कनस्तर भर पानी, पर – प्रश्न यह है कि – आखिर […]

कविता

नग्नता और राजनीति

गत दिनों तक चर्चा में रहती थी नग्नता अन्यान्य बिम्ब-प्रतिबिम्बों की, पर – आज जिधर दृष्टि पड़ती टूटती मर्यादाएं बिखरते मूल्यों, नैतिकता को मात्र अपने राजनीतिक स्वार्थवश देख रहा हूं। काश! इनके आचरण में उच्च मानदण्ड इन सबसे परे होते, क्षणिक ,लोलुप स्वार्थ पूर्ति हेतु स्थापित आदर्श न त्यागते और नहीं अपने विरोधियों पर व्यक्तिगत […]