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  • “पगली” कहीं की..

    “पगली” कहीं की..

    अक्सर कुछ शब्द उन्हीं शब्दों से जुड़ी बात और उन्हीं बातो से जुड़े लोग मात्र हँसी के पात्र बनकर रह जाते है उनको लगता वो सर्वोपरि है । अभी हाल ही कि बात लीजिये एक सहाब...

  • शब्द बन रहूँगी

    शब्द बन रहूँगी

    हूँ तो सही… ढ़ूढ़ो तो यहीं-कहीं पता है यहीं हूँ ना दूर-दराज,दिन-दोपहर सुबह-शाम,ज़मी-ऑसमा ।। हूँ तो सही… बन धरा पे धरणी हर परिकल्पना मे… एक कल्पना कोरी-कोरी हर पन्नों पर छाई वो तरूणाई सामने आई कभी...

  • वंदन बन नमन करे

    वंदन बन नमन करे

    चंदन बन वंदन करें देश की माटी हम, नित नित तुझे नमन करे ।। पर्वत पठार कल-कल छल-छल बहती अविरल धारा चाहें घनघोर घटाएं आयें या कोहरा बन धूँध सा, एक बॉदल छाये तब भी श्वेत चाँदनी...


  • पता नहीं

    पता नहीं

    तुमसे हुई बात, वो पहली शाम ना जान कर पहचान तो की, इतना हीं तो कह पाई थी जानना नहीं था,,,, पर…. बस इतना सा समझ सकी थी तुम्हें कि शायद ! “पता नहीं” ये पहली...