कविता

धरती की संतान

हम सब धरती की संतान हैं चलो अच्छा है कि इतनी तो समझ अभी बाकी है हममें, पर मेरे प्यारे समझदार भाइयों बहनों क्या सिर्फ कहना? मान या समझ लेना ही पर्याप्त है या फिर हमें भी कुछ करने की जरूरत है? आखिर जब धरती माँ ने अपना विशाल आँचल अपने बच्चों के लिए फैला […]

कविता

हम हैं धरती की संतान

हम सब धरती की संतान हैं अच्छा है, समझ है हममें, हम है समझदार भाइयों- बहनों हमारा क्या कहना इसलिए तो भगवान ने हमें बनाया साहित्यकार धरती की भलाई करने को हम सदा है तैयार। हमें अब बहुत कुछ करने की ज़रूरत है आखिर जब धरती माँ ने अपना विशाल आँचल फैला रखा है हमें […]

कविता

अन्यथा

संविधान की दुहाई भी दोगे और देश के संविधान कानून का मजाक भी उड़ाओगे, अपने लिए अलग औरों के लिए अलग ढंग से राग वैरागी गाओगे। जब देश सबका संविधान सबका तब अलग अलग परिभाषा भला कैसे गाओगे? भाई को भाई से लड़ाकर कौन सा सूकून पाओगे? बेकार का लफड़ा न पैदा करो यार, संविधान […]

कविता

वक्त चला जायेगा

वक्त कैसा भी हो भला कब ठहरा है? अच्छे दिन,सुनहरे पल भी आखिर खिसक ही जाते हैं, कठिन से कठिन समय भी एक दिन चले ही जाते हैं। माना की हालात गंभीर है हर किसी में दहशत और चेहरे पर खौफ की लकीर है, जान बचाने की चिंता है तो जीविका की लाचारी भी है। […]

कविता

औपचारिकता

इस बार नवसंवत्सर चैत्र प्रतिपदा का शोर कुछ अधिक है, होना भी चाहिए और हो भी क्यों न? हम तो औपचारिकताओं में ही जीने के आदी जो हैं। तभी तो आजादी के बाद से अब तक हिन्दी दिवस/पखवाड़ा मनाते हैं, राष्ट्र भाषा के बजाय राजभाषा का झुनझुना बजाते हैं। आधुनिकता के गीत गाते हैं अंग्रेजीयत […]

सामाजिक

कम खाओ, गम खाओ

इन सीधे और सरल शब्दों की गहराई में झाँकने पर बहुत ही सुंदर, सार्थक और जीवनशैली को बदलकर जीवनदर्शन को प्रकाशित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। कम खाने से तात्पर्य ठूंस ठूंस कर खाने से बचने की ओर है। क्योंकि अधिकता हर चीज की खराब होती है।कहा भी जाता […]

कविता

औपचारिकता

इस बार नवसंवत्सर चैत्र प्रतिपदा का शोर कुछ अधिक है, होना भी चाहिए और हो भी क्यों न? हम तो औपचारिकताओं में ही जीने के आदी जो हैं। तभी तो आजादी के बाद से अब तक हिन्दी दिवस/पखवाड़ा मनाते हैं, राष्ट्र भाषा के बजाय राजभाषा का झुनझुना बजाते हैं। आधुनिकता के गीत गाते हैं अंग्रेजीयत […]

कविता

किन्नर हैं तो क्या?

मैं भी तो आपकी तरह ही हाड़ माँस की ही बनी हूँ, मुझे भी मेरी माँ ने जन्मा प्रसव पीड़ा भी झेली थी, मगर मुझे पाकर भी खुश होने के बजाय मुँह मोड़ ली थी। पिता मायूस थे किंकर्तव्यविमूढ़ से हुए, समाज के डर से गैरों की गोद जाने से मुझे रोकने की हिम्मत न […]

कविता

नारी शक्ति:आदि शक्ति

आदिशक्ति जगत जननी का इस धरा पर जीवित स्वरूप हैं हमारी माँ,बहन ,बेटियां हमारी नारी शक्तियाँ। जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी रुप में हमारी छाँव बनी रहती हैं हमारी नारी शक्तियाँ। ममता की मूर्ति ही नहीं समय आने पर हमारे लिए संहारक बन चंडी भी बनती हमारी नारी शक्तियाँ। जल सी सरल है […]

सामाजिक

कम बोलो,मीठा बोलो

एक आम कहावत है कि अधिकता हर चीज की नुकसान करती है,फिर भला अधिक बोलना इससे अछूता कैसे रह सकता है।हम सबको अपने आप की वाणी पर संयम रखना है,जितनी जरूरत हो उतना ही बोलें,बात को बेवजह खींचने से बचना है।जो भी बोलें,सोच समझकर बोलें,मीठा बोलें,संतुलित बोलें,समयानुसार बोलें, कम और मीठे मधुर शब्दों में बोलें।शहद […]