भाषा-साहित्य

वैश्विक परिदृश्य में हिंदी : एक अवलोकन

इक्कीसवीं सदी ‘विश्व समाज’ की संकल्पना को साकार करने की सदी है. आज सारा जगत एक ही सूत्र में बन्ध रहा है. यह सूत्र जिस विचार धारा के लिए प्रवाहमान है. यह विचार धारा है ‘आधुनिकीकरण’ की विचारधारा . जो सारे वैश्विक समाज का ताना-बाना बुनती है. जो वैश्विक समाज की संकल्पना को मूर्त रूप […]

कविता

पानी पानी पानी

आज की है ये चीखो-पुकार पानी पानी पानी… जनता है परेशान, नेता हैं हैरान कहां से लायें पानी पानी पानी… नदी नाले बोर कुएं सभी हो चुके हैं खाली कहते हैं लोग कहां से लायें पानी पानी पानी दिन गुजरे खाली पेट जिसके बगैर एक पल न हो गुजार वो है पानी पानी पानी राह […]

राजनीति

डाॅ. आंबेडकर : एक विचार

‘‘मैं केवल भारतीय रहूँगा। मेरी पहचान केवल एक भारतीय के रूप में होनी चाहिए। ….बस मंै इसी बात के लिये मर जाना चाहता हूँ। मैंने देख लिया है कि जब तक हम अपने को हिंदु, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, यहुदी जैसे धर्म संबोधनो में बांटते रहेंगे तब तक हम आदमी नही बन सकते। तब तक इस […]

लेख सामाजिक

प्रगति का आधार ‘नारी‘

भारत एक प्रगतिशील राष्ट्र है। प्रगतिशील राष्ट्र है तो यहाँ बाधाएँ, ऊँच-नीचता और लैंगिक भेदभाव सहज ही होता है। इसका मतलब यह नहीं है कि शोषण भी हो। बाधाएँ तो आती और जाती रहेंगी, किंतु लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और कुछ कड़े क़दम उठाने पडेंगे, इसी से महिलाओं […]

लेख सामाजिक स्वास्थ्य

सरकारी अस्पताल यमदूत या मसीहा

भारतीय संविधान में भारत की जनता को अपनी पसंद से जीने के मौलिक अधिकार प्राप्त हूए हैं। रंज होता है ऐसी घटना को पढ़ कर – दस दिन के छोटे मासूम बच्चे को चूहों ने कुतर-कुतर के मार डाला। इस घटना ने न केवल दिलों को झकझोर दिया बल्कि इससे एक मां की गोद सूनी […]