कविता

वृक्ष

सहता रहा मौसमों की मार रह ख़ामोश धीमे-धीमे एक छतनार वृक्ष। सूखती रही नमी झरते रहे पात सूख गईं शाख़ाएँ ठूँठ हो गया वृक्ष तन्हा कर गए जो साथ थे – ग़र्ज से नहीं मारता पर कोई भी परिंदा चींटियाँ, गिलहरियाँ न जाने कहाँ खो गईं कोई राहजन जानवर भी आता नहीं पास खड़ा है […]

कविता

प्रेम

अनजानी राहों से दरिया को चीर नींद से करके वफ़ा के वादे आ बैठा सिरहाने, पर्वतों को लांघ चला ही आया तुम्हारा प्रेम। चुप थे अँधेरे सहलाता रहा केश चूम ही लिया मुँदी पलकों को बिखरी अलकों में उलझ गए तुम्हारे नैन। होठों की जुंबिश बुलाती रही तुम्हें और तुम निहारते ही रहे मेरे चेहरे […]

कविता

सड़क पर भविष्य

कचरे का ढेर ढेर पर बच्‍चे जूठन बीनते नज़रें चुरा निगलते देखा है अक्सर इन में भविष्‍य भारत का मैंने । भारत का वर्तमान दौड़ता है सरपट फ़ेरारियो में बढ़ जाता है आगे लाद कर जिम्मेदारियाँ ज्ञात-अज्ञात रोकती हैं लाल बत्तियाँ चौक-चौराहे, गली मुहाने आ ही जाती हैं याचनाएँ पसर जाते हैं हाथ खीजता-सा वर्तमान […]

कविता

“अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो”

  रह-रह कानों में पिघले शीशे-से गिरते हैं शब्द “अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो”। ज़हन में देती हैं दस्तक घुटी-घुटी आहें चीखें, कराहें बिटिया होना दिल दहलाने लगा है अनजाने ख़ौफ़ दिल पालने लगा है मर्दाने चेहरे दहशत होने लगे हैं उजाले भी अँधेरों-से डसने लगे हैं ! बेबस से पिता घबराई-सी माँ कब […]

कविता

दोहे

१. सटे-सटे से घर यहाँ, कटे-कटे से लोग। त्रासदी ये शहरों की, लोग रहे हैं भोग॥ २. धरा-गगन-पानी-हवा, ईश्‍वर के उपहार। साँस-साँस में वो बसा, मत छीनो अधिकार॥ ३. ख्वाबों की ताबीर ये, छोटा-सा संसार। महके फुलवारी सदा, चहकें ख़ुशियाँ द्‍वार॥ ४. नारी तुम संवेदना, ममतामयी अनूप। रिमझिम बरखा नेह की, जीवन तपती धूप॥ ५. […]

कविता

मृत्तिका

मृत्तिका – अनगढ़ अनाकार पाने को आतुर सुघड़ आकार अपनी पहचान। पाया कुम्हार का स्नेहिल स्पर्श हो गई समर्पित ढलती गई उत्कृष्‍ट प्रतिमा में अनुगृहीत प्रफ़ुल्लित बोली – मैं, मैं कहाँ जैसे ढाला ढली हूँ कला कुम्हार की उसी की कृति हूँ । बोला कुम्हार – न होती तुम गुणग्राही मेरी प्रतिभा फिरती मारी-मारी मेरी […]

कविता

वह दरख़्त

वह दरख़्त सहता रहा मौसमों की मार साल-दर-साल लगातार नहीं रही नमी झर गए पत्ते सूख गईं शाखें तन्हा कर गए खुद ग़रज़ सभी नहीं पर मारता इधर कोई परिंदा चींटीं, गिलहरियाँ न जाने कहाँ खो गईं कोई राहजन जानवर तक आता नहीं पास खड़ा है उदास नितांत अकेला निर्जन हो गया है जड़ । […]