हास्य व्यंग्य

स्वप्निल इंटरव्यू

इंटरव्यूकर्ता – जी, आप लेखक हो? मैं – जी नहीं, मैं लेखक नहीं हूं। इंटरव्यूकर्ता – लेकिन आप लिखते तो हो! मैं – हां लिखता तो हूं। इंटरव्यूकर्ता – तो आप कैसे लेखक नहीं हुए? मैं – हां मैं वैसे ही लेखक नहीं हुआ। इंटरव्यूकर्ता – वैसे ही कैसे? मैं – ऐसे कि, वैसे मैं […]

कहानी

वे छह शिकायतें

उस दिन महिलाओं द्वारा की गई शिकायतों की सुनवाई के समय मैं भी उपस्थित था। शिकायतों की सुनवाई बारी-बारी हुई। पहली लड़की आई। उसे कुर्सी पर बैठने के लिए कहा गया। उस लड़की को मैं ध्यान से देख रहा था, जिसकी उम्र सत्ररह-अट्ठारह वर्ष के बीच थी। उसके खामोशी भरी उदास चेहरे से ऐसा लगा […]

हास्य व्यंग्य

माफिया और गुर्गे

लिखने की प्रेरणा लेखक होने के पेशे से नहीं, लहू में आए उबाल से मिलती है। इसलिए लेखक डरता नहीं, बल्कि पेशा डराता है! पेशेवर बनकर ही इस डर से मुक्ति पाई जा सकती है। फिलहाल अपने लहू के उबाल से डरने वाले पेशेवर नहीं बन पाते। दो शूटर किसी बड़े सफेदपोश माफिया के लिए […]

हास्य व्यंग्य

औलूक्य दर्शनम्

क‌ई दिनों बाद मार्निंग वाक की तैयारी में था कि एक कोने पर निगाह गई, एक मकड़ी अपने बुने जाले पर शिकार की तलाश में बैठी थी। सोचा, झाड़ू उठाकर मकड़ी का यह जाला साफ करता चलूं। वैसे तो आदमी दिनभर तीन-पाँच करता है, लेकिन सुबह-सुबह उसे कुछ धार्मिक टाइप की फीलिंग आती है। मैं […]

लेख

विभाजक रेखाओं का खोखलापन

दुनिया को एक न एक दिन इस महामारी से अवश्य मुक्ति मिलेगी| लेकिन इस बीमारी के जाते-जाते विकास का खोखलापन उजागर हो चुका होगा, वही विकास जिसे इस महामारी से पार पाने में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं| एक दिन यह होना ही था, आखिर धरती पर इंसानों की गतिविधियों की कोई न कोई […]

हास्य व्यंग्य

कोरोना-साहित्य

हुँ..हूँ..ऊँ..लिखास लगी है, लेकिन लिख नहीं पा रहा ! बड़ा अजीब है इस कोरोना-काल का असर! काम के दिनों में तो बात-बात पर लिखना हो आता था, बल्कि ऐसे समय का सृजन पाखंडी-साहित्य ही हो सकता है| लेकिन जैसे नशेड़ी के लिए नशा जरूरी हो जाता है, वैसे ही लिखने वाला लिखास की बेचैनी में […]

हास्य व्यंग्य

लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवा

“आपके लेखन में साहित्यिकता नहीं है!” लेखकीय मन से जुड़ने की कोशिश में मेरे सामाजिक सरोकार वाले मन ने मुझसे कहा। “रात-दिन तुम्हारी चिंता में रहता हूँ और इसी कारण लेखकीय कर्म में निरत हूँ, फिर यह कैसे कह सकते हो?” मेरे अंदर का लेखक बोला। “इसलिए कि आपका लेखन मुझे मान्यता दिलाने में असफल […]

हास्य व्यंग्य

हमहूं त देशहित में इहाँ फंसा पड़ा अही !

सीट-बेल्ट बाँधकर एक्सीलेटर दबाने के लिए जैसे ही उसपर पैर रखा, चिहुँक उठा, “ये ल्यौ ! घिसइया तो कार का बोनट पीट रहा है!” और “अरे गुरू! एत्ता दिन बाद अइन मउके पर मिल्यो, जइसे कहूँ हेराई गै रह्यो!” उवाचते हुए मिलने की खुशी भी जाहिर करता सुनाई दिया| मेरी यह बात कि “ड्यूटी पर […]

हास्य व्यंग्य

लोकतांत्रिक ढेले

आजकल देश को सही मायने में विशुद्ध लोकतांत्रिक बनाने के लिए ढेलेबाजी की जरूरत महसूस की जा रही है, ऐसा क्यों? क्योंकि यह एक प्रकार की सेक्युलरिज्म की भी अभिव्यक्ति है। वैसे तो इसके अभिव्यक्ति के कई तरीके हैं, लेकिन अन्य तरीके पुराने पड़ने के साथ अप्रभावित टाइप के हो रहे थे। कोई भी लोकतांत्रिक […]

हास्य व्यंग्य

आरे में आरा

टहल-वहल कर आया और झाड़ू-वाड़ू भी लगाया क्योंकि बाहर की खर-पतवार पर क‌ई बार निगाह-सिगाह पड़ चुकी थी। अब चाय-वाय पी लेने के बाद इत्मीनान से बैठ गया हूं। फेसबुक पर कुछ पोस्ट करने के लिए मन कुलबुलाने लगा, जैसे अखाड़े को देख पहलवानी सूझे! तो सोचा आओ इस पर कुछ लिखें-फिखें ही। क्या लिखना […]