कविता

अंतर

हे प्रभु ! मानव- मानव में अंतर क्यों  ? एक सिंहासन पर बैठा एक जमीन पर बैठा क्यों ? कोई जूठन को मजबूर कोई अन्न फेंक रहा है। मोहताज पैसे दो पैसे को हाथ फैलाये खड़ा द्वार पर भय से मालिक के दुत्कार रहा संतरी उसको। सूरज ऊपर भरी दोपहरी तपती धरती खाली पैर घर- […]

कविता

समय की रेंगनी से

समय की रेंगनी से गुम हो गयी खुशी की मोतियाँ  सभी  खजाने की, हाथ  सिर्फ आई  रिश्ते की नाजुक डोर खामोशियाँ रही सताने की। चंद लोगों की भीड़ थी और थी कुछ बहुत यूँही मन बहलाने की, छोड़ गये वो साथ आखिर एकदिन यादें  बची  रहीं बस रूलाने की। आस्माँ देखकर कृषक खुश होता है […]

कविता

दामाद

बिटिया का पति दामाद होता है समय की बात है कि दामाद कभी रसगुल्ला तो कभी दोधारी तलवार होता है। गिरगिट की तरह रंग बदलने मे माहिर पुत्र सा व्यवहार भी करता है बस दिमाग गरम भर हो जाय तो दोधारी तलवार लगता है। सालियों से थोड़ा असहाय दिखता है मगर सालों से छत्तीस का […]

कविता

श्राद्ध पक्ष

तुमसे बिछुड कर जिंदगी उदास है जाने क्यों फिर भी मिलने की आस है। यूं तो लौटकर नहीं आते हैं जाने वाले श्राद्ध पक्ष में लौटकर आओगे ये विश्वास है ।। स्मृतियों की उषा की सांझ न हो कभी मुझे अब उस किरण की तलाश है। तुम्हारा इशारा है या मात्र आभास है ऐसा लगता […]

गीतिका/ग़ज़ल

कुछ कहूँगा नहीं

कैसे सोचूँ मैं, सबकी, बताओ मुझे- कोई, इंसान एक, ढूंढ लाओ मुझे । जिसके अन्दर, समन्दर भावों का हो ऐसे हृदय से, परिचित कराओ मुझे । अमावस के दलदल में, मैं  हूँ फँसा सोचना क्या है, तुम छोड़ जाओ मुझे । मैं मौन हूँ वृक्ष सा, कुछ कहूँगा नहीं काटो भी, जल चढ़ाकर चिढाओ मुझे […]

गीतिका/ग़ज़ल

गलियों में भेड़िये

अब तो गलियों में आकर ही रहने लगे हैं- ये भेड़िये, आदमी खुद को कहने लगे हैं । कल अहंकार में थे, जो पर्वत से ऊँचे- अब, पहाड़ों की भाँति ही, ढहने लगे हैं । फल, मिलने लगा है, जो वो बो रहे थे- प्रभु को याद कर हम सितम सहने लगे हैं । अपने […]

गीत/नवगीत

मत रोको गंगा की धारा

मत रोको गंगा की धारा, अविरल बहने दो। उर की सारी पीड़ा खुशियां, कल-कल कहने दो। केवल नदी नहीं है गंगा, अपनी थाती है। युग-युग से पुरखों की पढ़ती आई पाती है। घाटों में इतिहास सुरक्षित, हलचल रहने दो। संस्कृति की संवाहक गंगा, जीवन का राग भरे। सृजन प्रलय के तटबंध बीच, बहती आग भरे। […]

कविता

किताबें कहना चाहती हैं

सच है किताबें कुछ कहना चाहती हैं, अपने मन के भाव बाँटना चाहती हैं, अपने अंदर समेटे आखिर कब तक बेचैनी से बचायें खुद को, बस अपनी बेचैनी से खुद को बचाना चाहती हैं। कितना विचित्र है कि हमसे कहकर हमें ही देना चाहती हैं, यथार्थ बोध हमको बताना चाहती हैं। अपनी दुविधा मिटाने की […]

कविता

शिक्षक दिवस

गुरु चरणों में किया समर्पण, त्रेता में श्रीराम ने गुरु चरणों की रज माथे पर,रखी थी श्रीघनश्याम ने देव और नृप के सिंहासन से, उच्च गुरु स्थान है मात-पिता से बढ़कर गुरुवर, का आदर सम्मान है जिनकी चरण वंदना करके, हर कोई बना महान है ऐसे शिक्षक,गुरु के चरणों में, कोटि कोटि प्रणाम है महान […]

कविता

दूसरे पर दोष मढ़ना शग़ल हो गई हमारी

ये लड़कियाँ और लड़के ‘रंग’ देखकर ही प्यार करते हैं, फिर भी हम और संविधान जोर देकर कहते हैं- भारत में रंगभेद नहीं है ! ‘सुख’ तो ‘शारीरिक’ ही होती है, ‘मानसिक’ तो ‘संतोष’ होती है और गरीब व्यक्ति मन मसोसकर रह जाते हैं कि उनके लिए ‘संतोष’ ही परम धन है ! प्यार है […]