गीत/नवगीत

गीत – रत्न छुपे अनमोल सखी

रत्न छुपे अनमोल सखी ! मन के तहखाने में । इक गुड़िया है थिरक-थिरक कर नाचा करती है , रोती-गाती कभी पीर भी बाँचा करती है। ज़िद्दी-सी रूठे, थक जाऊँ उसे मनाने में….. सुधियों की माला है अनगिन धवल-धवल मोती आखर हैं पुखराज लोरियाँ संग लिए सोती गुंथ उलझी है वक्त लगेगा ,माँ ! सुलझाने […]

गीत/नवगीत

ले चलो अब मुझको मेरे गांव

मुझे खूब याद आता है, मेरा प्यारा प्यारा गांव। बारिश के दिनों में जहां, चलती कागज की नाव।। बहुत याद आता है मुझकों, कभी अपनों का वो साथ। कभी बड़े पीपल की वो छांव, ले चलो अब मुझको मेरे गांव।। सड़क किनारे है मेरा गांव, वहीं है मां काली का धाम। करते लोग खूब दर्शन […]

गीत/नवगीत

प्रेम का तुम रंग भर दो

इस हृदय  के  चित्रपट पर, प्रेम  का  तुम  रंग  भर दो। अब की  होली  में   पिया, मुझको  होली  सा कर दो। नैन   फिर   गढ़ने  लगे  हैं, प्रेम   के   प्रतिमान   अब। हर   दिशा   में   गूंजती  है, स्नेह   की   मुस्कान  अब। रंग   जितने   हैं   जहां  में, सब      तुम्हारे     रंग   है। तुम से  ही  बनने  […]

गीत/नवगीत

नारी ने भरमाया है

प्रकृति सृष्टि का गूढ़ तत्व है, समझ न कोई पाया है। नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।। नर, सागर की, गहराई नापे। मौसम की कठिनाई भी भाँपे। आसमान में उड़ता है नर, इससे देखो, पर्वत काँपे। नारी की मुस्कान ने जीता, प्रकृति की कैसी माया है। नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

संग-साथ की इच्छा सबकी

पुष्प की चाह, सभी को होती, कुछ ही पल को वह खिलता है। संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।। चाहने से यहाँ, कुछ नहीं होता। काटता है वही, जो व्यक्ति बोता। कर्तव्य रहित अधिकार जो चाहे, कदम-कदम वह, निश्चित रोता। साथ उसी को, मिलता जग में, प्रेम सूत्र रिश्ते सिलता है। […]

गीत/नवगीत

मन से रंग लगाओ

विकट घड़ी है यारो लेकिन होली खूब मनाओमन के रंग लगाओ साथी! मन से रंग लगाओ। नहीं प्यार से बड़े है दूजे, रंग जगत में प्यारेहरे-लाल, नीले या पीले, सभी इसी से हारेभावों की पिचकारी से, सतरंगी जहाँ बनाओमन के रंग लगाओ साथी! मन से रंग लगाओ ।1। दिल ना दुखे किसी भाई, ऐसी होली […]

गीत/नवगीत

*तुम्हें देखकर मैं मगन नाचता हूँ*

बहुत दूर मुझसे बसी हो विरागिन, मिलन अब हमारा तुम्हारा न होगा। किसी दिन तुम्हीं रुपसी बन खड़ी थी, किसी दिन मिलन की घड़ी ही घड़ी थी, विहँसती हुई कर ठिठोली नजर से, मिलन हेतु आती तुम्हीं तब शहर से। तुम्हें देखकर मैं मगन नाचता था, तुम्हें तो खुदा की विभा मानता था, मगर भाग्य […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

 प्रकृति न हमसे न्यारी है

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है। महासागर,  पर्वतमालाएँ, प्रकृति ही,  नर और नारी है।। प्रकृति का सूक्ष्म रूप है नारी। ललित लालिमा कितनी प्यारी! पर्वत हरीतिमा, ललचाती है, गोलाइयों में, भटकाती नारी। जीवन रस देती हैं नदियाँ,  पयस्वनी  माता नारी है। प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

नहीं माँगता बस देता है

अकेलेपन से जूझ रहे सब, साधक एकान्त का रस लेता है। समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।। इक-दूजे से सब हैं जूझें। मित्र कौन है?  कैसे बूझें? प्रेम-प्रेम कह, लूट रहे नित, भीड़ में अपना, ना कोई सूझे। परिवार में ही महाभारत होता, अपना वही जो नाव खेता है। समय […]

गीत/नवगीत

प्रीत वाला रंग

कान्हा लिए अबीर हैं डोलें गोप गोपियन लिए जी संग। उत राधे चुपके से राह निहारें झोली में लिए प्रीत वाला रंग। मस्ती छायी लिए रंग बसन्ती बगियन में है कोयलिया गाये। ढोलक के संग मंजीरा  बाजै मन के सबको होली ये भाये। कोई गाये है होली में कबीरा कोई जी करता फिरै हुडदंग। नेह […]