लेख

विभाजक रेखाओं का खोखलापन

दुनिया को एक न एक दिन इस महामारी से अवश्य मुक्ति मिलेगी| लेकिन इस बीमारी के जाते-जाते विकास का खोखलापन उजागर हो चुका होगा, वही विकास जिसे इस महामारी से पार पाने में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं| एक दिन यह होना ही था, आखिर धरती पर इंसानों की गतिविधियों की कोई न कोई […]

हास्य व्यंग्य

कोरोना-साहित्य

हुँ..हूँ..ऊँ..लिखास लगी है, लेकिन लिख नहीं पा रहा ! बड़ा अजीब है इस कोरोना-काल का असर! काम के दिनों में तो बात-बात पर लिखना हो आता था, बल्कि ऐसे समय का सृजन पाखंडी-साहित्य ही हो सकता है| लेकिन जैसे नशेड़ी के लिए नशा जरूरी हो जाता है, वैसे ही लिखने वाला लिखास की बेचैनी में […]

हास्य व्यंग्य

लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवा

“आपके लेखन में साहित्यिकता नहीं है!” लेखकीय मन से जुड़ने की कोशिश में मेरे सामाजिक सरोकार वाले मन ने मुझसे कहा। “रात-दिन तुम्हारी चिंता में रहता हूँ और इसी कारण लेखकीय कर्म में निरत हूँ, फिर यह कैसे कह सकते हो?” मेरे अंदर का लेखक बोला। “इसलिए कि आपका लेखन मुझे मान्यता दिलाने में असफल […]

हास्य व्यंग्य

हमहूं त देशहित में इहाँ फंसा पड़ा अही !

सीट-बेल्ट बाँधकर एक्सीलेटर दबाने के लिए जैसे ही उसपर पैर रखा, चिहुँक उठा, “ये ल्यौ ! घिसइया तो कार का बोनट पीट रहा है!” और “अरे गुरू! एत्ता दिन बाद अइन मउके पर मिल्यो, जइसे कहूँ हेराई गै रह्यो!” उवाचते हुए मिलने की खुशी भी जाहिर करता सुनाई दिया| मेरी यह बात कि “ड्यूटी पर […]

हास्य व्यंग्य

लोकतांत्रिक ढेले

आजकल देश को सही मायने में विशुद्ध लोकतांत्रिक बनाने के लिए ढेलेबाजी की जरूरत महसूस की जा रही है, ऐसा क्यों? क्योंकि यह एक प्रकार की सेक्युलरिज्म की भी अभिव्यक्ति है। वैसे तो इसके अभिव्यक्ति के कई तरीके हैं, लेकिन अन्य तरीके पुराने पड़ने के साथ अप्रभावित टाइप के हो रहे थे। कोई भी लोकतांत्रिक […]

हास्य व्यंग्य

आरे में आरा

टहल-वहल कर आया और झाड़ू-वाड़ू भी लगाया क्योंकि बाहर की खर-पतवार पर क‌ई बार निगाह-सिगाह पड़ चुकी थी। अब चाय-वाय पी लेने के बाद इत्मीनान से बैठ गया हूं। फेसबुक पर कुछ पोस्ट करने के लिए मन कुलबुलाने लगा, जैसे अखाड़े को देख पहलवानी सूझे! तो सोचा आओ इस पर कुछ लिखें-फिखें ही। क्या लिखना […]

हास्य व्यंग्य

मीडिया के जुलाहे

गजब है भाई इस देश की मीडिया ! हाँ ‘मीडिया’ को लेकर कन्फ्यूजियाइए मत, आज के जमाने में इसका दो ही मतलब निकलता है; एक न्यूज चैनल और दूसरा सोशल मीडिया, बस। अगर यह चैनल वाला मीडिया किसी बात पर जोश में है तो समझिए पूरा देश जोश में है और अगर शोक में है […]

हास्य व्यंग्य

भोले बाबा के साथ राजनीति

वैसे मैं खोने-पाने का तो नहीं, लेकिन अपने द्वारा किए वादे का हिसाब जरूर रखता हूँ, आखिर हम त्रेता से कलियुग तक “प्राण जाय पर वचन न जाए” या फिर “वादा किया है, तो निभाना पड़ेगा” जैसी मान्यताओं को कांटिन्युअसली लेकर चलने वाले देश से जो हैं!! तो, अकसर साल बीतते-बीतते, मैं मूंड़ी घुमाकर पीछे […]

हास्य व्यंग्य

अभिभूतीकरण

घिसई अकसर नेताओं के भाषणों को “आरत के मन रहई न चेतू” टाइप से आब्जर्व करता है और उसी में अपना भाग्य तलाशता है। कभी-कभार मिलने पर जब वह इन भाषणों का जिक्र मुझसे करता है, तो मैं भी इनमें कहाँ-कहाँ पप्पू-गप्पू पन छिपा होता है, इस बात से उसे परिचित कराता हूँ। असल में […]

हास्य व्यंग्य

विपरीत कोण भी आपस में बराबर होते हैं !

मैंने चौराहे पर आज एक राजनीतिक दल का जुलूस देखा। जिसकी अगुवाई एक सज्जननुमा नेताजी के हाथ में था, जो बीच-बीच में अपने भाषण की दाल को नारे का तड़का देकर जुलूस में शामिल कामन-मैनों को परोस रहे थे। हाँ यही नारा था उनका “मिले पहले हमको रोटी-दाल, रखो तुम अपना मेवा-पकवान।” इस नारे का […]