कुण्डली/छंद

ओढ ली चूनर धानी

ओढ़ ली चूनर धानी वसुधा ने आज फिर धरती न धीर मन मौन इतराती है। अंबर नत होकर चूमता कपोल जब, श्यामल तन खिले सुमन हरसाती है। मोहित मदन मन पछुवा पवन बन, बिखेरता सुगंध मंद धरा मुस्काती है। पावस का वारि जल करता उर विकल, मिलन के स्वप्न नैन धरती सजाती है।     […]

कुण्डली/छंद

टेरता पपीहा मन

रसाल सी रसीली आम्र कानन बीच वह, वर्षा वारि धार साथ खेलती-नहाती है। प्रकृति सुंदरी समेट सुंदरता सकल, समाई है उसमे वह रति को लजाती है। प्रेम झूले में झूलती इठलाती कली वह, मर्यादा में बंधी पर प्रेम न जताती है। उपवन सुवासित है उसकी सुवास से, हंसे तो मीठी स्वर लहरी बिखराती है।   […]

कुण्डली/छंद

मनहरण घनाक्षरी छंद

रोज़ – रोज़ करो योग , भागें दूर सभी रोग , तन मन रहे खुश , ताज़गी ले आइये । योग मतलब जोड़ , लस तुम दो छोड़ , लगाओ तुम रोज़ दौड़ , योग अपनाइये । अनुलोम विलोम भी , रोज़ जपो तुम ओम , योग बनता है सोम , पीते बस जाइये । […]

कुण्डली/छंद पद्य साहित्य

हे भारत के कवि!

(सरसी छंद) नयी पीढ़ी न चाहे नखशिख, न विरह या श्रंगार इसे चाहिए उत्साह से छने,  वीर रस के उद्गार लेखनी से कर संबल  और, जिजीविषा ही प्रदान निभाना कर्तव्य रचनाधर्मी! कर राष्ट्र का उत्थान।1। भीरुओं के हिय भी जाएँ, जिन वचनों से   डोल छंद पौरुष के संवाहक, हे कवि!  अब तू   बोल वीरत्व से […]

कुण्डली/छंद

आसन

आसन प्राणायाम से, देह रहे यह स्वस्थ। चंचल चितवन शांत हो, आत्मा बने तटस्थ।। आत्मा बने तटस्थ, मोह माया को छोड़े। प्रभु सह बढ़ता प्रीत, जगत बंधन को तोड़े।। कह अनंत कविराय, करो प्रतिदिन पद्मासन। निज को दो आयाम, सबेरे उठकर आसन।। *अनंत पुरोहित ‘अनंत’*

कुण्डली/छंद

हनुमान स्तुति, छंद घनाक्षरी

हनुमान -स्तुति (छंद घनाक्षरी) रात – दिन साधना में,राम की आराधना में, शत्रु को विनाश और, काल हु पे भारी है। धीर – बीर बल धारी, उमा पति अवतारी, अंजनी के जाए सुत, बाल ब्रह्मचारी है। बल को बखान हनु, रीछ जामबन्त सुनि, पैठि दसमाथु राजु , बाटिका उजारी है। अक्षय को क्षय कर, लंक […]

कुण्डली/छंद

सुंदरी सवैया छंद

अपने मन की गति बांध अरे यह मांग रहा अब जीवन तेरा| मन में धर धीर करो सब काम मिटे भव ताप न हो दुख डेरा| जिसने गुन ली यह बात सुनो सुख कोष बढ़े नित लाभ घनेरा| सुख की बरखा हर पीर हरे चहुँ ओर करें खुशियाँ पग फेरा | ★ विनती करते कर […]

कुण्डली/छंद

महान डाकू मोहर सिंह का निधन

मोहर सिंह डाकू गयो, धरा छोड़ि यमलोक मचा लुटेरों के जगत, में दुखदाई शोक में दुखदाई शोक, अरे कुछ दिन रुक जाते लूट जगत की महिमा,रुतबा,शान बढ़ाते, कह सुरेश वह बोले,’सहन न होवे खिल्ली’ हमसे बड़े-बड़े डाकू चुनि चलि गै दिल्ली। — सुरेश मिश्र

कुण्डली/छंद

कुण्डलियाँ

देना है तो दीजिये , थोडा सा सम्मान ,बदले में ले लीजिये खुशियों भरा जहान,खुशियों भरा जहान, लगेगा जीवन प्यारा,होंगे हर दुख दूर , मिटेगा तम ये सारा .सुख दुख की ये नदी, यहां जीवन है खेना ,जग से जो भी मिला, वही उसको है देना।— महेंद्र कुमार वर्मा

कुण्डली/छंद

कुंडलिया – दूध पिलाया नाग को

1 जैसी मन की सोच है,वैसे ही फल फूल। सोचा अगर बबूल है,चुभें देह में शूल।। चुभें देह में शूल ,रसीले आम न पावें। मन के यथा विचार,तथा सारे फल लावें।। रहना ‘शुभम’ सकार, न धी हो ऐसी वैसी। हृदय -भाव ही मूल,सोच हो मन की जैसी।। 2 छोटे अणुवत बीज से, जमता है वटमूल। […]