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  • धुंध के पार्टिकल

    धुंध के पार्टिकल

    बहोत धुंध है भाई! हाँ इस देश में धुंध ही धुंध तो है! सूर्य देवता अब कित्ता प्रकाश फेंकें कि धुंध कटे? कहते हैं हर जगह पक्ष और प्रतिपक्ष होता है, सो नमी है तो खुश्की...

  • जमानतदार

    जमानतदार

    अब मैं उसे हैरानी के साथ देखने लगा था..! और वह भी कपाल में गहरी धँसी मिचमिचाती आँखो से अपनी निगाह मुझ पर स्थिर किए हुए था…और इसी के साथ वातावरण में निस्तब्धता सी छा गई...



  • विकास का लेखा

    विकास का लेखा

    आजकल लिखने बैठता हूँ तो मन थका-थका सा अलसियाया हुआ होता है और इस चक्कर में नहीं लिखता हूँ तो, ऐसा लगता है जैसे कोई महान साहित्य रचे जाने से रह गया हो! अब अगर महान...

  • खूँटा और विकास

    खूँटा और विकास

    मेरी समस्या बड़ी अजीब है! वह यह कि विकास कराने और इसकी देखभाल करने वालों के हत्थे चढ़ चुके विकास को क्या कहूँ? मेरे लिए विकास अदृश्य टाइप की चीज नहीं है। कुछ लोग विकास को...

  • बाँध-संस्कृति

    बाँध-संस्कृति

    “बंधवा पर महवीर विराजै” बचपन में जब इसे सुना था तब तक बांध से परिचित भी नहीं हो पाया था! इसी दौरान उपमन्यु वाली कहानी जरूर पढ़ी थी और जाना था कि, छोटी सी कोई “बंधी”...


  • मेरी बस-यात्रा

    मेरी बस-यात्रा

    मुझे लगता है सरकारी बस सेवा मने रोडवेज बस पर चलना सुरक्षा और आर्थिक लिहाज से यात्रा का एक बेहतरीन विकल्प है। वैसे भी आजकल धीरे-धीरे सड़कों की स्थिति, खासकर प्रमुख शहरों को जोड़ने वाले मार्गों...