कहानी

अंजान रिश्ता…

गर्मियों के मध्य की एक गर्म सुबह, अपनी अगली कहानी के लिए एक नए शीर्षक और भूमिका की तलाश में हर सुबह की भाँती एक बार फिर घर से निकल पड़ा एक नवयुवक, जिसने शायद अभी-अभी लिखने की शुरुआत की है. वह लिखने के लिए ऐसे विषयों का चुनाव कर रहा है, जिसमें समाज की […]

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कहानी : गर्व अपनों पर…

उमाकांत जी आज बहुत परेशान थे कारण, अपने दोस्त से जो आज सुना उसे वो अपने दिमाग से भरसक प्रयास करने पर भी नहीं निकाल पाए है|  ”जाओ आप! ,यहाँ से कहीं, तो हम चैन से जिये,कब तक आपको झेलते रहेंगे | प्रेम शंकर की बहु ने उसे और भाभी जी को कहा | वैसे […]

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रिश्तों का कत्ल

एक शहर में जूतों की एक मशहूर दूकान थी , दीना नाथ  जो उस शहर में नया था ,उस दूकान की चकाकौंध  देख कर जूते खरीदने के लिए दूकान में दाखिल हुआ |वहां पर बहुत सारे ग्राहक बेठे हुए थे तभी उस दूकान का मालिक अपनी सख़्त आवाज़ में किसी को पुकारते हुए बोला “ […]

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कहानी : स्त्रीत्व मरता कब है

नक्सली लड़कियां जंगलो में भटक भटक थकान से टूट चुकी थी थोड़ा आराम चाहती थी. तभी संगीत की मधुर आवाज सुन ठिठक गयी| ना चाहते हुए भी वे मधुर आवाज की ओर खींचती चली गयी| गाने की मधुर आवाज की ओर बढ़ते बढ़ते वह गाँव के बीचोबीच आ पहुंची. एक सुरक्षित टीले पर चढ़ कुछ […]

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कहानी : मुश्किल फैसला

निशा ने राहुल को स्कूल के लिये तैयार किया और उसका लंच बॉक्स उसे दिया | राजेश को भी आज जल्दी निकलना था, उनका भी लंच बॉक्स तैयार किया और निशा ने उन दोनों को विदा किया | घर का सारा काम खत्म करते -करते आधा दिन खत्म हो गया | अब निशा थोड़ी देर […]

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कहानी : अधूरे ख्वाब

नेहा के पास जीने का कोई मकसद नहीं रहा, बस जी रही थी, क्युकि मरना उसके लिए इतना आसान नहीं था | एक के बाद एक समस्याओ से उसका जीवन घिरा रहता था| पता नहीं वो कैसे ये सब बर्दाश्त कर लेती थी |या फिर इसके आलावा और कोई रास्ता ही नहीं बचा था उसकी […]

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जिंदगी छोटी पड़ गई

कहानी थोड़ी पुरानी है …… एक परिवार में माँ और तीन बच्चे(दो पुत्र और एक पुत्री) थे. तीनों बच्चे छोटे छोटे थे तभी पिता की मृत्यु हो गई थी। … सबसे छोटी पुत्री को अपने पिता की छवि याद भी नहीं थी। ….परिवार में आमदनी का स्रोत्र खेती था. जिंदगी सुचारु रूप से चल रही थी. लेकिन जब बच्चे […]

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कहानी : फिर नई सुबह हुई …

आज घर में दिन भर खाली बैठे- बैठे बोरियत मेहसूस होने लगी| तो सोचा सब्जी मण्डी जाकर सब्जी ले आऊँ| तैयार होकर बाहर आयी| आज गर्मी ज्यादा थी, तो मैंने कॉटन की प्रिंटेड हल्की साड़ी पहनी| गैरेज में से गाड़ी निकाली और चल दी| सब्जी मंडी घर से थोड़ी दूर थी| मौसम बरसात का था, […]

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मेट्रो की अनोखी यादें

रोज की तरह आज भी मैं दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन से कश्मीरी गेट तक के लिए मेट्रो में चढ़ा लगभग-लगभग 20 मिनट का छोटा सा सफ़र है. रोज की ही तरह नए-नए चेहरे मेरे सामने थे, मैं दूसरी बोगी के 2 नंबर गेट के पास वाली पहली सीट पर जा बैठा. मेरे बगल वाली सारी […]

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अनसुलझे सवाल!!!

कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी……. पैरों से चढ़ती ठण्ड हाथों के कम्पन से होती हुई, दांतों की कड़कड़ाहट तक जा रही थी। घर से निकला तो देखा कोहरे की सफ़ेद चादर ने सारे आसमान पर अपना अस्तित्व जमा रखा है। कदम आगे की ओर बढ़ने से मना कर रहे थे, पर जाना भी जरुरी […]