संस्मरण

मुँह में कृष्ण, बगल में बकरी !

मुँह में राम, बगल में छुरी ! मेरी माँ पूजा-प्रवृत्ति की वर्त्तमान परिभाषा के अनुसार ज़िद्दी और मनमानी-आस्तिकता के करीब है! इस प्रवृत्ति को मैं फ़ख़्त शरीर-शुद्धि उपासना कहता हूँ, किन्तु ईश्वरीय उपासना लिए यह प्रवृत्ति ढकोसलाजन्य  व दकियानूसी प्रवृत्ति है । कई बरस पहले की बात है, मेरी माँ एकदिन पहले अरवा खाकर नियत […]

संस्मरण

ललन भैया और अठन्नी

ललन भैया को श्रद्धांजलि ! कटिहार शहीद चौक के पास एक होटल के बाहरी हिस्से के भूतल पर नितांत छोटा-सा किताब दुकान, किन्तु वहाँ जो भी पत्र-पत्रिकाएं और उपन्यासादि आपको चाहिए, वो निश्चितश: मिल जाएंगे ! इस दुकान पर बैठे हैं बतौर पुस्तक-विक्रेता यानी पान चबाते ललन भैया । वे कटिहार के पत्रकार बन्धुओं के […]

आत्मकथा लघुकथा संस्मरण

पड़ोसियत

आज सुबह उठतेही, मैं मेरा रोज का काम करने मतलब पानी भरने घर के बाहर निकली| अपने दो गुंडी उठाके बड़ी माँ के घर के नल के पास पोहच गई| नल के टाके में मैंने देखा तो पानी कुछ ज्यादा ही भर गया था| इसके वजह से गुंडी भरने में मुझे दिक्कत हो रही थी […]

संस्मरण

मित्रता के सापेक्ष

मनिहारी, कटिहार (बिहार) के एक उच्च विद्यालय में हिंदी अध्यापक श्रीमान रविशंकर सिंह जी ने समीक्षक के तौर पर पुस्तक [पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद (शोध)” को आद्योपांत पढ़ लिया है। रवि सर ने कहा है कि वे इस समीक्षा को ‘फ्रेश’ करने के बाद ही भेजेंगे! वरीय मित्र रविशंकर जी के हिंदी अध्यापकीय अवदान को […]

संस्मरण

एक अखबार का लोगो

अचानक मेरी नज़र ‘प्रभात खबर’ के ‘लोगो’ पर पड़ा, जो अर्द्ध सूर्य के सामने उड़ती चिड़िया लिए है, किन्तु यह ‘प्रभात खबर’ के टॉप हैडलाइन व टाइटल के नीचे प्रिंट होता था, जो मुझे अच्छा नहीं लगा, क्योंकि एक तो लोगो है, जो ऊपर होनी चाहिए, परंतु थी टाइटल के नीचे ! मैंने स्थानीय संपादक […]

संस्मरण

सीएल गाथानामा

कई समाचार-पत्रों में प्रकाशित समाचारों के विशद विश्लेषण पर एक ‘मध्य विद्यालय’ में स्थानीय शिक्षाधिकारी द्वारा औचक निरीक्षण पर पड़ताल ! ध्यातव्य है, औचक निरीक्षण के क्रम में कार्यालय या विद्यालय में अगर कोई कर्मी या शिक्षक नहीं हैं, तो वो अनुपस्थित माने जाते हैं ! ….. उस पर तब पदाधिकारी हाजिरी काटते हैं, तो […]

संस्मरण

विविधा विताशा

…. तो धर्मविहीन समाज के निर्माण में सादर सहयोग करें ! आप कैसे कवि हैं भाई ! ‘मुक्तिबोध’ को नहीं समझ पा रहे हैं ? हमें लगता है, आप ‘पर….भाष’ बुद्धिजीवी भी नहीं हैं ! क्यों ? श्रीमान प्रभाष ! यह कहकर आप ‘अहं’ का परिचय दिया हैं ! आपने क्या किया है अबतक ? […]

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अतीत की अनुगूंज -19 : असुरक्षित बचपन और परिणाम

ली एक चुप्पा सा बालक था। सत्र के शुरू में कक्षा में यह सुनिश्चित करना कठिन होता है की कौन सा बच्चा कितना होशियार है काम में अतः सबको नामाक्षर क्रम में बैठाया जाता है।   इससे उनके नाम याद करने में भी आसानी होती है।   ली अपने मित्र के पास ही बैठा। उसे अपने हिसाब से   बैठाया तो वह वापिस उसी […]

संस्मरण

कुछ दृष्टिकोण

इस कोरोनाकाल में अपने लंगोटिया यारा ‘संजू’ को जन्मदिवस पर यही शुभकामना दे सकता हूँ कि घर या बाहर सुरक्षित रहने का हरसंभव प्रयत्न करो और ताउम्र स्वस्थ रहो तथा नाबाद शतायुजीवन पाओ ! अगस्त माह में जन्म होना ऐसे ही ऐतिहासिकता लिए है, ऐसे में एक ‘लेखक’ के पास देने के लिए सिर्फ शब्द […]

संस्मरण

पहलवानी का शौक

पहले के ज़माने में जिम वगैरे तो थे नहीं। वर्जिस के लिए देशी अखाड़े थे। मामा के गाय का दूध भरपूर था। जब पहली बार अखाड़े गया। अखाडा उज्जैन में मक्सी रोड पर था। बहुत ही बड़ा था। जगह -जगह रस्से लटक रहे, कुश्ती लड़ने के लिए लाल मिट्टी का अखाडा। दंड- बैठक के लिए […]