इतिहास

लाखामंडल की ईश्वरा प्रशस्ति

नगाधिराज हिमालय की यमुना घाटी मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यंत वैभवशाली व सम्पन्न रही है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के जौनसार-बावर क्षेत्र में स्थित लाखामंडल स्थान पुरातात्विक धरोहर के रूप में विश्व विख्यात है। यह स्थान जनपद मुख्यालय से मसूरी होकर जाने वाले राजमार्ग पर लगभग ११०कि०मी० दूर मध्य हिमालय उपत्यका में अवस्थित […]

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अल्मोड़ा प्रकार की जनजातीय मुद्राएँ

शुंग काल में उत्तर भारत के हिमालयीय क्षेत्रों में अनेक स्थानीय शासकों का आविर्भाव होने लगा था जो अपने कबीलाई भागों के स्वतंत्र शासन का निर्भीक होकर सत्ता-सञ्चालन करने लगे| उन्होंने अपनी जनतान्त्रिक शासन–प्रणाली स्थापित करके मुद्राएँ प्रचलित कीं| इनमें राजन्य, शिवि, त्रिगर्त, औदुम्बर, यौधेय व अल्मोड़ा के शासक प्रमुख थे जिनके इतिहास का मुख्य […]

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 टिहरी गढ़वाल से प्राप्त कुषाण कालीन स्वर्णिम मुद्राएँ

भारतीय इतिहास में सर्वप्रथम स्वर्णिम मुद्राएँ प्रचलित करने का श्रेय कुषाण शासक विम कद्फिसेज़ को है| कालान्तर में उसके उत्तराधिकारियो ने भी स्वर्णिम मुद्राओं के प्रचलन की परम्परा को अक्षुण्ण रखा| कुषाणों का साम्राज्य पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बिहार, उड़ीसा राज्यों तक तथा उत्तर में चीन से लेकर दक्षिण में गुजरात व […]

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राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर की उत्कृष्ट सूर्य–प्रतिमा

ऋग्वैदिक कालीन देवताओं में सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान था. उस काल में आर्यों ने सूर्य से सम्बन्धित अनेक देवताओं की कल्पना कर ली थी. इनमें सविता, पूषण, मित्र, अर्यमन और विष्णु प्रमुख हैं. इस प्रकार वैदिक काल से ही सूर्योपासना का उल्लेख स्पष्ट रूपेण मिलने लगता है. शनैः-शनैः यह परंपरा सम्पूर्ण भारत में विकसित होती […]

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राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर की उत्कृष्ट शैव प्रतिमाएँ

अतीत काल से ही गोरखपुर का ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व रहा है. मध्ययुग के सुप्रसिद्ध संत गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर इस स्थान का नाम गोरखपुर पड़ा है. प्रमाणस्वरूप यहाँ का लोकविश्रुत गोरखनाथ मन्दिर मात्र उत्तर प्रदेश में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत के हिन्दुओं के ह्रदय में पवित्र आस्था एवं श्रध्दा का केंद्र […]

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यौधेय गणराज्य : मुद्राशास्त्रीय अनुशीलन

प्राचीन भारतीय राज्यों में प्रमुखतः दो प्रकार की शासन प्रणाली प्रचलित थी _राजतंत्रात्मक एवं गणतंत्रात्मक.राजतंत्रात्मक शासन प्रणाली में शासन का प्रमुख राजा होता था, जबकि गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली ‘ में संघ अथवा गण के प्रमुख व्यक्ति को शासक नियुक्त किया जाता था.लगभग ४०० ईसा पूर्व से लेकर ३०० ईसवी तक के दीर्घ समयांतराल में ऐसी […]

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कुलिन्द गणराज्य : मुद्राशास्त्रीय अनुशीलन

परवर्ती मौर्य सम्राटों के शासनकाल में सत्ता की कमजोरी का लाभ उठाकर प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में गणराज्यों का अस्तित्व पुनः विद्यमान हो गया था जिसका प्रमाण उन शासकों द्वारा प्रचलित मुद्राएँ हैं. पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा व उत्तराखंड राज्य के विभिन्न स्थानों से तत्कालीन कुलिन्द गणराज्य की ऐतिहासिक मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं […]

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अशोक का कालसी शिलालेख

मौर्य सम्राट अशोक की गणना  विश्व के महान शासकों में की जाती है | उसने अपने विशाल साम्राज्य में अनेक स्तूपों, विहारों, शिलालेखों, स्तम्भ लेखों व गुहा लेखों की स्थापना कराई थी तथा उनके माध्यम से वह देश में लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना को मूर्त्त स्वरुप  प्रदान करना चाहता था | अभी तक हमें […]