कुण्डली/छंद

झूठ महात्म्य

बोलो झूठ कभी नहीं ,ऐसा मत दो ज्ञान झूठ बोलते जो सदा ,वो पाते सम्मान वो पाते सम्मान ,झूठ को सदा भुनातेसच का सारा मूल्य, हजारों लोग चुकाते कहें ‘धीर’कविराय, झूठ सांसों में घोलो सच कहना है पाप ,झूठ की वाणी बोलो। — महेंद्र कुमार वर्मा

कुण्डली/छंद

कुंडलिया

आते जाते राह में, मिलते बहुत निशान। आँगन घर दालान में, संस्कार सम्मान।। संस्कार सम्मान, छाप पद चिन्हों की नित। मातु पिता के गीत, रीति कुल की सबके हित।। सुन ले ‘गौतम’ सार, प्यार कर गाते गाते। छोड़ दिलों पर छाप, डगर पर आते जाते।। महातम मिश्र ‘गौतम’ गोरखपुरी

कुण्डली/छंद

सदाचरण के छंद

नहीं दुराव,हो उठाव,आज तो पले विवेक। सही बहाव,हो उड़ान,रीति,नीति प्यार नेक।। सुशील हो,न कील हो,बढ़ोतरी करो विनीत। जहान धर्म-कर्म मान,मीत गीत हो पुनीत।। ** महान ज्ञान वान संत,जो कहें वरो सुजान। ग़रीब तो सभी यहाँ सभी,रहो सुधर्म मान।। सुदीप जो जले,उजास का रहे यहाँ प्रभाव। परोपकार मान लो, नहीं रहे ज़रा अभाव।। ** सदा दिली […]

कुण्डली/छंद

नारी पर छंद

(1) नारी से शोभा बढ़ती है,नारी फर्ज़ निभाती है। नारी कर्म सदा करती है,नारी द्वार सजाती है।। सबको कब यह भान मिलेगा,नारी प्रेम बहाती है। सबको कब यह ज्ञान मिलेगा,नारी पूज्य कहाती है।। (2) नारी के सब गुण गाते हैं,पर ना धर्म निभाते हैं। कुछ कहते हैं पर करते कुछ,लोग सदा भरमाते हैं।। अब अँधियारा […]

कुण्डली/छंद

कोमल की कुण्डलियाँ.

अपना कोई है नहीं, मतलब का संसार। स्वार्थ जहाँ पर पूर्ण हो, वो ही रिस्तेदार। वो ही रिस्तेदार, खास हैं तब हो जाते । जब तक निकले काम, तभी तक रिस्ते नाते। कह ‘कोमल’ कविराय, जगत है कोरा सपना। मुश्किल में दे साथ, वही होता है अपना । ऊँचे-ऊँचे हो गये, आलीशान मकान । हल्के-हल्के […]

कुण्डली/छंद

संदेशपूर्ण कुंडलिया

भागा सुख को थामने,दिया न सुख ने साथ। कुछ भी तो पाया नहीं ,रिक्त रहा बस हाथ।। रिक्त रहा बस हाथ,काल ने नित भरमाया। सुख-लिप्सा में खोय,मनुज ने कुछ नहिं पाया।। जब अंतिम संदेश,तभी निद्रा से जागा। देखो अब है अंत,आज मैं सब तज भागा।। दुख बस मन का भाव है,भाव करे बेचैन। वरना सुख-दुख […]

कुण्डली/छंद

कुंडलिया – जननी प्रभु का रूप है

-1- माँ की ममता- मापनी,बनी नहीं भू मंच। संतति का शुभ चाहती,नहीं स्वार्थ हिय रंच नहीं स्वार्थ हिय रंच,सुलाती शिशु को सुख से गीले में सो आप,भले काटे निशि दुख से।। ‘शुभं’न उपमा एक,नहीं माँ सी जग झाँकी। जनक पिता का त्याग,श्रेष्ठतम ममता माँ की -2- जननी माँ प्रभु रूप हैं,धीर नेह का धाम। सदा […]

कुण्डली/छंद

कुंडलिया-बंदर के कर नारियल

-1- पढ़ना-लिखना छोड़कर, चमचा बनना ठीक नेता का अनुगमन कर,पकड़ एक ही लीक। पकड़ एक ही लीक,सियासत में घुस जाना। चार बगबगे सूट, शहर में जा सिलवाना।। ‘शुभम’न चला दिमाग़,भेड़ बन आगे बढ़ना। शिक्षा है बेकार, छोड़ दे लिखना – पढ़ना।। -2- नेता कभी न चाहते, पढ़ा- लिखा हो देश। चमचा बन पीछे चलें,बदल-बदल कर […]

कुण्डली/छंद

शुभमाल छंद

शिल्प विधान – जगण जगण , 121 121 चरण तुकांत, 6 वर्ण प्रति चरण 1. बढ़े हम वीर । बने सब धीर ।। रखे सुविचार । करें उपकार ।। 2. सदा रह साथ । लिए हम हाथ ।। न ही कर घात । यही सच बात ।। 3. लिए मन जात । पिया भर लाज […]

कुण्डली/छंद

मनहरण घनाक्षरी छंद

  मनहरण घनाक्षरी छंद विधान – 88,87 प्रथम नमन मेरा ,जन्म दायिनी माँ को है द्वितीय नमन मेरा, ईश सम तात को तृतीय नमन करूँ ,गौरीसुत गणेश कोचतुर्थ नमन मेरा, सरस्वती मात कोपंचम नमन मेरा, जग पालनहार कोषष्ठम् नमन करूँ , ज्ञान बरसात कोसप्तम नम करूँ, जवान किसान को तोअष्टम नमन करू, राष्ट्र की सौगात […]