गीत/नवगीत

गीत – मधुमक्खी

जाना पड़ा एक दिन खजाना अपना छोड़ के क्या मिला मधुमक्खी तुझे कण कण जोड़ के उड़ती रही दूर-दूर पराग की खोज में शहद तेरा पीने वाले सोते रहे मौज में पाया क्या तूने दूर-दूर दौड़ के जाना पड़ा एक दिन खजाना अपना छोड़ के दे ना सकी रसा किसी को डंक ही चुभाती रही […]

कविता

मोबाइल

झांकते रहते हैं  दिन रात लोग इसमें मोबाइल खिड़की बन गया है… देखता कोई दूसरों की जिंदगी इसमें कोई अपनी जिंदगी दिखाता है तमाशे वाले की फिरकी बन गया है… सत्य से दूर बस, एक खिड़की का सत्य छवि इसमें बनाता इसी में दिखाता कृत्य अस्तित्व मानो खिड़की बन गया है… होके मजबूर, अपनों से […]

कविता

जीवन संघर्ष

मेरा दुश्मन कौन है मैं पहचानता भी नहीं लड़ता हूं अंधाधुंध वैरी कौन जानता भी नहीं खुद जानने का वक्त नहीं पाता कोई बताता है तो फिर मानता भी नहीं अंधेरों में लड़ रहा हूं हद से गुजर रहा हूं अपनी हदें है क्योंकि मैं जानता भी नहीं चाहूं तो उजालों से भर लूं जिंदगी […]

कविता

जीवन

क्षण क्षण ये रंग बदलता जीवन पल पल घड़ी सा चलता जीवन आठ प्रहर में सबका ढलता जीवन हर प्रहर संग कुछ बदलता जीवन नवपल्लव सा प्रथम खुलता जीवन फिर हर पल नए रंग बदलता जीवन नित सब्ज़ रंग नवीन उगलता जीवन बेरंग हो इक दिन फिर ढलता जीवन शुष्क जर्जर टूट धरा में मिलता […]

गीत/नवगीत

गीत – मत भुलाइए

दुर्दिन पर किसी के ऐसे न मुस्कुराइए दिन बदलते लगती न देर मत भुलाइए ऊंँचाई पर जो है फिर नीचे आना होगा वक्त की डगर ऐसी सभी को चलना होगा वक्त एक साथ रहता नहीं किसी का यह न भूल जाइए…. दिन बदलते लगती ना देर मत भुलाइए… अपने दुख में डूबा हुआ वो तो […]

कविता

हुनरमंद कितने

हुनर कितने हालात की भट्टी में , जल रहे , संभावनाएं कितनी ही ,  बेढ़ंगे नियम  निगल रहे , प्रशासन की लचर जमीं पर फूल और फल कितने मुरझाए खिलने से पहले, बीज कितने झर रहे ।। वहीं कचरे अधकचरे बीज कितने बंजरों में खिल रहे , पाकर तुष्टि पुष्टि सत्ता से ,भूत के अवशेष […]

इतिहास

कबीर दास जी की सत्य निष्ठा

  महात्मा कबीर का पालन पोषण एक जुलाहे के घर हुआ था और उन्होंने स्वयं भी उसी पेशे को अपनाया था एक बार की बात है वे रूई पींज रहे थे पास ही पींजी हुई रुई का ढेर लगा था उसी समय एक आदमी दौड़ता हुआ कबीरदास के पास आया और बोला _”महाराज कृपा करके […]

कविता

इंसान की माया

उस युग में भगवान ने , माया का जाल बनाया था । नारद जी को उसमें , गोल गोल घूमाया था । इस युग में भी बहुत से भगवान , माया जाल फैला रहे हैं ! स्वयं बनकर भगवान, मन के नारद को भरमा रहे हैं! सुंदर सुंदर फूल है पहाड़, झरने हरियाली है । […]

कविता

मन में राम राज्य

मन के दशरथ को संभाल ले ! दिख जाए जिस दिन सफेदी ठान ले ! तन के दशरथ की लगाम बांध लें ! यज्ञ करके इच्छाओं का जोग साध ले! ज्ञान और कर्म के साथ मिला के मन, सौंप दे स्वयं को दशरथ गुरु चरन! राम आएंगे सफल हो जाओगे ! समय से यदि सुफल […]

कविता

पैर और पहिए

एक रास्ता था। दो पैर थे। चलते जाते थे। रोज नया गीत गाते थे। बड़े हुए फिर  रुके, चलते चलते थके। हजार हाथ वाले को पुकारा!! उसने दो पहियों का दिया सहारा। दो पैर अब बजाते जाते। दो पहिए अब गीत गाते जाते। पैर अब फिर थके, बजाते बजाते रुके, गीत खो गए। उदास हो […]