कुण्डली/छंद

मनहरण घनाक्षरी छंद

आई देखो है लोहड़ी,  खुशियाँ नहीं हैं थोड़ी, बना बनाकर जोड़ी , खुशियाँ मनाइये । तिल गुड़ लाओ सभी ,  पूजा करो सब अभी , मिलजुल कर सभी ,  आग तो जलाइये । झूम – झूम नाच कर , दिलों को भी बाँच कर, मन सदा साँच कर , एकता जगाइये । संक्रांति तो महान […]

कुण्डली/छंद

मदिरा सवैया : नैनन देख लजाय रहे

प्रेम कि बात छिपावत मोहन ,हाय हिया अकुलाय रहे । रीझ गयी सुन तान हरी जब,सुंदर गीत सुनाय रहे । चाँद समान खिले मुख प्रीतम,नैनन देख लजाय रहे । आन बसो हिय सांवरिया अब प्राण अधीर बुलाय रहे।। याद पिया तुमको करती जब ,पीर बढ़े इन नैनन में । भीतर भीतर जी तड़पा अरु ,ताप […]

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया – देश हमारा धर्म है!

भौंका कुत्ता एक जब , हुआ गली में शोर। भौं भौं भौं मचने लगी, हुई भयावह भोर।। हुई भयावह भोर, सभी क्यों भौंक रहे हैं। अज्ञानी , राही की – राहें रोक रहे हैं।। ‘शुभम’ न तुलसी – कुंज, उग रहे कूकरमुत्ता। भौंके कुत्ते खूब, प्रथम जब भौंका कुत्ता।।1। चाटा जिसने रक्त ही, उसे रक्त […]

कुण्डली/छंद

कुंडली

तुम आई न प्रियतमे, आई निष्ठुर शीत । शूल सरीखी शीत में,घायल मेरे गीत । घायल मेरे गीत ठिठुरते हैं रातों में । खो जाती है नींद ख्वाब की बारातों में, विकल विरह में रहता है मेरा मन गुमसुम। आश लगाए बैठा है, अब आ जाओ तुम

कुण्डली/छंद

ममता ने की शांति की अपील

ममता तू है दोगली, स्वयं लगाकर आग अब कहती है जोर से, “भाग रे भइया भाग” भाग रे भइया भाग, तुम्हारी ऐसी-तैसी ! हिंदू गण से अधिक, दुलारे बंग्लादेशी कह सुरेश ‘मोमताज’ नहीं मेरे को जमता, आने दो चुनाव, भोगेगी तू भी ममता ।। — सुरेश मिश्र

कुण्डली/छंद

प्याज के अच्छे दिन आए

प्याज बेचारी क्या करे, लोग करें बदनाम ‘महबूबा’-सा किया है गोडाउन में जाम गोडाउन में जाम, मचा कोहराम देखिए सपनों मे अब यही आ रही राम देखिए कह सुरेश कल थी सड़कों पर मारी-मारी तरकारी की ताज बनी अब प्याज बेचारी ।। — सुरेश मिश्र

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया – नारी क्यारी बाग की

(1) कितना वहशी हो गया , देखो रे इंसान। लाज – हया धो पी गया , दिखती कोरी शान।। दिखती कोरी शान, न समझे बहना माता। क्यों दी मानव – देह , बता दे अरे विधाता!! श्वान सुअर – सा काम, भरा मानव – तन इतना। पामर पापी क्लीव , हुआ तू वहशी कितना?? (2) […]

कुण्डली/छंद

रूपमाला छंद

बचपने की ढल गयी है ,खूबसूरत शाम । करवटें बदली  उमर ने ,तज सुखद आराम । खो गए वो दिन पुराने ,खो गए सब खेल । एक दिन लड़ना झगड़ना ,दूसरे दिन मेल । मीत वो सारे रसीले ,इक हसीं अहसास । माँ सुनाती लोरियां  जो थी बहुत वो खास। शोर कक्षा में मचाते, हाल  […]

कुण्डली/छंद

मधुशाला

केवल श्रम की चाबी से ही, खुलता किस्मत का ताला कर्तव्यों से ही मिलती है, अधिकारों वाली हाला। जो साहस के साथ मथेगा, कठिनाई के सागर को उसके जीवन में छलकेगी, सुख सपनों की मधुशाला।। चलने का साहस करते जो, पावों में सहकर छाला मंजिल पर जाकर भरते हैं, कामयाबियों की हाला। जो सच्चाई से […]

कुण्डली/छंद

सवैया

राम कौ नामु जपौ जितनों, उतनी मन कों सुख शांति मिलैगी। राम कों भूलि गयौ मनवा, आजमाय लै रे दुख भ्रांति मिलैगी।। राम ही राम ही राम जपौ, तन में मन में नव कांति मिलैगी। इतराय रहौ धन के मद में, दुख दारिदजन्य कुक्रान्ति मिलैगी।।1।। राम बसें जड़ – चेतन में, तन में मन में […]