जय विजय के अंक

गजल

गजल लगती है रुखसार से वो मुझको नूरी सी जिस्म को सांसे है वैसे ही वो जरूरी सी उसको खोजता फिरता हूँ इस जमाने में मगर वो तो बसती है मुझमें कस्तूरी सी उसके अहसास से खिल उठती है मेरी ये जिंदगी जो अधूरी है होकर पूरी सी उसके बिन हालत ऐसी हो जाती मेरी […]

जय विजय के अंक

हिन्दी के प्रति

हिन्दी के प्रति ========== हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है।संस्कृत के बाद विश्व की सबसे प्रतिष्ठित भाषा है।वैसे तो पूरे देश में इसका प्रचार प्रसार है।लेकिन राष्ट्रभाषा के रूप मे हिन्दी को जो गौरव मिलना चाहिए, वह हम नहीं दिला सकें है।इसीलिए तो हमें हिन्दी दिवस के अतिरिक्त हिन्दी सप्ताह, पखवाड़ा भी मनाना पड़ रहा है।दुर्भाग्य यह […]

जय विजय के अंक

चाहत-ए-हरियाली

  शहरों में जीने की ठान ली मैंने हां, गमलों में हरियाली पाल ली मैंने, गमले में बलखाती लता गिलोय की गमले में इठलाती कली अनार की…. गमले में पुदीना और बेल पान की तुलसी का पौधा संग छोटा सा देवस्थान भी…. कहीं गुलाब की सुगंध, कहीं खिलती अश्वगंध कहीं कद्दू करेला तो कहीं फूलों […]

कविता जय विजय के अंक

दिल तोड़ कर चली गई

दिल तोड़कर चली गई यह कैसी मोहब्बत थी दिल तोड़ कर चली गई, हम रह गए अकेले वह छोड़ कर चली गई। वादा किया था उसने ना छोड़कर मैं जाऊंगी, गर छोड़कर गई तो फिर लौट कर मैं आऊंगी। जब थी पड़ी जरूरत मुंह मोड़ कर चली गई, हम रह गए अकेले वो छोड़ कर […]