क्षणिका

22 दिसंबर यानी बड़ी रात

किसी से बात क्या किए कि गाँव में एक पंचलाइन सैर कर जाएगी- ‘दिन में भैया, रात में सैंया’ और कहेंगे कि ये ‘रबर’वाले भैया हैं ? कितने घिनौने विचार होते हैं ऐसे लोगों के ! •••• ट्रक में जहाँ जूता टँगी रहती है, लिखी होती- ‘बुरी नज़रवाले तेरा मुँह काला’, किंतु अगर जिनके मुँह […]

क्षणिका

फटे में टाँग

मैं न भाजपाई हूँ, न कांग्रेसी ! न कामरेड, न बसपाई, न केजरीवाई ! न लालूआई, न मुलायमलाई ! चाय-नाश्ते छोड़े भी 244 दिन हो गए ! •••• कहावत है- फ़टे में टाँग घुसाना ! मित्रो ! फ़टे में दूसरी चीजें घुसाई जा सकती है, पर टाँग तो हरगिज़ नहीं ? •••• मैं चीनीवाला ‘हलवा’ […]

क्षणिका

फुटपाथी रईश

हम विविध परिवेशों में पले-बढ़े हैं, कोई अत्यंत गरीबी, तो कोई रईशी से, कोई सवर्णी और कोई फुटपाथीय मतभेद तो होंगे ही, मनभेद मत पालिए ! ×××× स्वस्थ तर्क-वितर्क ही मतभेद है, जो होंगे! पर किसी से बातचीत नहीं करना, मन में गुमार पाल लेना कि फलाँ को देख लेंगे, यही श्मनभेदश् है ! ×××× […]

क्षणिका

सहना आया है

सार्थक अधिनियम पर हिंसात्मक प्रतिकार अथवा डराकर दुकानों या गाड़ियों को बंद कराना सत्ता हासिल करने का जुगाड़तंत्र है, लोकतंत्र नहीं ! •••• अगर बहुमत के अधिनियमों से आपको परेशानी है, तो जब आप बहुमत में आएं, तो अधिनियम पलट डालिये…. •••• आज एन्टी-प्रेमचंद जैसे कथाकार की जरूरत है, जो ‘पूस का दिन’ लिखे ! […]

क्षणिका

जवानी पीकदान

सोच हमारी इतनी संकीर्ण और सीमित हो चुकी है कि अगर किसी को ‘आई लव यू’ कहते हैं, तो हम पत्नी, मंगेतर या प्रेयसी के इतर सोच नहीं पाते ! ×××× आज के हालात में ‘जवानी’ पीकदान की तरह है, जिनमें सब कोई थूकयाते हैं, फिर काहे को जवानी ज़िंदाबाद रे छुतरु कोरोनु ! ×××× मेरे […]

क्षणिका

धोखा देने वाला सच

क्या आस्तिक व्यक्ति ‘झूठा’ होते हैं ? क्योंकि वो 100% ईश्वरभक्ति का दिखावा करते हैं, जो कि सब्ज़बाग़ के सिवाय और कुछ नहीं है ? ×××× महिलायें (कुछ या प्राय:) ‘चीटर्स’ पुरुष मित्रों से ही खुश रहती हैं, क्योंकि वे उनसे गलतियों पर भी हमेशा प्रशंसा जो पाती हैं ? ×××× मैंने इतना धोखा खाया […]

क्षणिका

विचारों का अंधड़

मैंने न शादी किया है और न ही किसी बच्चे का जैविक बाप बना हूँ, इसलिए मेरे को ‘मर्द’ होने में संदेह है ! ×××× मैं नेता नहीं हूँ कि मुझे ‘वोट’ चाहिए ! इसलिए मैं अपनी शर्तों के साथ जीता हूँ ! ×××× राजनीति यानी देश की संपूर्ण आबादी के प्रत्येक नागरिक को कहीं […]

क्षणिका बाल कविता

सदाबहार काव्यालय: तीसरा संकलन- 23

1 .चलती रही जिंदगी (क्षणिका) कभी गमों की धुंध कभी खुशियों की धूप कभी सफलता कभी विफलता हौसला और जुनून हिम्मत और लगन ले चलती रही जिंदगी। जीत का स्वप्न सजाती हार को हराती खिलने की चाहत लिए चट्टानों से टकराती मंजिल की ओर बढ़ती रही जिंदगी। थाम लिया दामन ख्वाब का जिद और जुनून […]

क्षणिका

घांटा और उपवास

चक्की मिल तो सोशल डिस्टिनसिंग के कारण तो जानी नहीं है…. गेहूँ के दर्रे तैयार करने में माँ जुटी हैं, आज का खाना घांटा होगी…. और बनेगी तब न खाएंगे…. अबतक उपवास में हूँ ! आजकल तो सभी कष्ट में है, कोई कम, कोई ज्यादा ! जब कोई कष्ट में होते हैं, परिवार और मित्र […]

क्षणिका

मतभेद तो होंगे ही !

स्वस्थ तर्क-वितर्क ही मतभेद है, जो होंगे ! पर किसी से बातचीत नहीं करना, मन में गुमार पाल लेना कि फलाँ को देख लेंगे, यही ‘मनभेद’ है ! ×××× हम विविध परिवेशों में पले-बढ़े हैं, कोई अत्यंत गरीबी, तो कोई रईशी से, कोई सवर्णी और कोई फुटपाथी, मतभेद तो होंगे ही, मनभेद मत पालिए ! […]