कविता

मेरे पापा

प्यार हमेशा करने वाले। जीवन खुशियाँ भरने वाले।। सच्चे मित्र कहाते पापा। अपने साथ घुमाते पापा।। बचपन में वो साथ चलाते। सदा हमें संस्कार सिखाते।। बच्चों सँग बच्चे बन जाते। जोर – जोर से हमें हँसाते।। चाट पकौड़े खूब खिलाते। मेले में लेकर भी जाते। झूला हमें झुलाते पापा। जोकर से मिलवाते पापा।। सदा सत्य […]

कविता

बदलता परिवेश

  रोज रखता था चिड़िया के लिए पानी कुछ दिन से आती है चोंच डालती है चोंच डाल बिना पानी पिए उड़ जाती है कई दिन हो गए आती रोज है पर बिन पानी पिए लौट जाती है समझ नहीं आया ऐसा क्यों करती है फिर ख्याल आया कहीं ऐसा तो नहीं पहले मैं आर […]

ई-बुक पद्य साहित्य मुक्तक/दोहा

लाल नीति संग्रह : भाग -1

लेखनी  मत करियो कुंठित कलम, गाय मनुज यश गान। मानव  हित   में   लेखनी , वही     लेखनी   जान।।1।। राजनीति  राजनीति की कोठरी , कालिख से भरपूर। विरला ही कोई मिले, हो कालिख से दूर।।2।। चुनाव    आते    फूटता , जातिवाद नासूर। मतदाता को भ्रमित कर, करते चाहत पूर।।3।। अपराधी लड़े चुनाव, नहि निर्भय मतदान। […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

भोर (40 हाइकु)

1. भोर होते ही हड़बड़ाके जागी, धूप आलसी। 2. आँखें मींचता भोरे-भोरे सूरज जगाने आया। 3. घूमता रहा सूरज निशाचर भोर में लौटा। 4. हाल पूछता खिड़की से झाँकता, भोर में सूर्य। 5. गप्प करने सूरज उतावला आता है भोरे। 6. छटा बिखेरा सतरंगी सूरज नदी के संग। 7. सुहानी भोर दीपक-सा जलता नन्हा सूरज। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

रंग रूखसार का तेरे उड़ा-उड़ा क्यों है, मेरे महबूब तू इतना डरा-डरा क्यों है, ========================== ऐसा लगता है कि छूते ही छलक जाएगा, दिल का पैमाना लबालब भरा-भरा क्यों है, ========================== अगर खोली ही नहीं तूने कभी दिल की किताब, कोई-कोई वर्क फिर इसका मुड़ा-मुड़ा क्यों है, ========================== नहीं है वास्ता तुझसे मेरा अगर कोई, […]

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया छंद

चोरी नैनों से करे, लूटे मन का चैन। जब तब पलके मूंद कर, दिन को कर दे रैन ।। दिन को कर दे रैन , पिया की है छवि प्यारी । मनमोहे मनमीत, और मैं मन से हारी ।। कहे साधना बात , प्रीत की है जो डोरी। बाँधे तोड़े आज, हृदय की कर के […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

विश्वास करा भी दूं तो बताओ क्या फायदा । ज़ख्म दिखा भी दूं तो बताओ क्या फायदा। आंखें बंद करके अंधा बन कर अगर मैं। रात को दिन बता भी दूं तो क्या फायदा। लूट कर सब कुछ संग गैरों के हो लिए। अपना पन मैं जता भी दूं तो क्या फायदा। दो राहे पे […]

कविता

आस

सदियों का जो तप ये मेरा ना जाने कब का व्रत ये मेरा पल पल बिखरते हम रहे जिस चाह में बुझते जलते हंसते रहे ख्यालात में दिल के दर्द मेरे आंसुओ मे गिरते रहे हम भी क्या पागल बने दर्द शब्दों में कहते गये थी नही इतनी जफा ना हम समझे कभी वो अकेला […]

कविता

तमन्नाएं

चाहे जितना कोई समझाए दिल यह मान नही पाता अब पहले सी बात नही वह सुनना हमको नही भाता ।। खुद को तो अब भी लगता है सब कुछ हम निपटा सकते हैं छोटी मोटी कोई समस्या पल में दूर भगा सकते हैं यूं घबराकर पीठ दिखाना हमको रास नही आता अब पहले सी बात […]

कविता

ए जिंदगी

ए जिंदगी तू कैसे कैसे रंग दिखाती है,  कभी खट्टी तो कभी मीठी बन जाती है,  कभी धूप तो कभी छांव बन जाती है,  कभी धूप तो कभी सुख बन जाती है,  जिंदगी तेरे कितने रूप हैं,  हर रूप में एक नया रंग है,  रंगों से सजी जिंदगी कितनी खूबसूरत है, हर दिन बादलों का […]