गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

फिज़ा है फूल है रवानी है। तेरे बगैर सब बेइमानी है।। पसीना जिस्म से सूखा ही कब, क्या बुढ़ापा और क्या जवानी है‌‌।। कई तलवार और एक म्यान, उसकी आदत बहुत पुरानी है।। अश्क जारी रहे आवाज न हो, इश्क की बस यही निशानी है।। तूफानों आओ कि जलूं सूरज, दीप ने भी जिगर में […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

वो जो कुछ लोग राजदार रहे। काम जब भी पड़ा फरार रहे।। एक लम्हा खुशी का आया तो, जिंदगीभर के ग़म तैयार रहें।। जमाने की हवा लगी उसको, मशविरे सब मेरे बेकार रहे।। तेरी मर्ज़ी पे भला किसका हक, तूं जिसे चाहे वो हकदार रहे।। दीप तो एक ही रहा सूरज, मगर तूफान बेशुमार रहे।। […]