कविता

ख़ाक हुई मंजिल संदली-सी…!

आसमान से गिरा परिंदा, देख बद्नीयत नर की, ख़ाक हुई मंजिल संदली-सी, लुटते हुए सफर की…! पंछी इस अनजान डगर पर रोज सवेरे आता, सेठ मगन का हरा बगीचा उसके मन को भाता, नहीं लुभा पाती थी उसको, कोठी संगमरमर की, ख़ाक हुई मंजिल संदली-सी, लुटते हुए सफर की…! रोजाना की तरह आया वो दाना […]

कविता हास्य व्यंग्य

सौ चूहे खा बिल्ली हज़ को चली..!!

नमाज़े छोड़ सूफ़ी बनने चली, राजनीति नेताओं के बंधन तोड़ चली, नेताओं की भी चालें कुछ अदली कुछ बदली, सौ चूहे खा बिल्ली हज़ को चली..!! जेबें नेता भरके, गंगा स्नान चले, हो मलीन, करने मलीन हरिद्वार धाम चले, हरि के गुण कभी भजे नहीं, घिस गई हृदय-तली, सौ चूहे खा बिल्ली हज़ को चली..!! […]

बाल कविता

नानाजी का पतंग शौक

चुन्नु-मुन्नू के नानाजी को, पतंग उड़ाने का शौक लगा, रंगीले पतंगों को देखा तो उनको ये बे-रोक लगा..! नानाजी ने झुर्रीले हाथों में पतंग उठाई, एक हवा के झोंके ने हाथों से छिटकाई, नानाजी धीमे-धीमे पतंग के पीछे दौड़े, पतंग गिरी छत के नीचे फिर भी ना पीछा छोड़े, साँसे नानाजी की फूलने को थी […]