कविता

कविता

हसीन दरख्तों के निशान भी जब जमीन को चुभने लगें मुमकिन है दरख्तों का जिंदा रहना क्या हुआ जो धरती से अलग होना पढ़े। वक़्त कहाँ है अब किसी के लिए मस्त हैं सब अपने जहान में । मत बता किसी को गम अपना क्या हुआ जो दर्द खुद का छिपाना पढ़े । इल्जाम वो […]

कविता पद्य साहित्य

उम्मीद

  दामन में छिपाए बैठे थे उम्मीदों के आसमां बेरुखी ने जमाने की कुछ यूँ तन्हा कर दिया सोचा भी न था अश्क़ों से दोस्ताना रहेगा आये भी जो आँसूं तो छिपाना भी हमें होगा जालिम तो न थी यूँ तेरी मदहोश अदाएं दौर ये तन्हाई का यूँ हमको निभाना होगा । ऐ मौत तू […]

कविता पद्य साहित्य

रेत का बुलबुला

तन्हाइयों में अक्सर होता है ऐसा आजकल खुद ही रोती हूँ, खुद ही चुप हो जाती हूँ दौर ऐसा भी गुजारा है नाखुदी का दिल ने अतीत को सहेज कर दिल को मना लेती हूँ ओढ़कर उदासियों की चादर सुकून आता है यही तो सच है जिंदगी का चलो हँस लेती हूँ चाँद कब हुआ […]

कविता

जख्म

भर जाते होंगे वक़्त के साथ यादों के गहरे जख्म भी , भुला देता होगा आसमान भी बूंदों की बेबफाई को तल्खियों के बाद । चला जाता होगा पतझड़ का मौसम भी एक समय के बाद , भर आता होगा ह्रदय भी समुद्र का नदी से बिछुड़ने के बाद । जख्मों का क्या लेना देना […]

कविता

अवशेष

जब भी हर्फ़ों को कागज पर उतारना चाहा , तुम और तुम्हारे जज्बात आँखों में उतर आये / कलम दौड़ती रही दीवारों पर चित्रभीति जैसे, ख्यालों में जाने क्यूँ तुम गमगीन नजर आये / अवशेष ही तो है धुंधली यादों के चहकते पन्ने , जैसे बादलों से चमकती बिजली नजर आ जाए/ डोर प्यार की […]

कविता

दर्द

जब भी हर्फ़ों को कागज पर उतारना चाहा तुम और तुम्हारे जज्बात आँखों में उतर आये कलम दौड़ती रही दीवारों पर चित्रभीति जैसे ख्यालों में जैसे तुम गमगीन नजर आये । अवशेष ही तो है धुंधली यादों के चहकते पन्ने जैसे बादलों से चमकती बिजली नजर आ जाए डोर प्यार की टूटना नामुमकिन है इस […]

कविता

सुकून

तुम मुझे मेरा सुकून लौटा दो वो खोया हुआ समय लौटा दो । रखा था संभालकर बरसों से वो मेरा कीमती सामान लौटा दो । घुँघरू की तरह खनकते थे कभी वो बोल मुझे आज फिर से सुना दो । चले भी आओ कहाँ खो गए हो तुम वो मेरी खोई हुई हँसी लौटा दो […]

क्षणिका

क्षणिकाएँ

1 आंसूओं ने भी सीख लिया है चुपचाप बहना, क्यों रुलाये और किसी को गम तो अकेले है सहना। 2 उदास रातों का कभी तो अंत होता काश वो सितारा हमारे संग होता। 3 पढ़ सके जो मुझ को आज तक न ऐसा चश्मा बना, मैं वो आँसू हूँ समंदर का जिसे कोई न ढूंढ […]

गीत/नवगीत

नफ़रत

लहू बनकर बहती है मोहब्बत जहाँ आज भी जिस्म में , जाने कैसे नफरत से यारी कर लेते हैं लोग ? तन्हाइयों से सहम कर टूट जाते हैं पत्ते भी पेड़ की शाख से , जाने कैसे अपनों को भुला देते हैं लोग ? हमको नहीं था इल्म दूर दूर तक जमाने की बदलती हवाओं […]

सामाजिक

प्रेम

एक दूसरे की भावनाओं को समझना दुनिया का सबसे दुष्कर कार्य है । प्रेम की मूल भावना प्रेम को बाहरी रूप में देखना ही नहीं अपितु प्रेम की गहराई में उतरना है । कुछ अनसुलझे सवालों को तलाशना भी प्रेम का ही रूप है । प्रेम को परिधि और शर्तों में बाँधना भी प्रेम का […]