कविता

वो हारी हुई औरत

ख़ुशी के प्रदर्शन में चमकता चेहरा हमेशा ही मुस्कराहट में फैलें होंठ लेकिन आँखों में है समेटे जाने कितने ही समंदर वो हारी हुई औरत जो छली गई है जन्म के साथ ही बेटे-बेटी के परिपेक्ष्य में अपने ही भाई से भेदभाव में उम्र के कुछ अहम हिस्से में सहमी-सहमी सी गुजरी है बचाते हुए […]

कविता

तुमसे कुछ कहना है

तुमसे कुछ कहना है कब से बटोर रही हूँ शब्दों को एक पहाड़ सा बन गया है शब्दों का अब मुहिम है,छंटनी की… उलीच रही हूँ शब्दों को कि मिल जाये कोई ऐसा शब्द जो ज़ाहिर कर दे मन के सारे जज़्बात ज़र्रों की त्यों बोल दे जो कि हां है जीवन में तुम्हारी जरूरत […]

कविता

कविता

कभी- कभी बहुत गहरे तक चुभ जाती हैं तुम्हारी बातें सहज-सरल सी बातें विष बुझा बाण बन बेध जाती हैं मेरा अंतर्मन नही समझ पाती उस वक़्त उन बातों का अभिप्राय तुम्हारी सरलता या मेरे रिसते घावों को और कुरेदना जिनके ऊपर दिखावे की एक परत सी है लेकिन अंदर से है उतना ही हरा […]

कविता

कविता : रँगना है मुझे

रँगना है मुझे उसी रंग में तुम्हारे जिसमे रंग के मेरी सुबह का सूरज रौशन होता है और मेरी रातें चंदनी से पुरनूर होती हैं । तुम्हारा वही रंग जिसमे घुल के मेरा आसमां नीला है और हवाओं में जीवन है वो रंग जिसे लेकर फूल खिलते हैं सारे जंगल है हरा भरा और खेतों में […]

कविता

मनोबल

हूँ मैं निर्बल तन से लेकिन मनोबल है चट्टान सा कोशिश कर ले लाख कोई, न टूटेगा ये कोई चीज नही कांच का न लग सकता कभी इस पर मायूसियों का जंग है ये हिमालय सा विशाल,अटल,अडिग नही डिगा सकती इसको कोई भी आंधी दुश्वारियों की । -सुमन शर्मा

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल/गीतिका

खुदा भी येे कैसी इन्तिहा चाहता है मरे को कितना मारना चाहता है मुकद्दर में है जिंदगी भर का अंधेरा रात में अब कोई क्यों दिया चाहता है दिल ने बस माँगा इबादत में तुमको अपने हक़ में अब कोई दुआ चाहता है हर तरफ है फैला जहर मजहबों का दिल कुछ सुकूँ की हवा […]

कविता

कविता : भैया सुनो!

भैया सुनो! आज भी मेरे लिए अनमोल हो तुम। आज भी मन तरसता है तुम्हारे साथ को तुम्हारी एक बात को । तुम व्यस्त हो गए हो अपनी दुनिया में और व्यस्त हो गई हूँ मैं भी। लेकिन फिर भी जब कभी भी होती हूँ अकेली याद आते हैं दिन बचपन के जब हम तुम […]

कविता

कविता : वर्षा

वर्षा की बूँदें पड़ती हैं जब प्यासी धरा के अधर पे उठती है एक सोंधी सुगन्ध खिल उठती है हर कली और महकने लगते हैं फूल पिय के आगमन पे जैसे हरी चुनर ओढ़ बैठ गई हो नवयौवना कोई वैसे ही धरती ओढ़ लेती है हरियाली का आवरण मुरझाये पौधे भी े हरिहराने लगते हैं […]

कविता

कविता : मैंने तो बस चाहा तुम्हें

मैंने तो बस चाहा तुम्हें तुमसे हृदयतल से प्रेम किया जैसे प्रत्येक साधारण स्त्री करती है अपने स्वप्न पुरुष से तुमने तो कुछ क्षण के लिए सिर्फ मेरी कामना ही की कभी नही चाहा ना प्रेम किया कभी मेरे प्रेमी तो नही बन पाए हां बन गए नियंता मेरे समस्त भावनाओं के नियंत्रित करने लगे […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मुझे अपने से तुम जुदा न करो नही मुमकिन तो मेरे जीने की दुआ न करो। मर जायेंगे यूँ ही तड़प के तेरे जुस्तजू में बनके चारागर मेरे क़ातिल मेरी दवा न करो। नही मुमकिन कि हर बार हो तुम वाज़िब हूँ गुनहगार,चंद लम्हों में फैसला न करो। निभाओ शौक से रंजिशें नही गिला कोई […]