कुण्डली/छंद

घनाक्षरी

निज पहचान हिंदी, मान अभिमान हिंदी, भाषाओं की शान हिंदी, मोल पहचानिए। एकता की भाषा हिंदी, उच्च परिभाषा हिंदी, जगती की है आशा हिंदी, बात मेरी मानिए। ध्यानियों का ध्यान हिंदी, ज्ञानियों का ज्ञान हिंदी, सहज विधान हिंदी, सारी भाषा छानिये। माता के समान हिंदी, भारती की जान हिंदी, बोले संविधान हिंदी, प्रण ऐसा ठानिये।

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया- गौ माँ

-1- गौ माँ!गौ माँ!!कर रहे, सुलभ न चारा घास। मारी-मारी फिर रहीं,गौ माँ आज निराश।। गौ माँ आज निराश, सड़क पर भटकें सारी। गली – गली में रोज, नरक झेलें बेचारी।। ‘शुभम’ खोखला नेह, झूठ वे कहते हैं माँ। खाती सभी अखाद्य,आज वे अपनी गौ माँ। -2- माता के सम्मान से, वंचित सारी गाय। दूध […]

कुण्डली/छंद

कुंडलिया

राधाकृष्णन ने किया, जग में ऊँचा नाम। पेशे से  शिक्षक स्वयं, किए  अनूठे काम।। किए  अनूठे  काम, ज्ञान की अलख जगाई। शिक्षाविद् के साथ, भूमिका कुशल निभाई।। करता है ‘शिव’ याद, और प्रणमान्जलि अर्पण। भारत के अभिमान, राष्ट्रपति राधाकृष्णन।। — शिवेन्द्र  मिश्र ‘शिव’

कुण्डली/छंद

गुरु

गुरु से गणना गुरु से गिनती,          गुरु से रस छंद समास सभी। गुरु से रसआयन भौतिक भी,      गुरु शिक्षक शीर्ष समाज सभी।। गुरु नैतिक अर्थ सुपथ्य कला,       सुर काव्य खगोल पुराण सभी। गुरु ईश्वर हैं अरु ईश गुरू,       गुरु से गण ज्ञान विधान […]

कुण्डली/छंद

गणेश – स्तुति (छंद गीतिका)

हे गजानन दीन बन्धू , नेह वर्षा कीजिए, पाप से कर मुक्त मुझको, पुण्य से भर दीजिए, मोह के बंधन कसीले, दब गयी है भावना, काट दे उर बन्ध मेरे, कर रहा हूँ प्रार्थना।।                 डॉ. शशिवल्लभ शर्मा

कुण्डली/छंद

कुण्डलीया छंद

  🌻कुण्डलीया छंद🌻 🌻१🌻 सुन्दर ऐसा चाहिए ;जो मन मंजुल होय सुंदर सदैव, मन भला ;तन छवि देता खोय तन छवि देता खोय; बूढ़ा तब तन ना भावै फीकी आंखें होय; गात श्वेत ना लुभावै अरूणिम अधर खोय :जर्जर हो काया मंदर कह सुनी बना रहे; सु मन सदा ही सुंदर 🌻२🌻 संतोष  उर धरे सदा:लोभ कभी […]

कुण्डली/छंद

कुण्डली

काम-धाम सब बंद हैं, विचलित अब मजदूर। जाना चाहे गाँव वह, हुआ बहुत मजबूर।। हुआ बहुत मजबूर, दिखे न कोई साधन। साहब जी, अब नही, हमारे पास बचा धन।। अगर रहम उर शेष, कीजिए तो इतना अब। बसें चला दो और, छोड़कर काम-धाम सब।।०१ करता है श्रम रात-दिन, रहकर घर से दूर। रूखा-सूखा जो मिले, […]

कुण्डली/छंद

सत्य ही शाश्वत है

सत्य ही गवा है रोज सत्य ही जवां है रोज। मोज देर कितनी असत्य कर पायेगा। विजय श्री वरण सदा से सत्य को ही करे। सत्य से चटक रंग झूठ नही पायेगा। लूटमार फूकमार हूकमार चूकमार, दूकमार जादू कब तक चल पायेगा। तर्क तर्क व वितर्क गर्क बेड़ा कर देगा, ना असत्य सत्य पर  बोझ […]

कुण्डली/छंद

वह रति को लजाती है

लालिमा सुशोभित मुखमंडल में उनके, अपूर्व सौंदर्य नख-शिख में समाया है। व्याकुल हृदय को लुभाते हैं कंज नयन, वाणी में मधुरता अमिय रस पाया है। मोहित मदन मन निहारे मृदुल तन, प्रेमी बादल अनंत अम्बर में छाया है। है विधाता का सृजन अनुपम मनोहर, अंग-अंग गढ़ रुचि नेह से बनाया है।         […]

कुण्डली/छंद

डी.टी सी. (छप्पय छंद)

डी.टी सी. की बस में चढ़कर, अपनी शामत आई, मैं हंसने की इच्छा रखता, आती रोज रुलाई. आती रोज रुलाई, निगोड़ी बस नहीं आती, आती है तो बिना रुके ही, वह आगे बढ़ जाती. लटक-लटककर किसी तरह, पकड़ी तो बस ऐसी, गिरे, टांग की हड्डी टूटी, वाह री (कयामत) बस डी.टी सी. 19.1.1985