क्षणिका

क्षणिका

गुलामी की बेड़ियों को कब तक जकड़ेंगे हम अंग्रेजी मानसिकता से कब बाहर निकलेंगे हम न्यायालयों में कब तक मिलार्ड मिलार्ड कहेंगे राष्ट्रभाषा हिंदी पर कब हम अभिमान करेंगे ।। — नवल अग्रवाल

क्षणिका

फूल (पुष्प-सुमन)

इन्हें फूल (मूर्ख) न कहो, बहुत बुद्धिमान हैं ये, महकता-चहकता स्वाभिमान हैं ये, इनकी भाव-प्रवणता का जवाब नहीं, आनंद के आगार, प्रभु का वरदान हैं ये. जी भर महक लुटाते हैं ये, तनिक भी नहीं इतराते हैं ये, कोमल हैं कमजोर नहीं हैं, स्नेह से सबको सिखाते हैं ये.

क्षणिका

संध्या बेला: एक सुरीला नग़मा

संध्या की बेला है, या है सुरीला नग़मा, या कि लगा हुआ है सजीले रंगों का मजमा, सुनहरी-रुपहली, लाल-पीले रंगों की नशीली रंगत ने, बांध दिया है खूबसूरत-नशीला-अद्भुत समां. दिन का अंत भी इतना खूबसूरत होता है, जाना न था, चाहे जाना भी हो, माना न था, शयन कक्ष की खिड़की से नमूदार खूबसूरत नजारों […]

क्षणिका पद्य साहित्य

मरजीना (क्षणिका)

1. मरजीना *** मन का सागर दिन-ब-दिन और गहरा होता जा रहा दिल की सीपियों में क़ैद मरजीना बाहर आने को बेकल मैंने बिखेर दिया उन्हें कायनात के वरक़ पर। -0- 2. कुछ *** सब कुछ पाना    ये सब कुछ क्या?    धन दौलत, इश्क़ मोहब्बत    या कुछ और? जाने इस ‘कुछ’ का क्या अर्थ है। -0- 3. मौसम *** […]

क्षणिका

मेला

मेला दुनिया के इस मेले में तू क्यों समझता है खुद को अकेला अकेला समझेगा, तो हो जाएगा झमेला चला चल मुसाफिर हिम्मत करके साहस रख खुद में इतना जहां तू पहुंच जाए, वहीं लग जाए मेला.

क्षणिका

बोल

वेद कहते हैं- ‘सत्यम ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यम अप्रियम’ सच बोलो, मीठा बोलो, कड़वा सत्य कदापि मत बोलो, इससे अच्छा है मौन रहो, बुगुर्गों का कहना है- पहले तोलो, फिर बोलो, तोलकर बोलने में कुछ समय लगेगा, उतना समय मौन तो रहोगे, साथ ही अच्छा-बुरा सोच भी सकोगे, कबीर जी ने लिखा है- […]

क्षणिका

क्षणिका

तू बन जा मेरी कविता मै बन जाऊँ तेरी कहानी तेरी आँखों में बस जाऊँ तू देखे इन्द्रधनुष के रंग रूहानी अमर प्रेम की बाते किसे बतानी दुनिया के कुछ लोग मतलबी प्रेम की परिभाषाउन्हें होगी पढ़ानी। — संजय वर्मा “दॄष्टि”

क्षणिका

दो क्षणिकाएं

1. समय समय को आज तक कौन बांध पाया है? जिसने एकबारगी समय को समझ लिया, समय उसका साया है, सरमाया है. 2. एकला चलो रे रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा था एक गीत ”एकला चलो रे” यह गीत हुआ था सबका मन-मीत ”एकला चलो रे” का मतलब यह नहीं था कि सबके साथ मत चलो […]

क्षणिका

#महरूम

“हे परवरदिगार कभी महरूम न करना मुझे, इस प्रकृति प्रेम, जीव-जंतुओं के प्रेम से, अपनी मानवता के प्रति समर्पित भाव से, मैं जिंदगी भर रहूंगी आपकी शुक्रगुजार।” — नूतन गर्ग (दिल्ली)

क्षणिका पद्य साहित्य

क्षणिकाएँ

1प्रेम के तराजू पर सब हार जाओगे गर प्रेम को सच्चे दिल से निभाओगे प्रेम ही पूजा प्रेम इबादत प्रेम जन जन की भाषा है दर्द अपना भी भूल जाओगे गर प्रेम को अपनी रीत तुम बनाओगे । 2जिंदगी के पनघट पर हर गीत तुम्हारा है जिंदगी ढलती है पर संगीत तुम्हारा है क्यों न […]