Category : कथा साहित्य

  • यशोदानंदन-१७

    कैसी विडंबना थी – गोकुल में जहां आनन्दोत्सवों की शृंखला थमने का नाम नहीं ले रही थीं, वही मथुरा में कंस के भवन में षडयंत्रों की शृंखला भी रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। पूतना-वध...

  • उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 42)

    38. स्वधर्म स्थापना हेतु शील बलिदान आहट सुनकर देवलदेवी शय्या से उठकर खड़ी हो गई। कक्ष में शहजादा खिज्र खाँ आ चुका था मदिरा के अत्यधिक सेवन के प्रभाव से लड़खड़ाते कदम, अफीम के असर से लाल होती...


  • यशोदानंदन-१६

           पूतना-वध हो चुका था लेकिन कैसे और क्यों हुआ था, सामान्य मनुष्यों की समझ के बाहर था। यह रहस्य स्वयं नन्द बाबा और मातु यशोदा जिनके नेत्रों के समक्ष यह घटना घटी, वे भी नहीं...

  • उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 41)

    37. बलात् समर्पण की रात्रि देवलदेवी फूल, कलियों, रत्न और जवाहरात से सजी शय्या पर बैठी है। उसकी देह इत्र की खुशबू से महक रही है। उसकी देह पर सोलह श्रंगार किए गए हैं और विभिन्न प्रकार के...

  • यशोदानंदन-१५

    नन्द बाबा और मातु यशोदा के नेत्रों से आनन्दाश्रु छलक रहे थे। समस्त गोकुलवासी भी आनन्द-सरिता में गोते लगा रहे थे। जिसे वे एक सामान्य गोप और अपना संगी-साथी समझते थे, वह परब्रह्म है, इसका रहस्योद्घाटन...