लघुकथा

एकल परिवार का दंश

बुजुर्ग दम्पति का संवाद पति-लखन की माँ !अब इस उमर में हमसे तो कुछ होने वाला नहीं है।क्यों न हम वृद्धा आश्रम में ही चलें। पत्नी-लखन के बापू बात तो ठीक है। मगर अपना घर छोड़कर क्या अच्छा लगेगा? पति-अब अच्छा खराब देखोगी या सूकून से मरना चाहोगी? पत्नी-आखिर बेटा क्या सोचेगा? पति-जो भी सोचना […]

कविता

कैकेयी का कोप

राम के राज्याभिषेक को हो रही थी तैयारी, हर और खुशियों का शोर। मंथरा को ये सब खटका उसने अपने मन का गुबार कैकेयी के सिर पटका, पहले तो हर्ष के अतिरेक में थी फूली नहीं समाई, मंथरा के बहकावे में आकर बहक गई वो माई। तब उसनें कोपभवन का रूख कर डाला, दशरथ के […]

भजन/भावगीत

विनती

हे जगत जननी,अम्बे,जगदम्बे माँ मुझ पर कृपा करो, मैं अबोध,अज्ञानी, पापी मेरी भी नैय्या पार करो। पूजा, पाठ,भोग,आरती न जानूं मैं बस कौतुहलवश शीश झुका लेता हू्ँ, नीति अनीति, छल प्रपंच से अंजान तेरा दर्शन भर कर लेता हू्ँ। श्रद्धा के दो पुष्प कभी कभार तेरे दर पर रख देता हू्ँ, मैं किसी के कष्ट […]

कविता

मर्यादा

यह कैसा समय आ गया है मर्यादाओं का ह्रास बढ़ रहा है, संबंध फीके हो रहे हैं मर्यादाएं दम तोड़ रही हैं परिवार बिखर रहे हैं ऐसा मर्यादा घटने के कारण हो रहा है। छोटे बड़े ,भाई बहन,सभी रिश्तों में मर्यादाएं पिस रही हैं। इन्हीं कारणों से रिश्तों की अहमियत घट रही है, हालात गम्भीर […]

कविता

कर्मगति

राजा हो रंक कर्म गति से सबको ही दो चार होना पड़ता है। कर्मों के हिसाब से फल भोगना ही पड़़ता है, कौन बच सका है कर्मगति के प्रभाव से, जिसने जो बोया वही काटना पड़ता है। इसमें न कोई भेद है न ही कोई दुविधा, जैसी करनी वैसी भरनी सबके लिए ही है कर्मों […]

कविता

प्रकृति

प्रकृति की भी अजब माया है निःस्वार्थ बाँटती है भेद नहीं करती है, बस कभी कभी हमारी उदंडता पर क्रोधित हो जाती है। हर जीव जंतु पशु पक्षी के लिए खाने, रहने और उसकी जरूरतों का हरदम ख्याल रखती है बिना किसी भेदभाव के यथा समय सबकुछ तो देती है, हमें प्रेरित भी करती सीख […]

कविता

बचपन की रामलीला

आज भी याद आता है दशहरे के दौरान नाना के घर जाना, बहाना तो होता था बस रामलीला देखना। बड़ा मजा आता था मामा नाना के साथ गाँव की रामलीला में, तब आज की तरह सब हाइटेक नहीं था पेट्रोमैक्स की रौशनी में चौधरी नाना के दरवाजे पर अधिकांश कलाकार गाँव के हल्की ठंड के […]

लघुकथा

उठना नहीं है?

जिस दिन मैं सुबह देर से उठता हू्ँ उस दिन अनायास ही माँ की याद आ ही जाती है।क्योंकि माँ की ही तरह मेरी भी आदत सुबह जल्दी उठने की है। फिर भी किसी दिन यदि किसी कारणवश मैं नहीं उठा तो माँ आकर जगाती और यह कहना कभी नहीं भूलती थी कि उठना नहीं […]

सामाजिक

सहानुभूति

सहानुभूति शब्द मन में आते ही एक भाव उत्पन्न होता है बेचारगी।परंतु ऐसा नहीं है।सहानुभूति एक भाव है,संबल है।जिसको दर्शाने मात्र से हम किसी के लिये अपना समर्थन प्रकट करते हैं।इसे प्रकट करने का भाव इंगित करता है कि हम सामने वाले की लाचारी पर तरस ख रहे हैं या उसका हौसला बढ़ा रहे हैं। […]

सामाजिक

हमारी खुशियाँ हमारे हाथ

आज के इस व्यस्तम और भागदौड़ भरी जिंदगी में खुश रह पाना सबसे कठिन काम है।हर इंसान भाग रहा है।आज लोगों के पास खुद के और परिवार तक के लिए समय निकालना बहुत मुश्किल हो रहा है। ऐसे में हमें खुश रहने के लिए छोटे छोटे पल चुराने की जरूरत है,छोटी किंतु सकारात्मक बातों,कृत्यों में […]