Category : क्षणिका



  • पुरवैया

    पुरवैया

    जब दरख्तों से अठखेलियां करती है पुरवैया काले घनघोर बादलों के सीने में चमकती है बिजुरिया पिया तुम याद आते हो बहुत जी को तड़पाते हो — सुनीता कत्याल

  • प्रेम के गलियारे

    प्रेम के गलियारे

    क्यों भटकते हो घृणा के और वैर के गलियों और चौबारों में? घूमना है तो घूमो प्रेम के गलियारों में भले ही लगते हों छोटे  प्रेम के गलियारे यहां मिलेंगे प्रेम के भंडार आनंद के अंबार...

  • उगता हुआ सूरज !!!

    उगता हुआ सूरज !!!

    बुज़दिल होने से अच्छा है मन को ताकतवर बनाया जाये कुछ घूँट हौसले के उम्मीद से भरकर जिन्दगी को रोज़ उगता हुआ सूरज दिखाया जाये — सीमा सिंघल ‘सदा’

  • मन का भूगोल !!!

    मन का भूगोल !!!

    जिंदगी के जोड़ घटाने में रिश्तों का गणित अक्सर जरूरत के वक़्त जाने क्यों शून्य हो जाता है और मन का भूगोल सब समझ कर भी कुछ नया खोजने लग जाता है।

  • इंतजार है

    इंतजार है

    आते हैं, छा जाते हैं, पर बरसते नहीं बादल राजधानी दिल्ली समेत पूरे एनसीआर को  बारिश का इंतजार है. आये बादल, छाये बादल, जी भरकर बरसे थे बादल बाढ़ के बाद आर्थिक राजधानी बंबई को  पीने...

  • बेचारा

    बेचारा

    बेचारा आदमी, जब सिर के बाल नहीं आते तो ढूंढता है दवाई, जब आ जाएं तो ढूंढता है नाई, सफेद हो जाएं तो ढूंढता है डाई, …और जब काले रहते हैं तो ढूंढता है लुगाई, सच...


  • ऊँचे

    ऊँचे

    ऊँची ईमारतें ऊँचे लोग जमीन पर रह गये बस भूखे लोग चढावा सोने-चांदी का अष्ट मिठाई का भोग पेड़ियों पर बैठे रहते लाचार, कुष्ठ रोग