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  • “इंसाफ”

    “इंसाफ”

    “-अरे! ये क्या? आज का भोजन किसने तैयार किया है?” रात्रि भोजन के समय सभी खाने पर ज्यूँ ही एकत्रित हुए… थाली पर नजर पड़ते ही पिताजी चिल्ला उठे… “-जरूर ई खाना मेरी पत्नी का बनाया...

  • समाज के कोढ़ (2)

    समाज के कोढ़ (2)

    ज्यों ज्यों लघुकथा सम्मेलन का दिन करीब आता जा रहा है , त्यों त्यों एक नई लघुकथा जन्म ले रही है एक महोदय ने आयोजनकर्त्ताओं में से किसी एक को फोन किया -हैलो!” -मैं xyz बोल...

  • साज़िश

    साज़िश

    “देखो! देखो… कोई दरवाजे का ग्रिल काट रहा है… कोई तो उसे रोको ! अंदर आकर वो मुझे भी मार डालेगा…” “आपको ऐसा क्यूँ लग रहा है ? मुझे तो कोई दिखलाई नहीं दे रहा है…”...

  • “समझ”

    “समझ”

    -एक्सपायरिंग डेट हो गई हैं आप अम्मा जी” -चल इसी बात पर कुछ चटपटा बना खिला” खिलखिलाते हुए पचासी साल की सास और अड़तीस-चालीस साल की बहू चुहल कर रही थी -आज मुझे *एक दीया शहीदों...


  • रणनीतिज्ञ

    रणनीतिज्ञ

    “सक्सेना मैम… मैम… सक्सेना मैम…” आश्चर्य हुआ कि देश से इतनी दूर जर्सी की सड़क पर उसे कौन आवाज दे सकता है. फिर भी मुड़कर देखा तो एक नौजवान दौड़ता हुआ उसकी ओर आता दिखा और...

  • अपना-पराया

    अपना-पराया

    सीलन लग बर्बाद ना हो जाएँ यादगार लम्हें… बरसात खत्म होने को ही है… चलो आज सफाई कर ही दी जाए… बुदबुदाती विभा अलमीरा से एलबम निकाल पलंग पर फैला दी… पास ही खड़ा बेटा एलबम...

  • सूझ-बूझ

    सूझ-बूझ

    “इतने सारे बिस्कुट के पैकेट! क्या करेगा मानव ?” विभा अपनी पड़ोसन रोमा से पूछ बैठी । “क्या बताऊँ विभा! अचानक से खर्च बढ़ा दिया है, बिस्कुट के संग दूध, रोटी, मांस खिलाता है । मेरा बेटा नालायक...

  • सकूँ

    सकूँ

     सुबह से निकली गोधुलि लौट रही थी… थकान से जी हलकान हो रहा था… ज्यों ज्यों घर क़रीब आता जा रहा था त्यों त्यों रात्रि भोजन याद आ रहा था साथ ही पकाना याद आ रहा...