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  • व्यंग्य की संतई

    व्यंग्य की संतई

    वैसे तो कबीर लिटरेचर मेरा प्रिय विषय रहा है..! लेकिन इधर कबीर राजनीति के क्षेत्र में उतर आए हैं, और व्यंग्यकारों ने इसे ताड़ लिया है ! तभी तो, बेचारे कबीर भी व्यंग्यियाए जा रहे हैं..बाप...

  • सरकार की आलोचना

    सरकार की आलोचना

    किसी भी सरकार के कामों नीतियों का विश्लेषण अपने निजी राजनैतिक दृष्टि से परे जाकर करना चाहिए। अभी पिछले दिनों वर्तमान सरकार की नीतियों से उपजे प्रभाव पर एक साथी से कुछ चर्चा हुई। इस चर्चा...

  • अरे इन दोऊ राह न पाई !

    अरे इन दोऊ राह न पाई !

    आज मन कुछ उदास था..अन्यमनस्कता में मन काम के प्रति एकाग्र नहीं हो पा रहा था..मन को कुरेदा..आखिर ऐसा क्यों? तो पता चला इधर कई दिन हो गए थे स्वजनों से मिले हुए..! मुझे अपनी मन:स्थिति...

  • गठबंधन की गाँठ

    गठबंधन की गाँठ

    गठबंधन के बिना यह दुनियाँ नहीं चल सकती, ऐसा मैं नहीं दुनियादारी कहती है..यहाँ कहाँ नहीं है गठबंधन! कोई बताए..? यह गठबंधन बिलावजह नहीं होता..हर कोई, या तो अपने फायदे के लिए, या किसी को जलाने...

  • जीवन की सहजवृत्तियाँ

    जीवन की सहजवृत्तियाँ

    अभी-अभी पौधे और घास सींचकर बरामदे के तखत पर मैं बैठा हूँ…जानता हूँ, इन्हें छोड़कर अब जाने वाला हूँ…लेकिन इन्हें कुम्हलाते…मुरझाते…नहीं देख सकता..एक अजीब सा लगाव हो आया है..इन पौधों और इस वातावरण से…!! खैर…यह भी...


  • ये बचाने वाले लोग !

    ये बचाने वाले लोग !

    …कुछ लोग “बचाओ-बचाओ” के शोर के साथ मेरी ओर बढ़े आ रहे थे…उत्सुकतावश मैं अपने आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ देखने लगता हूँ ..!! लेकिन संकटापन्न की कोई स्थिति दिखाई नहीं देती …फिर भी किसी को बचाने के आपद्...


  • गुड-गवर्नेंस वाली स्कीम

    गुड-गवर्नेंस वाली स्कीम

    पहले राजा लोग आलरेडी ईश्वर के अंश होते थे, इसलिए इनका किया-धरा आटोमेटिक “राजधर्म” हो जाता था..! कारिंदों के साथ हाथी-घोड़े पर सवार राजा रिरियाती रियाया के बीच “राजधर्म” का प्रतीक था..! लेकिन आजकल की लोकतांत्रिक...

  • मूर्तियों के देश में !

    मूर्तियों के देश में !

    सबेरे-सबेरे सोकर उठा तो तरह-तरह के उवाचों और हो-हल्लों के बीच मैंने अनुमान लगा लिया कि हो न हो लोकतंत्र पर एक बार फिर कोई खतरा मँडरा रहा है..!! वाह भाई वाह..! अपने देश में लोकतंत्र...