कविता

भारत माता दुखी हो गई

भारत माता दुखी हो गई सुनकर अपने बच्चों की वाणी। जो बोल रहे हैं रिश्वत जैसी गाली। भारत माँ भी कह उठी – “बच्चों ने किया ऐसा बुरा हाल कि मै हो रही हूँ बेहाल। मै थी पहले सोन चिड़इया नेता मुझे खा गए। अपनी भारत माँ के नाम पर करोड़ों को यह डकार गए।” […]

कविता

चेतावनी जल की

जीवन-दाता मैं कहलाता सब लोगों की प्यास बुझाता पर्वतों से मैं निकालता फिर सागर से मै मिल जाता सब पुछते है मुझसे आखिर रंग मेरा कौन सा? मैं कहता हूँ मेरा ढंग है नया-सा अमृत कहते हो तुम मुझे जीने के लिए पीते हो मैं हूँ शीतल मैं हूँ चंचल मैं हूँ खुश-खुशाल मेरे आगे […]

कविता

बँटवारा

आज़ादी का हाथ थाम कर आया बटँवारा इस देश में। तहस नहस कर दिया सबकुछ जिसनें पूरे देश में। मज़हब के नाम पर काटने लगा अचानक इंसान ही इंसान को। क्योंकि बट चुका था यह देश उसी के नाम पर हिंदू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई जो पहले थे जिगरी भाई । पर अब चुके थे सब […]

कविता

व्यतीत करना छोड़ दें

व्यतीत करना छोड़ दें जीवन जीना अब तू सीख ले । अपने जीवन काल में तू कर गुज़र कुछ ऐसा कि हिमालय भी झुक पड़े और बोले कि तुझ-सा नहीं देखा।। आपनी इच्छाओं का तू गला कभी मत घोटना। क्या पता वही तुझे तेरी मंजिल तक पहुंचा दे। अब छोटी – छोटी बातों में हँसना […]

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श्रापित संपदा

उद्योगीकरण के आँधी में जब बुझने लगती पर्यावरण की बाती तब करने लगती धरती त्राही-त्राही और तब श्राप बनती संपदा किसी स्थान के लिए तब मजबूर होकर पलायन करता हर एक आदमी। उद्योगीकरण की मशाल देखकर बुझने लगती पर्यावरण की बाती और लोगों को गलती समझ न आती। जहाँ बहती थी मिट्टी की खुशबू वहाँ […]

कविता

हम ज़िंदा कब थे?

हम ज़िंदा कब थे? अगर हम ज़िंदा होते तो किसी औरत को बलात्कार नहीं सहते किसी व्यक्ति की निंदा नहीं करते भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाते न कि उसमे भागीदारी बनते अगर हम ज़िंदा होते तो डॉनेशन लेकर विध्या की अपमान नहीं करते लड़कियों को कोख में नहीं मारते देहज जैसा पाप नहीं करते अगर […]

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एक आवाज़ पर्यावरण की

मुझ पर एक अहसान जताओ मुझ पर तुम कोई जुर्म न ढ़हाओ मेरे इस अस्तित्व को कृपया कर तुम ही बचाओ। मै नहीं तो तुम भी नहीं अपने लिए तो मुझे बचाओ। मेरे इन हाथों पर अपना दम मत दिखाओ। जब-जब मुझे गुस्सा दिलाओगे बाद में तुम पछताओगे। मैं था पहले कितना सुंदर तुमने मुझे […]

कविता

समय देकर तो देखो

समय देकर तो देखो शायद सब कुछ ठीक हो जाए पुराने-कडवे रिश्तों में शायद थोड़ी-सी मिठास भर आए दुश्मनी की मशाल शायद थोड़ी कम हो जाए भटके हुए को उसका मार्ग मिल जाए समय देकर तो देखो शायद सब कुछ ठीक हो जाए घर में फैली सीलन का कोई ईलाज मिल जाए दो पीढियों के […]

कविता

सरहद कोई लकीर नहीं

सरहद कोई लकीर नहीं है हर दुश्मनी का आगाज़। जहाँ खिंच जाती है यह बन जाती है वहाँ दीवार। दो मुल्कों की दोस्ती को बना देती है बेजान। खून के मीठे रिश्तों को भी चखा देती है नीम का स्वाद। भाईचारे के संदेश को भी चटा देती है यह धूल। इसीलिए… सरहद कोई लकीर नहीं […]

कविता ब्लॉग/परिचर्चा विविध सामाजिक

हम ज़िंदा कब थे?

हम ज़िंदा कब थे? अगर हम ज़िंदा होते तो किसी औरत को बलात्कार नहीं सहते किसी व्यक्ति की निंदा नहीं करते भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाते न कि उसमे भागीदारी बनते अगर हम ज़िंदा होते तो डॉनेशन लेकर विध्या की अपमान नहीं करते लड़कियों को कोख में नहीं मारते देहज जैसा पाप नहीं करते अगर […]