कुण्डली/छंद

कुण्डलियाँ

माटी अपने देश की, पुलकित करती गात। मन में खिलते सहज ही, खुशियों के जलजात।। खुशियों के जलजात, सदा ही लगती प्यारी। हों निहार कर धन्य, करें सब कुछ बलिहारी। ‘ठकुरेला’ कविराय, चली आयी परिपाटी। लगी स्वर्ग से श्रेष्ठ, देश की सौंधी माटी।। देता जीवन राम का, सबको ही सन्देश। मूल्यवान है स्वर्ग से, अपना […]

कविता

कविता : रोशनी की ही विजय हो

दीप-मालाओ ! तुम्हारी रोशनी की ही विजय हो । छा गया है जगत में तम सघन होकर , जी रहे हैं मनुज जीवन-अर्थ खोकर , कालिमा का फैलता अस्तित्व क्षय हो । रात के काले अँधेरे छल लिए , बस तुम्हीं घिरती अमा का हल लिए , जिंदगी हर पल सरस, सुखमय , अभय हो […]

कविता

जय हिंदी,  जय  भारती 

सरल, सरस भावों  की  धारा , जय हिन्दी  ,  जय  भारती । शब्द शब्द   में अपनापन  है , वाक्य  भरे  हैं  प्यार  से , सबको ही  मोहित  कर  लेती हिन्दी  निज  व्यवहार  से , सदा बढ़ाती  भाई-चारा , जय हिंदी , जय  भारती । नैतिक  मूल्य सिखाती  रहती , दीप जलाती  ज्ञान   के […]

लघुकथा

अंतर्ध्यान

वह गरीब किन्तु ईमानदार था. ईश्वर में उसकी पूरी आस्था थी. परिवार में उसके अतिरिक्त माँ, पत्नी एवं दो बच्चे थे. उसका घर बहुत छोटा था, अतः वे सभी बड़ी असुविधापूर्वक घर में रहते  थे. ईश्वर को उन पर दया आई, अतः ईश्वर ने प्रकट होकर कहा– “मैं तुम्हारी आस्था से प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम लोगों के […]

हाइकु/सेदोका

हाइकु

कोसते रहे समूची सभ्यता को बेचारे भ्रूण दौड़ाती रही आशाओं की कस्तूरी जीवन भर नयी भोर ने फडफढ़ाये पंख जागीं आशाएं प्रेम देकर उसने पिला दिए अमृत घूँट नहीं लौटता उन्हीं लकीरों पर समय-रथ —-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

हाइकु/सेदोका

कुछ हाइकु

कटे जब से हरे भरे जंगल उगीं बाधाएँ कोसते रहे समूची सभ्यता को बेचारे भ्रूण दौड़ाती रही आशाओं की कस्तूरी जीवन भर नयी भोर ने फडफढ़ाये पंख जागीं आशाएं प्रेम देकर उसने पिला दिए अमृत घूँट नहीं लौटता उन्हीं लकीरों पर समय-रथ —-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

कुण्डली/छंद

ठकुरेला की  कुण्डलियाँ 

जिसने  झेली दासता , उसको  ही  पहचान । कितनी पीड़ा झेलकर , कटते हैं दिनमान ।। कटते हैं  दिनमान ,  मान  मर्यादा खोकर । कब  होते  खग मुग्ध , स्वर्ण -पिंजरे में सोकर । ‘ठकुरेला’  कविराय , गुलामी चाही किसने । जीवन  लगा  कलंक , दासता झेली जिसने ।। मालिक  है  सच में  वही , […]