संस्मरण

मेरी कहानी 49

कुछ ही दिनों में कैंप में हम ऐसे रहने लगे थे जैसे बहुत देर से यहां रह रहे हों। राकेश कुमार और जोशी जी कहीं स्कूल में अधियापक ही थे और उन की ड्यूटी यहां कैंप में लड़कों को ऑर्गेनाइज और उन की देख भाल करने के लिए ही थी और उन को इस काम के […]

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मेरी कहानी – 48

नौवीं की परीक्षा के बाद कुछ महीने गाँव में गुज़ार कर हम फिर से स्कूल जाने लगे क्योंकि स्कूल खुल गए थे। सभी लड़के एक दूसरे के गाँव को जाने लगे थे या यों कह सकते हैं कि हम सभी एक परिवार जैसे हो गए थे। आधे से ज़्यादा लड़के तो  गाँवों से ही आते थे क्योंकि […]

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मेरी कहानी – 47

यह चोरी की घटना से हम कुछ डर गए थे क्योंकि उस कुल्हाड़ी से अगर किसी की टांग काट जाती तो किया होता? सोच कर ही कंपकपी लग जाती। यों तो इस घटना को याद करके हम हँसते रहते थे लेकिन भीतर से हम सभी डरे हुए थे। अगर हम पकडे जाते और पुलिस स्टेशन […]

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मेरी कहानी – 46

फगवारे आ कर हम कुछ आज़ाद से महसूस करने लगे थे। ऐसा तो नहीं था कि हमें घर में कोई तकलीफ थी, बस यों ही सभी दोस्त इकठे रहने के कारण मस्ती करने के लिए आज़ाद थे। जब जी चाहता हम फिल्म देखने के लिए चले जाते, जब जी चाहता शहर में घूमने निकल जाते। […]

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मेरी कहानी – 45

स्कूल में तो अब बहुत दोस्त बन गए थे। स्कूल से वापिस गाँव में आ कर भी कुछ घर का काम करते और फिर गाँव में भी घुमते रहते। जीत का घर तो गाँव की दुसरी ओर था लेकिन रात को वोह मेरे घर आ जाता था। हम इकठे पड़ते और वहीँ सो जाते। सुबह […]

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मेरी कहानी – 44

अब हम शहर की ज़िंदगी में अच्छी तरह घुल मिल गए थे। जो एक झिजक थी वोह कब की दूर हो चुक्की थी बल्कि शहर के लड़कों पर हम भारी पड़ रहे थे। गाँव के लड़के ज़्यादा तगड़े और झगड़ा करने में आगे होते थे, लेकिन शहर के लड़के कुछ सभ्य थे और कोई झगडे […]

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मेरी कहानी – 43

रामगढ़िआ इंस्टिट्यूटस के बारे में कुछ लिखना चाहूंगा। जिस महान शख्सियत ने यह सब स्कूल कालज बनाये उस का नाम था सरदार मोहन सिंह रामगढ़िया। रामगढ़िया एक तरखान जात  है। मैं भी ज़ात का तरखान ही हूँ। इस तरखान जात का नाम रामगढ़िया कैसे पड़ा, इस का एक इतहास है। पंजाब के महाँराजा रणजीत सिंह से पहले […]

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मेरी कहानी – 42

मास्टर विद्या प्रकाश और मूलराज के बाद पंजाबी के टीचर आनंदपाल सिंह होते थे, बहुत हंसमुख, बूटिओं  वाली पगड़ी और कोट पैंट में बहुत खूबसूरत लगते थे और रंग के भी गोरे थे। जब बोलते उन के मुंह से हर निकला शब्द फूल जैसा लगता। यह मैं फखर से कह सकता हूँ कि पंजाबी की किताबें […]

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मेरी कहानी – 41

हमारे इम्तिहान हो गए थे और हम गाँव में घूमते  रहते। जैसे अक्सर होता है, उम्र के बढ़ने के साथ ही  हमारा हर चीज़ को देखने का नजरिया ही बदल जाता है, हम गाँव के इर्द गिर्द घूमते और नए नए दोस्त बनाते। जीत भजन बहादर और मेरी दोस्ती बहुत घनिष्ट हो गई थी और हमें कुछ लोग […]

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मेरी कहानी – 40

हमारी  मिडल स्कूल की पढ़ाई आख़री दिनों तक आ पौहंची थी। हमारे टीचर साहेबान अपना सारा धियान हम पर लगाए हुए थे क्योंकि मिडल स्कूल अभी नया नया सरकारी हुआ था, इस लिए वोह चाहते थे कि हम सभी पास हो जाएँ। बहुत दफा हम मास्टर हरबंस सिंह के घर चले जाते। उन की शादी अब हो […]