Category : क्षणिका

  • क्षणिकायें

    क्षणिकायें

    सब के सब देख रहे थे लगी हुई थी आग जलता हुआ रावण दर्शनार्थी अस्त ब्यस्त ट्रेन की डरावनी चिंघाड़ दौड़ती हुई उतावली रफ्तार धुँआँ उड़ा आँखों के सामने शायद ही कोई देख रहा था।।-1 जमीन...

  • बोलती ही नहीं !!!

    बोलती ही नहीं !!!

    ये ख़ामोशी सिर्फ बोलती ही नहीं लड़ती भी है और कई बार जंग भी हो जाती है बिना किसी गोली बारूद के और सब ख़त्म हो जाता है ख़ामोशी से !!!!  

  • जुगत

    जुगत

    ठिठुर मरे न “गरीब” सर्दी से … राजनीतिज्ञों ने जुगत लगाई, दूर करके अपनी “गरीबी” महँगाई की आग जलाई ।। अंजु गुप्ता




  • पुरवैया

    पुरवैया

    जब दरख्तों से अठखेलियां करती है पुरवैया काले घनघोर बादलों के सीने में चमकती है बिजुरिया पिया तुम याद आते हो बहुत जी को तड़पाते हो — सुनीता कत्याल

  • प्रेम के गलियारे

    प्रेम के गलियारे

    क्यों भटकते हो घृणा के और वैर के गलियों और चौबारों में? घूमना है तो घूमो प्रेम के गलियारों में भले ही लगते हों छोटे  प्रेम के गलियारे यहां मिलेंगे प्रेम के भंडार आनंद के अंबार...

  • उगता हुआ सूरज !!!

    उगता हुआ सूरज !!!

    बुज़दिल होने से अच्छा है मन को ताकतवर बनाया जाये कुछ घूँट हौसले के उम्मीद से भरकर जिन्दगी को रोज़ उगता हुआ सूरज दिखाया जाये — सीमा सिंघल ‘सदा’

  • मन का भूगोल !!!

    मन का भूगोल !!!

    जिंदगी के जोड़ घटाने में रिश्तों का गणित अक्सर जरूरत के वक़्त जाने क्यों शून्य हो जाता है और मन का भूगोल सब समझ कर भी कुछ नया खोजने लग जाता है।