Category : कुण्डली/छंद


  • घनाक्षरी

    घनाक्षरी

    भक्ति जो करे तो मीराबाई बन जाये नारी , कोप जो करे तो रणचंडी बन जाती है । तोड़ती मिथक सारे नारी शक्ति नित्यप्रति, कल्पना बने तो अंतरिक्ष तक जाती है । नारी है तो सृष्टि...


  • मुकरियाँ

    मुकरियाँ

    खरी खरी वह बातें करता । सच कहने में कभी न डरता । सदा सत्य के लिए समर्पण। क्या सखि ,साधू ? ना  सखि, दर्पण । हाट दिखाये , सैर कराता । जो चाहूँ वह मुझे...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    चादर ओढ़े सो रहा, कुदरत का खलिहान। सूरज चंदा से कहे, ठिठुरा सकल जहान।। ठिठुरा सकल जहान, गिरी है बर्फ चमन में। घाटी की पहचान, खलल मत डाल अमन में।। कह गौतम कविराय, करो ऋतुओं का...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    कुल्हण की रबड़ी सखे, और महकती चाय। दूध मलाई मारि के, चखना चुस्की हाय।। चखना चुस्की हाय, बहुत रसदार कड़ाही। मुँह में मगही पान, गजब है गला सुराही।। कह गौतम कविराय, न भूले यौवन हुल्लण। सट...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    मारे मन बैठी रही, पुतली आँखें मीच। लगा किसी ने खेलकर, फेंक दिया है कीच।। फेंक दिया है कीच, तड़फती है कठपुतली। हुई कहाँ आजाद, सुनहरी चंचल तितली।। कह गौतम कविराय, मोह मन लेते तारे। बचपन...

  • “मत्तगयन्द सवैया”

    “मत्तगयन्द सवैया”

    होकर मानव भूल गए तुम मान महान विचार बनाये। रावण दानव जन्म लियो नहिं बालक पंडित ज्ञान बढ़ाये।। अर्जुन नाहक वीर भयो नहिं नाहक ना दुरयोधन जायो। कर्म किताब पढ़ो नर नायक नाहक ना अहिरावण आयो।।...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    पाया प्रिय नवजात शिशु, अपनी माँ का साथ। है कुदरत की देन यह, लालन-पालन हाथ।। लालन-पालन हाथ, साथ में खुशियाँ आए। घर-घर का उत्साह, गाय निज बछड़ा धाए।। कह गौतम कविराय, ठुमुक जब लल्ला आया। हरी...

  • छंद मदिरा सवैया

    छंद मदिरा सवैया

    वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना। मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।। नाचत गावत लाल लली, छुपि पाँव महावर का रँगना। भूलत भान बुझावत हौ, कस नारि दुलारि रह ना...