कविता

समंदर

जैसे हैं बादल गगन पर वैसे हैं सागर की लहरें दोनों का तन-मन सुहावन करती हैं सूरज की किरणें जैसे सुबहें होंगी दुपहर वैसे संध्या होंगी रातें जब भी रोते हैं वे बादल चुपके सहता है समंदर

कविता

पतंग

ज़िन्दगी इक पतंग हो तो चलेगा वह  दूर  तक टूट गया धाग कहीं पर तो टूटा  समझो बंधन तेज़ आंधी जब आए तो दुष्कर समझो जीवन लोग, मित्र, माँ -बाप सभी ने जोड़े है जो रंग बदन पे भीग जाए तो मेघ के जल से फिर भी न भूलो उनके नाम — वत्सला सौम्या

कविता

कविता – वत्त

वत्त दूर तक फैले पहाड़ों के बीच से धूप जो आ रही है पास थोड़ी देर रुककर वह, लौटती है, फटाफट। रोशनी और अँधेरे का अंतर तो, समझने की कोशिश करूँ मैं बारम्बार फिर भी, वत्तफ़ कहाँ से सुलझ लेने। ओस की बूँदें गिर गयीं थीं घासों पर।  जैसे किसी के नाजुक कपोल पर टपकी […]