राजनीति

रेप की सजा फाँसी?

उन्नाव कठुआ दिल्ली के बाद हाथरस और बलरामपुर की घटना ने जनमानस को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया है। हाथरस और बलरामपुर में तत्काल हुई घटना ने उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन पर अनेकों सवालिया निशान लगा दिया है ।इन घटनाओं में जिस बीमार मानसिकता का स्वरूप देखने को मिला है वह […]

कविता

मुक्त ही करो

आखिर कब तक हम बेटियां यूं ही लुटती पिटती मरती रहेंगी, कब तक हमारी खुशियां हमारा सुखचैन यूं ही छिनता रहेगा । कभी गर्भ में,कभी दहेज के लिए, कभी जिस्म के भूखे दरिंदों की भेंट हम चढ़ते रहेंगे । कब तक हम गरम गोश्त के भूखे भेड़ियों की भूख शान्त करते रहेंगे । आखिर हमारा […]

कविता

कब तक?

आखिर कब तक हम बेटियों के साथ हो रही दरिंदगी को देखते रहेंगे। कब तक सख्त कम उठाने का ढोल पीटते रहेंगे। सख्त कारवाई और कड़ी सजा की आड़ में हम बेटियों की लाशों पर बेशर्म बन रोते रहेंगे। आखिर कब तक हम बेटियों से होती दरिंदगी के बाद हो रही उनकी मौतों पर, उनकी […]

लेख

बेटी बचाओ

मान्यताओं और परम्पराओं के हमारे देश में हमें बेटी बचाओ जैसे अभियान चलाने पड़ रहे हैं। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में नारियों को पूजा जाता है वहीं आज भी शिक्षा के बढ़ते स्तर के बावजूद भी कन्या भ्रूण हत्या कम नहीं हो रही रही नहीं हो रही रही नहीं हो रही नहीं […]

कविता

वो इक्कीस दिन

कैसे भूल सकता हूं मैं कर्फ्यू के वो इक्कीस दिन जब हम घरों में कैद होकर रह गए । घर से बाहर तक निकलने की पाबंदियों ने उन इक्कीस दिनों जीवन को असहय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। किस तरह हमारे परिवार ने काटे एक-एक दिन,एक एक पल कभी खाकर तो कभी नमक पानी […]

कविता

लाचार

गांधी तेरे देश में आज भी तेरे बंदर मौन हैं, अब तो लगता है उन्होंने ने भी इसे नियति का खेल समझ लिया है क्योंकि अब वे भी विचलित कहां हैं तभी तो अन्याय, अत्याचार, नीति अनीति,भ्रष्टाचार लूटमार, हत्या,बलात्कार राजनेताओं के कारनामों पर एकदम मौन हैं, आँख,कान,मुँह बन्द किये जैसे बड़ा ही चैन है। उन्हें […]

लघुकथा

मायूसी

करीब तीन साल पहले की बात है।मेरे एक करीबी मित्र की पत्नी ने अस्पताल में बेटी को जन्म दिया। आज के समय में पढ़े लिखे लोगों में भी बेटी के जन्म को निहायत ही गिरी नजरों से देखा जाता है,ये उस दिन पहली बार साक्षात देखा। मेरे लिए यकीन करना कठिन हो रहा था कि […]

लघुकथा

कर्ज

आज रामू काका की बेटी संध्या का आईआईटी में प्रवेश का परिणाम आया।सब बहुत खुश थे कि एक गरीब की बेटी तमाम आर्थिक झंझावातों के बीच सफलता की सीढियां चल रही थी,खुद रामू को तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था ।उनके लिए तो ये सब सपना जैसा था।क्योंकि बेटी को उँचाई पर देखने […]

कविता

बेटियाँ

बेटियाँ जीवन का आधार/विचार/व्यवहार खुशियों का संसार हैं। बेटियाँ/पराई हैं सुन सुनकर मुरझाई हैं फिर….भी घर/परिवार/समाज को हर्षायी हैं। बेटियां रिश्तों की पहचान को आयाम देती हैं। बेटियाँ पीड़ा सहकर भी मुसकराई हैं। बेटियाँ अपने होने के अहसास को अनवरत दर्शायी हैं। मूकवाणी से अपनी भावनाएं ग़म हो या हो ख़ुशी वयक्त करती फिर मुसकराई […]

कविता

भारतीय मीडिया

भारतीय मीडिया ************* वो भी क्या समय था जब भारतीय मीडिया ने आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई थी। समय के साथ मीडिया भी बदला जैसे भेड़िए ने शेर की खाल ओढ़ा। अपने संस्कार, कर्तव्य सब भूल गया पैसों के लिए खुद का ईमान बेच तक दिया। मगर आज भी कुछ का जमीर जिंदा […]