कुण्डली/छंद

हिंदी

संस्कृत प्राकृत से पाली स्वरूप धरि अब देवनागरी कहावति है हिंदी। छत्तीस रागिनियों के बारह सुर गाइ गाइ चारि मिश्रित वर्ण सुहावति है हिन्दी।। आगम -निगम के गूढ़ तत्व कहि कहि ब्रह्म से जीव को मिलावति है हिंदी। भारत महान की आन बान शान बनि नभ तक अंचरा लहरावति है हिन्दी।। अवधी ब्रज मगही बुंदेली […]

कुण्डली/छंद

अखिलेश यादव का दुष्प्रचार

टीके पर भी टुच्चई, करता टोंटीचोर टीपू तू इंजीनियर,या टट्टू, लतखोर या टट्टू ,लतखोर, करे अब टोका टोंकी इक तो ‘तितऊ’ ऊपर नीम चढ़ी है लौकी कह सुरेश हे पाकी चमचे, रख मुंह सीके नपुंसकों को किन्नर नहीं बनाते टीके । — सुरेश मिश्र

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया छंद

अंतस में नैराश्य का, जब जब पले विकार निंदा रस की गोलियाँ, सहज सरल उपचार सहज सरल उपचार, जगाती उर्जा मन में बिना लगाए दाम, भरें ख़ुशियाँ जीवन में कह बंसल कविराय, लगे जब जीवन नीरस निंदा से आनंद, अनंत पाएगा अंतस।। जीवन में यदि आपको, पाना है सम्मान चाटुकारिता कीजिये, जी भर के श्रीमान […]

कुण्डली/छंद

छंद- हरिगीतिका

छाया  हुआ अपनों में मिला ,भक्ति विभोर उत्सव छठी भुला दिखा हर मनवा खोज, ढूढे दिखा  संचालिका सूरज दिखे चाहत सी  बढ़ी ,जिनके  बिना हम नित ढले । उनकी रश्मि पाने के  लिए  , सभी दिनकर के आराधिका।। अपनी लग्न में  सारे  मग्न , मनचाही  किनारें भरे  । मन ध्यान  की पिपासा दिनकर, तलाश भरी  मन साधिका ।। सुता युवती सजी […]

कुण्डली/छंद

कुण्डली

शरद सुहानी सी लगे, मनहर अरु गुलजार । शशि को करके शुभ विदा, रवि जी झांके पार। रवि जी झांके पार, रोशनी बढ़ती जाय । दिन जैसे जैसे चढ़े, ठंढक मिटती जाय। जा तू पावस मास, कि तेरी खत्म कहानी। कर ले तू आराम, कि आई शरद सुहानी।

कुण्डली/छंद

प्रभात

तमस को पराजित कर उषा के संग में, हो गया दिवाकर, अवतरण देखिये। चांद सितारो से भरी चादर उतार के बदला है गगन ने आवरण देखिये गूंजे पंछी के सुर, फैला प्रकाश यूं खुशियों से भरा वातावरण देखिये। ईश्वर की कृपा तले “स्वाती”के संग में करें शुभकामना यूं वितरण देखिये। — पुष्पा अवस्थी “स्वाती”

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया : यौवन के दिन चार

-1- बचपन के दो नयन में,ले भविष्य आकार। वर्तमान देखें युवा, जरा अतीताभार।। जरा अतीताभार, देखता बीते कल को। चखता बारंबार, मधुर-खट्टे रस फल को।। ‘शुभम’ सुहाना काल,लगे जब आता पचपन। जिज्ञासा में लीन,देखता कल को बचपन।। -2- बूढ़े की पहचान है , देखे काल अतीत। फूल सभी जब फल बनें, बाकी रहे न तीत।। […]

कुण्डली/छंद

डूबी सच नैया

सच नैया खेते रहे ,झूठ नदी पर यार,सच चप्पू करता रहा ,झूठ लहर से प्यार ,झूठ लहर से प्यार ,पवन उनको दुलरातीं ,जीवन के हर भेद ,पल पल उन्हें सिखातीं ,इक दिन टूटा प्यार ,दुखी हो गए खिवैया ,किया भंवर ने वार ,और डूबी सच नैया। — महेंद्र कुमार वर्मा

कुण्डली/छंद

घनाक्षरी

निज पहचान हिंदी, मान अभिमान हिंदी, भाषाओं की शान हिंदी, मोल पहचानिए। एकता की भाषा हिंदी, उच्च परिभाषा हिंदी, जगती की है आशा हिंदी, बात मेरी मानिए। ध्यानियों का ध्यान हिंदी, ज्ञानियों का ज्ञान हिंदी, सहज विधान हिंदी, सारी भाषा छानिये। माता के समान हिंदी, भारती की जान हिंदी, बोले संविधान हिंदी, प्रण ऐसा ठानिये।

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया- गौ माँ

-1- गौ माँ!गौ माँ!!कर रहे, सुलभ न चारा घास। मारी-मारी फिर रहीं,गौ माँ आज निराश।। गौ माँ आज निराश, सड़क पर भटकें सारी। गली – गली में रोज, नरक झेलें बेचारी।। ‘शुभम’ खोखला नेह, झूठ वे कहते हैं माँ। खाती सभी अखाद्य,आज वे अपनी गौ माँ। -2- माता के सम्मान से, वंचित सारी गाय। दूध […]