Category : जय विजय के अंक




  • मेरे मुक्तक

    मेरे मुक्तक

    श्रृंगार लिए कंचन सी’ काया वो,उतर आई नजारों में । करें  वो  बात  बिन  बोले,अकेले  में इशारो में । बिना देखे कही पर भी,मिले ना चैन अब मुझको, गगन के चाँद जैसी वो,हसीं  लगती हजारों मे...