संस्मरण

समय

भतीजे के बारात में भतीजी को डान्स करते देख ; मैं सोच रही थी , समय कितना बदल गया या भैया कितने बदल गए ….. मेरी कोई सहेली ; हमारे घर मिलने आती थी तो मैं उसे जाते समय , दरवाजे तक छोड़ने नहीं जा पाती थी भैया की नजरें टेढ़ी हो जाती थी …. […]

संस्मरण

मेरी कहानी – 34

मेरी कहानी के काण्ड २६ में मैं ने लिखा था कि जो मैं लिख रहा हूँ , वोह बिखरे हुए माला के मणके ही हैं। कब कोई मणका माला में पिरोने के लिए मिल जाए ,कहना असंभव है। मैंने अपने बचपन के बारे में  काफी कुछ लिखा है और अभी लिखने को बाकी है। लेकिन आज सुबह जब […]

संस्मरण

मेरी कहानी – 33

तरसेम अब अपनी ज़िंदगी में मसरूफ हो गिया था और हमारा मिलन बहुत कम  हो चुका था। कभी कभी ही मैं उस के घर जाता और जब भी जाता उस की पत्नी सीबो मेरी बहुत आव भगत करती । सीबो एक बहुत सीधी साधी लड़की थी। बाहिर आ कर तरसेम सीबो की शकायतें करता रहता था। मुझे […]

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मेरी कहानी – 32

वैसे तो जीत सिंह बचपन से ही हमारे साथ पड़ता था लेकिन हमारी दोस्ती मिडल स्कूल में जा कर बहुत बड़ गई। जीत एक ऐसा लड़का था जो जनम से ही कॉमिडी टाइप था, हर वक्त लड़कों को हंसाता रहता और हाजर जवाब इतना कि कोई भी बात कर लो मुंह तोड़ जवाब देता था। […]

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मेरी कहानी – 31

हमारे गाँव राणिपुर के पश्चिम की ओर चार किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है जिस का नाम है तल्ह्न. जब की बात मैं कर रहा हूँ उस वक्त यहाँ कोई ख़ास गुरदुआरा नहीं होता था. सिर्फ एक छोटे से कमरे में गुरु ग्रन्थ साहिब की बीड जो सिखों का धार्मिक ग्रन्थ है होती थी […]

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मेरी कहानी – 30

अब हम कुछ बड़े हो गए थे और शरारतें भी करने लगे थे। यों तो मैं बहुत शरीफ लड़का था और बोलता बहुत कम  था, लेकिन कुछ शरारत करने में बगैर ज़्यादा बोले आगे हो जाता था। इसमें एक बात थी कि उस समय रास्तों पर टोने टोटके बहुत रखे हुए होते थे। कई बृक्षों की […]

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मेरी कहानी – 29

जब हम छठी क्लास में पड़ते थे तो हमें पता था कि इस गाँव के स्कूल में हमारा आख़री साल था और इस के बाद हमें प्लाही पड़ने जाया करना था, इसलिए हमें कुछ चिंता थी कि हमें इतनी दूर रोज़ पैदल चल कर जाना होगा। कभी कभी गाँव के कुछ लोग जिनमें डाक्टर सोहन […]

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स्मृति के पंख – 21

रिसालपुर आकर दूसरी साथ वाली दुकान भी हमने ले ली। बाकी जैसा भ्राताजी ने कहा था, दुकान पर काफी काम था। हमारा पड़ोसी दुकानदार मेरठ की तरफ से आया था और पंडित था। वह भी अकेला काम करता था। काम उसके पास बहुत था। उसके भी काफी ग्राहक हमारे पास आने लगे। भ्राताजी नौशहरा से […]

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मेरी कहानी – 28

जब जब  गियान चंद की याद आती हैं, साथ ही वोह नज़ारा भी याद आने लगता है जो उस की दूकान के दाईं ओर हुआ करता था। गियान की दूकान की इस ओर छोटा सा खाली मैदान होता था जिस में बहुत रौनक होती थी। दूकान के बिलकुल सामने भी बहुत बड़ा खुला मैदान होता […]

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मेरी कहानी – 27

कुछ दिन हुए मेरा दोस्त बहादर सिंह भारत से हो कर आया है। इस ऐतवार को वोह मुझे मिलने आया था। मैंने उसे भारत का हाल चाल पुछा तो कहने लगा ” गुरमेल, वैसे तो मैं ज़्यादा शिमले ही रहा लेकिन कुछ घंटों के लिए राणीपर भी गिया था। गुरमेल, राणीपर अब बहुत बदल गिया […]