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  • चलते चलते…

    चलते चलते…

    भाव चुराते ताव चुराते साहित्य समुंदर  पार करन को वो शब्दों की नाव चुराते हाथ- सफाई  ऐसी करते अच्छे-अच्छे गच्चा खाते सूरज-चंदा छिपे ओट में बादल अपना रोब जमाते कहीं से शब्द कहीं से पंक्ति भानुमता यूं कविता बनाते मंचों पर छाजाते जैसे आसमान...

  • माँ

    माँ

    माँ “”””” माँ सुबह बनके जगाती है सबको चिड़िया सी चहकती फुलबारी सी महकती फिर दोपहर बन जाती सबको भोजन खिलाती फिर स्वयं खाती ढ़लती दोपहरी की तरह बिन ज़िरह बन जाती सांझ करती स्वागत अपने...

  • कविताएं…

    कविताएं…

    सन्ध्या का आगमन… “””””””””””””””””””””””””” अस्ताचल में छिपता सूरज तट की ओर धीरे-धीरे खिसकती नाव दिन भर की थकी हुयी लहरें शान्त हो विश्राम करती हुयी विलुप्त होता प्रकाश गहराता अँधेरा पशु-पक्षी-इंसान का घर आने का मन...

  • गज़ल

    गज़ल

    मेरी हर बात में गलतियां ढूंढ़ने लगे हैं वो जो थे कभी अपने गैर से लगने लगे हैं वो बदलाव उनका मुझको आता नहीं समझ खूबसूरत चित्र को बदरंग करने लगे हैं वो बदलाव आया उनमें...

  • गज़ल

    गज़ल

    राम राम बोल दिन का आरंभ कीजिए अवशेष जिंदगी का नित प्रारंभ कीजिए बहुत रंग झेले और बहुत  भरे हमने प्रभु नाम की मन से अब जंग कीजिए लगने लगे धुमिल जब चकाचौंध जग की तब...

  • मैं कवि…

    मैं कवि…

    कभी अक्षर की खेती करता कभी वस्त्र शब्दों के बुनता बाग लगाता स्वर-व्यंजन के मात्राओं की कलियां चुनता मैं कवि, कृषक के जैसा करता खेती कविताओं की और कभी बुनकर बन करके ढ़कता आब नर-वनिताओं की...