कुण्डली/छंद

सयाली छंद

सयाली छंद घबराई डरी धरा फसलों की जगह मकान उगा आधुनिकरण जब सिमटे घन रूठ धरा से अन्नदाता देखे भुखमरी छायी बदरी, व्याकुल फिर मन, गीला तकिया चारदीवारी हुई असुरक्षित मर्यादा अमर्यादा में हुए कसैले रिश्ते अंजु गुप्ता

कुण्डली/छंद

घनाक्षरी

मर्यादा अपनी नही, छूटने दिये कभी जो, अटल व सत्यनिष्ठ सिर्फ एक राम हैं।बीज अत्याचार को मिटा दिया समूलता से , दीनन की लाज रखे, लोक अभिराम हैं।सुन्दर स्वरुप दिव्य, मन में बसी है छवि , जनता के प्राणनाथ, नयनाभिराम हैं।जिनका कृपा के बिना , हिलता न एक पात , ऐसे हनुमान प्रिय ,प्रभु सीताराम […]

कुण्डली/छंद

शीर्षक :- कुंडलिया छंद

रचना रब की श्रेष्ठ है,मनुज धरा पर एक। स्वार्थ लिए नीचा हुआ,भूल परमार्थ नेक।। भूल परमार्थ नेक,दंभ में जीवन जीता। परहित समझे नाज़,वही सच समझे गीता। सुन प्रीतम की बात,जाति ना भुजबल रखना। शक्ति शील सौंदर्य,युक्त अतिउत्तम रचना। सारिका “जागृति” सर्वाधिकार सुरक्षित ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कुण्डली/छंद

कुंडलिनी छंद – जीवन-लक्ष्य

(1) जीना इक अरमान है,जीना इक पहचान जीने का सम्मान हो,जीने का यशगान जीने का यशगान,प्यार का प्याला पीना मानवता हो संग,तभी फलदायी जीना। (2) मानवता संग ले,जीना है इनसान इनसानी जज़्बात से,जीने में है शान जीने में है शान,दूर कर दे दानवता तभी मिलेगा मान,साथ जब हो दानवता। (3) दमकेगा आलोक तब,जब पावनता-भाव साथ […]

कुण्डली/छंद

छंद

स्वेद से धरा को सींच धानी परिधान दिया उनका न पूछ रहा कोई यहाँ हाल है भाल के कपाल शीश चढ़ रक्तपात किया उनको भी लाल कहे अजब कमाल है भारत के दुश्मनों ने भारत को घाव दिये भारत को बाँटने की फिर चली चाल है नाम बदनाम करे हालियों का दुनिया में कृषक नहीं […]

कुण्डली/छंद

घनाक्षरी – टेसू-टेसू मन आज

हरियाली छाय रही धरा इठलाय रही देखो आम्र कुंजन में कोयलिया गावत है बासन्ती बयार चले झूम -झूम मन हरे थिरकत बागन में सुख अति पावत है फूल खिले,मौन हिले खुशियों को ठाँव मिले कलियाँ नवीन देखो घुँघटा हटावत हैं प्रीत से पलाश पगे पीर ,पोर- पोर जगे विरहा की दाह अब कौन दहकावत है कली खिली कचनार हर्षित हरसिंगार टेसू -टेसू मन […]

कुण्डली/छंद

छंद

मुश्किलों से खेलकर धूप छांव झेलकर ,हर एक पेट को ये अन्न उपजाते हैं । मिट्टी से यह सने हुए पर्वतों से तने हुए ,खेत की ये मेंढ पर तन झुलसाते हैं ।। धुर कश्मीर से यह कन्याकुमारी तक ,जीत कर क्षुधा मन – मन मुस्कुराते हैं । इनकी ही तपस्या से समृद्धि – वृष्टि […]

कुण्डली/छंद

कुंडलियां – माया

माया ठगनी रूप को , मनुज जरा पहचान । हर लेती मति ये सदा, बात हमारी मान ।। बात हमारी मान, चाल गहरी चलती है । बांध मोह के पाश, खेल खुब रचती है ।। शिवा कहे सुन बात, पड़े कोई मत छाया । लेती है यह छीन , हृदय के सुख को माया।। माया […]

कुण्डली/छंद

छंद

शीत प्रकोप धुंध के कारण त्राहि त्राहि जब मची धरा पर झरने पोखर ताल जमे सब जीव जन्तु काँपे थर थर थर दंभ शीत का बढ़ते बढ़ते पार गया जब अपनी हद से तब उसको औकात बताने वक्र मार्ग पर चले दिवाकर — सतीश बंसल

कुण्डली/छंद

हिंदी

संस्कृत प्राकृत से पाली स्वरूप धरि अब देवनागरी कहावति है हिंदी। छत्तीस रागिनियों के बारह सुर गाइ गाइ चारि मिश्रित वर्ण सुहावति है हिन्दी।। आगम -निगम के गूढ़ तत्व कहि कहि ब्रह्म से जीव को मिलावति है हिंदी। भारत महान की आन बान शान बनि नभ तक अंचरा लहरावति है हिन्दी।। अवधी ब्रज मगही बुंदेली […]