लघुकथा

“आधे में अधूरा-पहला प्यार”

एक लंबे अर्से के बाद उषा और निशा का मिलन हुआ… नदियों का आपस में मिलना आसान है , लेकिन अलग-अलग शहरों में ब्याही एक गाँव की बेटियों का मिलना कहाँ हो पाता है.… अपने मायके से बुलावे और ससुराल से भेजे जाने के बीच तारतम्य बैठाने में समय गुजरता जाता है… मिलते ही उषा […]

लघुकथा

“संस्कार”

हरीश लाला के बड़े बेटे गिरीश की शादी के लिए लड़की रीमा और रीमा के माता-पिता आये.. चाय नाश्ते के बाद बात शुरू हुई…“मुझसे शादी कर लें!” रीमा ने गिरीश से कहा।“मेरी शक्ल पर बुद्धू या पागल लिखा दिखलाई दे रहा है क्या आपको?” गिरीश ने कहा।“आप मुझसे शादी के लिए तैयार थे… वो तो […]

लघुकथा

जीवंतता

स्व लेखन की पुस्तक के लोकार्पण होने पर मेरी प्रसन्नता इंद्रधनुषी हो रही थी..। सोच बनी कि घनिष्ठ मित्रों को भी एक-एक प्रति भेंट करनी चाहिए। मित्रों की सूची बनाने के क्रम में बिगत सात वर्षों से फेसबुक पर बनी मित्र जो स्थानीय ही रहती थी, मिलकर उसे पुस्तक भेंट करने के विचार से उससे […]

लघुकथा

गहरी खामोशी

. दरवाजे की घँटी बजी ,मेरे पति दरवाजा खोल आगंतुक को ड्राइंगरूम में बैठा ही रहे थे कि मैं भी वहाँ पहुँच गई… दो मेहमान थे जिनमें एक से मैं परिचित… मैं वहाँ से हटने वाली ही थी कि अपरिचित ने कहा, “मुझे पहचानी आँटी?” और मेरे नजदीक आकर चरण-स्पर्श कर लिया.. आदतन आशीष देकर […]

लघुकथा

“शुभोत्कर्षिणी”

दिनोदिन अलगू कमजोर होता जा रहा था, बुखार उतर नहीं रहा था। वर्षों पहले उसकी पत्नी की मौत हो गई थी। चार छोटे-छोटे बच्चें। घर की स्थिति, रोज कुआँ खोदो, रोज प्यास बुझाओ। बच्चों को पढ़ाना जरूरी समझता परन्तु आर्थिक कमी के कारण पढ़ाना कठिन था। फिर भी किसी बच्चे से मजदूरी कराने के लिए […]

कविता

छलावा

हाँथ में बंधीं घड़ी पर सरकता समय और कामों को निपटाते गृहधुरी से बंधी स्त्री तेज़ी से चलाती हाँथ धड़कनों को धीमी गति से चलने को देती आदेश और सुनती तेज़ कठोर आवाज में आदेश “अंधेरा होने के पहले लौट आना” दोनों तरफ से खड़ी बस बस अपहरण की हो जैसे योजना साँस लेना दूभर […]

लघुकथा

रास्ते अपने-अपने

“क्या भाभी आप भी न! अपने लिए काँटों वाली डगर चुन लीं… छोटे देवर की व्यंग्य भरी आवाज सुन, विभिन्न तरह के फूलों से सजी दुकान के उद्घाटन पर आये अतिथियों से घिरी मेघा मुस्कुराई… “उस दिन के उस दिन, फूलों का वितरण नहीं हुआ तो मुरझाये फूलों का क्या करेंगी आप…?” “फूल मुरझाएंगे, किसी […]

सामाजिक

चक्करव्यूह

कुछ बातें आहत करती हैं तो वही कुछ बातें आगे का राह भी प्रकाशित करती हैं. अब नजरिया अपना-अपना गिलास आधा भरा या आधा खाली. #सवाल_बहना कल्पना भट्ट जी के #जबाब_विभा रानी श्रीवास्तव के 01. प्रश्न :- साहित्य में ब्रह्म समाया हुआ है, फिर उसको लिखने वालों का मन छोटा क्यों? उत्तर:- ब्रह्म तो कण-कण […]

लघुकथा

कहाँ_मिटती_भूख

“मोटर साइकिल मिल गईल मुनिया” थाने से छुड़ाये मोटरसाइकिल की सूचना पापा दे रहे थे… पापा के फोन रखते भाई को फोन लगाई ” सब ठीक हो गया, अब देर रात घर नहीं लौटियेगा।” “हाँ! सब ठीक हो गया… देर रात तब न लौटेंगे , जब मोटर साइकिल में बैटरी/इंजन और कुछ पार्ट-पुर्जा लगवा लेंगे।” […]

लघुकथा

“वक्त का गणित”

कलाकारी करते समय कूँची थोड़ा आडा-तिरछा कमर की और जरा सा दूसरे जगह भी अपना रंग दिखा दी… हाथी पर चढ़े, टिकने में टक टाका टक अव्यवस्थित ऐसे कलश को देख मटका आँख मटका दिया… कलश को बहुत गुस्सा आया उसके नथुने फड़कने लगे… अपने गुस्से को जाहिर करने के पहले उसने दूसरे से मशवरा […]