संस्मरण

मेरी कहानी – 32

वैसे तो जीत सिंह बचपन से ही हमारे साथ पड़ता था लेकिन हमारी दोस्ती मिडल स्कूल में जा कर बहुत बड़ गई। जीत एक ऐसा लड़का था जो जनम से ही कॉमिडी टाइप था, हर वक्त लड़कों को हंसाता रहता और हाजर जवाब इतना कि कोई भी बात कर लो मुंह तोड़ जवाब देता था। […]

संस्मरण

मेरी कहानी – 31

हमारे गाँव राणिपुर के पश्चिम की ओर चार किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है जिस का नाम है तल्ह्न. जब की बात मैं कर रहा हूँ उस वक्त यहाँ कोई ख़ास गुरदुआरा नहीं होता था. सिर्फ एक छोटे से कमरे में गुरु ग्रन्थ साहिब की बीड जो सिखों का धार्मिक ग्रन्थ है होती थी […]

संस्मरण

मेरी कहानी – 30

अब हम कुछ बड़े हो गए थे और शरारतें भी करने लगे थे। यों तो मैं बहुत शरीफ लड़का था और बोलता बहुत कम  था, लेकिन कुछ शरारत करने में बगैर ज़्यादा बोले आगे हो जाता था। इसमें एक बात थी कि उस समय रास्तों पर टोने टोटके बहुत रखे हुए होते थे। कई बृक्षों की […]

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मेरी कहानी – 29

जब हम छठी क्लास में पड़ते थे तो हमें पता था कि इस गाँव के स्कूल में हमारा आख़री साल था और इस के बाद हमें प्लाही पड़ने जाया करना था, इसलिए हमें कुछ चिंता थी कि हमें इतनी दूर रोज़ पैदल चल कर जाना होगा। कभी कभी गाँव के कुछ लोग जिनमें डाक्टर सोहन […]

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स्मृति के पंख – 21

रिसालपुर आकर दूसरी साथ वाली दुकान भी हमने ले ली। बाकी जैसा भ्राताजी ने कहा था, दुकान पर काफी काम था। हमारा पड़ोसी दुकानदार मेरठ की तरफ से आया था और पंडित था। वह भी अकेला काम करता था। काम उसके पास बहुत था। उसके भी काफी ग्राहक हमारे पास आने लगे। भ्राताजी नौशहरा से […]

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मेरी कहानी – 28

जब जब  गियान चंद की याद आती हैं, साथ ही वोह नज़ारा भी याद आने लगता है जो उस की दूकान के दाईं ओर हुआ करता था। गियान की दूकान की इस ओर छोटा सा खाली मैदान होता था जिस में बहुत रौनक होती थी। दूकान के बिलकुल सामने भी बहुत बड़ा खुला मैदान होता […]

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मेरी कहानी – 27

कुछ दिन हुए मेरा दोस्त बहादर सिंह भारत से हो कर आया है। इस ऐतवार को वोह मुझे मिलने आया था। मैंने उसे भारत का हाल चाल पुछा तो कहने लगा ” गुरमेल, वैसे तो मैं ज़्यादा शिमले ही रहा लेकिन कुछ घंटों के लिए राणीपर भी गिया था। गुरमेल, राणीपर अब बहुत बदल गिया […]

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मेरी कहानी – 26

मेरा विचार है कि जीवनी लिखने में एक दिक्क्त तो आती ही है और वोह है बचपन की यादें। कौन सी बात १९५० में हुई, कौन सी ५१ या ५२ में, इन को सही सही लिखना अतयंत कठिन है। यह मैं इस लिए लिख रहा हूँ कि मेरी यादों की माला के मणके भी बिखरे […]

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मेरी जिंदगी का एक लम्हा !

अपने गाँव से लेकर बनारस तक खुशी पूर्वक शिक्षा लेकर आनन्द पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे। तभी एक तूफान आया हमारे जीवन के बरबादी की शुरूआत लेकर। एक फूल की तरह हमारी जिन्दगी सवंर ही रही थी कि बारिश के साथ आये तूफान ने फूल की पंखुड़ियों को झड़ा दिया। बस बाकी रह गयी […]

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एक उपन्यास की मौत

यूँ तो मुझमें सब कुछ कर देखने की ललक और इसके लिये हौसला भी पर्याप्त है परन्तु, जल के गर्भ में क्या छिपा है, यह तो उसमें उतर कर ही मालूम होता है। यह भी सच है कि मैं उपस्थित से शीघ्र ऊब जाता हूँ और कुछ और नया करने की लालसा जाग जाती है। […]